संस्कृति विवि में लौहपुरुष Sardar Patel को किया गया याद

मथुरा। संस्कृति विश्वविद्यालय में भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री लौहपुरुष Sardar Patel को उनकी जयंती पर शिक्षकों और छात्र-छात्राओं ने याद किया। इस मौके पर वक्ताओं ने Sardar Patel के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के इस योद्धा को भारत के एकीकरण के लिए सदा याद किया जाता रहेगा।

विवि के प्रोफेसर कल्याण कुमार जोरदार ने कहा कि वल्लभभाई झावेरभाई पटेल जन्म 31 अक्टूबर 1875 में हुआ था। उन्होंने भारत के पहले उप-प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। वे एक भारतीय अधिवक्ता और राजनेता थे। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए देश के संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाई और एक एकीकृत, स्वतंत्र राष्ट्र में अपने एकीकरण का मार्गदर्शन किया। भारत और अन्य जगहों पर, उन्हें अक्सर हिंदी, उर्दू और फ़ारसी में सरदार कहा जाता था, जिसका अर्थ है “प्रमुख”। उन्होंने भारत के राजनीतिक एकीकरण और 1947 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान गृह मंत्री के रूप में कार्य किया।

प्रोफेसर डीआर यादव ने बताया कि स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बड़ा योगदान 1918 में खेडा संघर्ष में हुआ। गुजरात का खेडा खण्ड (डिविजन) उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हे कर न देने के लिये प्रेरित किया। अन्त में सरकार झुकी और उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी।

डा.जयदेव शर्मा ने सरदार पटेल के भारत के एकीकरण के प्रयासों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वतंत्रता के समय भारत में 562 देसी रियासतें थीं। इनका क्षेत्रफल भारत का 40 प्रतिशत था। सरदार पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही वीपी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हे स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन को छोडकर शेष सभी राजवाडों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

इस मौके पर प्रोफेसर विनसेंट बालू, प्रोफेसर निर्मल कुंडू, प्रोफेसर एनएन सक्सैना, डा. एनके शर्मा आदि ने विचार व्यक्त किए।

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