अंतरार्ष्ट्रीय दास प्रथा उन्मूलन दिवस: सनातन धर्म में ईश्वर सेवा का अर्थ दासता नहीं

इतिहास पलट कर अगर हम देखें तो हमें दास प्रथा के चिन्ह सालों से दिखाई पड़ते हैं| समय-समय पर इसके रूप बदलते रहे हैं| विश्व में हर युद्ध के बाद विजेता सैनिकों द्वारा हारे हुए देश के नागरिकों को बंदी बनाकर ना केवल दास के रूप में व्यवहार करते है बल्कि स्त्रियों से वेश्यावृत्ति कराते हैं।मानव द्वारा मानव का ही शोषण व अमानवीय व्यवहार की पराकाष्ठा को देखते हुए 18 वीं शताब्दी में पश्चिम में दास प्रथा उन्मूलन संबंधी वातावरण बनने लगा और एक प्रमुख नारा मनुष्य की स्वतंत्रता चलाया गया था। इसी के चलते हुए 1926 की लीग ऑफ नेशन के तत्वाधान में किए गए एक सम्मेलन में हर प्रकार की दासता के संपूर्ण उन्मूलन संबंधी प्रस्ताव (International Day of Abolition of Slavery) पर सभी प्रमुख देशों ने हस्ताक्षर किए |

इस प्रकार बीसवीं शताब्दी में प्रयास सभी राष्ट्रीय ने दासता को अमानवीय व अनैतिक ठहरा कर उनके उन्मूलन में कदम उठाए । संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मानव की तस्करी के माध्यम से दास बनाना व वेश्यावृत्ति रोकने के लिए एक प्रस्ताव #2December  को पारित किया । अंतरार्ष्ट्रीय दास प्रथा उन्मूलन दिवस  (International Day of Abolition of Slavery) को मनाए जाने का मुख्य उद्देश्य संपूर्ण विश्व में दास प्रथा को समाप्त करना है।जिसके बाद से हर साल 2 दिसंबर को पूरी दुनिया में दास प्रथा जैसी अमानवीय प्रथा को और उनके साथ जानवरों की तरह व्यवहार करना, इंसान की खरीद-फरोख्त को रोकने हेतु जागरूकता कार्यक्रम चलाया जाने लगा । उन्मूलन प्रथा को खत्म करने के लिए दुनिया भर में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन आज भी यह प्रथा किसी ना किसी रूप में जीवित है ।
पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश खुद भारत के अपने ही अनेक राज्यों में गरीबी से तंग लोग गुलाम बनने पर मजबूर होते हैं| भारत में भी बंधुआ मजदूर के दौर पर दास प्रथा जारी है ।आपको पता होगा एक जमाने में बेटी की विदाई के साथ कुछ कहार (दास-दासी) भेजे जाते थे वो भी इसी दास प्रथा का रूप था| हालांकि सरकार ने सन 1975 में राष्ट्रपति के एक अध्यादेश के जरिए बंधुआ मजदूर प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था किंतु इसके बावजूद यह सिलसिला आज भी जारी है |हालांकि भारत के श्रम और रोजगार मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार देश में 19 प्रदेशों में 286612 बंधुआ मजदूरों की पहचान की गई है, और उन्हें मुक्त कराया गया है| उत्तर प्रदेश में 28385 में से केवल 58 मजदूरों को प्रदर्शित किया गया है ।आँकड़ों से पता चलता विभाग की नाकामी भारत में भी फर्जी कागज बनाकर वेस्ट बंगाल, बिहार ,आदिवासी इलाकों व अनेक प्रदेशों से बच्चे, बच्चियों, आदमी, औरतों को लाया जाता है और उनके साथ अमानवीय कृत्य भी किया जाता है ,और फिर उन्हें अच्छे दामों पर पूर्व शासकों की तरह संपन्न व्यक्तियों में बंधुआ मजदूर की तरह बेच दिया जाता है |आपने कबूतर बाजी का नाम सुना होगा यह भी मानव की तस्करी करने का तरीका है।
किसी भी देश में जब तक अमीरी गरीबी का आधार बराबर नहीं होगा जब तक इस दास प्रथा को खत्म करना असंभव सा ही लगता है, परंतु किसी भी व्यक्ति को अपने यहां नौकरी देना बुरा नहीं है बुरा है उससे पशुओं जैसा व्यवहार करना अप्राकृतिक व अमानवीय कृत्य करना 24घंटे काम लेना ।मेरा भारत के सभी नागरिकों से आग्रह है कि वह अपने यहां 18 वर्ष से कम के किसी भी व्यक्ति को नौकरी पर ना रखें अगर उन्हें उनकी मदद करनी है तो वह अन्य प्रकार से भी उनकी मदद कर सकते हैं मानव की तरह मानव से काम ले यही सनातन धर्म में ईश्वर सेवा है|

– राजीव गुप्ता
लोक स्वर, आगरा

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