Internet of Things सुविधा के साथ चुनौती भीः पन्नीर सेल्वम

मथुरा। Internet of Things एक ऐसे युग का आगाज है, जिसमें कोई भी चीज असम्भव नजर नहीं आती। सूचना प्रौद्योगिकी हमारी दुनिया को कहां ले जाएगी, कोई नहीं जानता। आज प्रतिक्षण तकनीक बदल रही है। समझदार उपकरण इंसान की हर जरूरत को समय से पहले पूरा कर रहे हैं। इंटरनेट अपने दिशा-ज्ञान और क्षमता के चलते समय की जरूरत बन गया है लेकिन हम इसकी चुनौतियों से इंकार नहीं कर सकते उक्त उद्गार संस्कृति यूनिवर्सिटी में शुक्रवार को हुए नेशनल सेमीनार में Internet of Things पर चर्चा करते हुए मुख्य अतिथि प्रिंसिपल डायरेक्टर एमएसएमई (पीपीडीए आगरा) पन्नीर सेल्वम ने छात्र-छात्राओं को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए। 

संस्कृति यूनिवर्सिटी में एग्रो बेस्ड इंटरप्रेन्योरशिप सेल का शुभारम्भ, नेशनल सेमीनार में Internet of Things पर विचार

नेशनल सेमीनार का शुभारम्भ मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पार्चन और दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर एग्रो बेस्ड इंटरप्रेन्योरशिप सेल का शुभारम्भ भी किया गया।

इस अवसर पर कुलपति डा. राणा सिंह ने कहा कि तीन-चार दशक पहले तक जो काम मंदगति से हो रहे थे, उनमें अपेक्षा से अधिक गति आई है। हर वर्ष तकनीक हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल रही है। 1996 के लगभग भारत में पेजर का पदार्पण हुआ किन्तु एक ही साल के भीतर मोबाइल फोन आए और पेजर का वजूद खत्म-सा हो गया। इसी प्रकार पिछले कुछ समय में मोबाइल ऐप्स ने अपना डंका बजा दिया और दुनिया ने समझा कि अब सब कुछ ये ऐप्स ही करेंगे, परंतु सूचना-प्रौद्योगिकी की तेज चाल फिर सब कुछ बदलने लगी है। अब इंटरनेट इनेबल्ड डिवाइस, स्मार्ट वॉच, टीवी या स्मार्ट फोन से भी आगे  ऐसे उपकरण आ चुके हैं जो खुद सोच सकते हैं और अपने मन से कोई काम कर सकते हैं। इसी के साथ उदय हुआ है इंटरनेट ऑफ थिंग्स का। हम कुछ समय से ऐसे रोबोट देख रहे हैं, जो अपने मालिक के मौखिक आदेश पर काम कर सकते हैं। इतना ही नहीं इंटरनेट इनेबल्ड स्मार्ट उपकरण उनसे भी एक कदम आगे जाकर हमारा कोई आदेश मिलने से पहले ही अपना काम कर लेने में सक्षम हैं।

इस अवसर पर विशेषज्ञ जे. प्रभु ने इमर्जिंग ट्रेंड्स इन आईओटी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इंटरनेट ऑफ थिंग्स एक ऐसी कॉन्सेप्ट है जिसके तहत इंटरनेट से जुड़े खुद की सोच-समझ रखने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण इंटरनेट के माध्यम से समय से पहले कुछ काम कर सकते हैं। इसे तकनीक की दुनिया में नॉन-स्क्रीन कम्प्यूटिंग भी कहा जा रहा है, क्योंकि ये उपकरण एक कम्प्यूटर की तरह सोच तो सकते हैं, लेकिन इनमें कम्प्यूटर की तरह कोई स्क्रीन नहीं है। अब हम एक ऐसे मुकाम पर खड़े हैं, जहाँ 2020 तक ऐसे समझदार उपकरणों की संख्या 26 अरब हो जाने का अनुमान है, जो स्वयं अपना संचालन करेंगे। आज ऐसे उपकरण बाजार में मौजूद हैं जिन्हें अपने मोबाइल फोन से नियंत्रित करके आप अपने घर के किसी कमरे के लाइट-पंखे या एसी बंद या चालू कर सकते हैं।

तुषार ने अपने सम्बोधन में कहा कि सुविधाएं बढ़ने के साथ ही ये उपकरण चुनौतियाँ भी लाएंगे, जैसा कि आपने टर्मिनेटर-3 में देखा होगा। यदि स्मार्ट डिवाइसेज की बढ़ती स्मार्टनेस पर मानव जाति का प्रभावी नियंत्रण न रहा, तो अरबों की संख्या में मौजूद, एक-दूसरे से जुड़कर काम करने में सक्षम ये उपकरण वास्तव में हमें धरती पर ही नर्क का नजारा दिखा सकते हैं। डा. एन.एन. सक्सेना विभागाध्यक्ष एग्रीकल्चर ने कहा कि आज इंटरनेट के माध्यम से जहां हम ज्ञान और आध्यात्म से सहजता से जुड़ रहे हैं वहीं दुनिया के कई हिस्सों में वैज्ञानिकों व शोधार्थियों के दल मिलकर इंटरनेट ऑफ थिंग्स के लिए मानकों के निर्धारण पर काम कर रहे हैं, ताकि दुनिया को किसी विपदा से बचाया जा सके। इस अवसर पर डीन स्टूडेंट वेलफेयर डा. ओ.पी. जसूजा, डीन इंजीनियरिंग डा. कल्याण कुमार, डा. निर्मल कुंडू, असिस्टेंट प्रो.  विसेंट बालू, असिस्टेंट प्रो. सागरिका गोस्वामी सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन तान्या उपाध्याय ने किया।

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