भविष्‍य के युद्ध में भारत का सबसे बड़ा हथियार होगी एंटी सैटेलाइट मिसाइल

नई दिल्‍ली। भारत ने अंतरिक्ष में सुरक्षा के लिए एंटी सैटेलाइट मिसाइल तकनीक हासिल कर ली है। यह तकनीक अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन के पास थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा, ‘वैज्ञानिकों ने लो अर्थ ऑर्बिट में 300 किलोमीटर दूर एक लाइव सैटेलाइट मार गिराया। यह ऑपरेशन ‘मिशन शक्ति’ भारत की एंटी सैटैलाइट मिसाइल ए-सैट के जरिए सिर्फ तीन मिनट में पूरा किया गया।’
डीआरडीओ के चेयरमैन जी. सतीश रेड्डी ने भी कहा कि हमने दुनिया को बता दिया है कि हम सैटेलाइट्स को कुछ सेंटीमीटर पास जाकर भी गिरा सकते हैं।
डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख डॉ. वी के सारस्वत का कहना है कि अगर विरोधी देशों ने अंतरिक्ष में हथियार तैनात किए तो भारत उनका मुकाबला करने की स्थिति में होगा।
डिफेंस एक्सपर्ट कर्नल (रिटायर्ड) यूएस राठौड़ ने कहा कि जंग की स्थिति में यह मिसाइल टेक्नोलॉजी दुश्मन देश में ब्लैक आउट जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।
दुनिया में 69 साल से एंटी सैटेलाइट टेक्नोलॉजी पर काम हो रहा
एंटी सैटेलाइट टेक्नोलॉजी अमेरिका-रूस के बीच के कोल्ड वॉर के दौर से है। यह ऐसा हथियार है, जिसे मुख्य रूप से अंतरिक्ष में दुश्मन देशों की सैटेलाइट को नष्ट करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह के हथियार विकसित करने की शुरुआत अमेरिका ने 1950 में की थी। 1960 में रूस (उस वक्त सोवियत यूनियन) ने भी इस पर काम शुरू कर दिया था। आज अमेरिका का 80% कम्युनिकेशन और नेविगेशन सिस्टम सैटेलाइट पर ही आधारित है। अमेरिका इन्हीं सैटेलाइट की मदद से पूरी दुनिया पर नजर रखता है।
12 साल से भारत की इस तकनीक पर नजर थी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन ने जब 2007 में एंटी सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण शुरू किया, तब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर ने कहा था कि चीन इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है और भविष्य में अंतरिक्ष ही हाई मिलिट्री ग्राउंड होगा। इसके बाद 2012 में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के तत्कालीन प्रमुख वी के सारस्वत ने कहा था कि लो अर्थ ऑर्बिट में दुश्मन के उपग्रहों को मार गिराने के मकसद से एंटी सैटेलाइट हथियार बनाने के लिए भारत के पास पूरी तैयारी है।
दुनिया ने भारत को कागजी शेर बताकर मजाक उड़ाया था
जब 2007 और 2012 में भारत ने इस तरह की तैयारियों के संकेत दिए थे तो दुनिया ने हमारा मजाक उड़ाया था। मिलिट्री स्पेस से जुड़े मुद्दों में 12 वर्ष का अनुभव रखने वाली विक्टोरिया सैमसन और स्पेस सेफ्टी मैगजीन के स्कॉलर और आउटर स्पेस एक्सपर्ट माइकल जे. लिसनर भारत की क्षमताओं पर सवाल उठाने वालों में सबसे आगे थे। उन्होंने कहा था कि भारत अगर दुनिया को टेस्ट करके अपनी ताकत नहीं दिखाता है तो वह महज कागजी शेर कहलाता रहेगा। भारत अगर सहायक क्षमताएं विकसित कर रहा है तो उसके ये मायने नहीं हैं कि वह एंटी सैटेलाइट तकनीक भी विकसित कर लेगा।
भारत ने मजाक को चुनौती माना, सबसे मुश्किल रास्ता चुना और 7 साल में कामयाबी हासिल कर ली
भारत में पिछले 7 साल से इस तरह की टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम हो रहा था। आखिरकार 27 मार्च को भारत ने एंटी सैटेलाइट मिसाइल की तकनीक हासिल कर ली। भारत के पास इस तरह के परीक्षण के दो तरीके थे। वह या तो फ्लाई-बाय करता यानी लक्ष्य से कुछ दूरी से एंटी सैटेलाइट मिसाइल गुजार सकता था या फिर किसी सैटेलाइट को जाम कर सकता था। दोनों ही तरीके सॉफ्ट स्किल्स कहलाते लेकिन भारत ने तीसरा और सबसे मुश्किल रास्ता चुना। भारत ने लक्ष्य को नष्ट कर दिया और इस तकनीक पर अपनी 100% क्षमता साबित कर दी। जिस लक्ष्य को साधा गया, वह इसरो का ही माइक्रो सैटेलाइट था, जिसे 24 जनवरी को छोड़ा गया था। आकार में छोटा होने के बावजूद उसे पूरी एक्यूरेसी के साथ मार गिराया गया।
क्या भारत ने अग्नि-5 का इस्तेमाल किया?
अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि धरती से 300 किलोमीटर ऊपर उड़ रहे माइक्रो सैटेलाइट को गिराने के लिए भारत ने कौन-सी मिसाइल इस्तेमाल की लेकिन माना जा रहा है कि भारत ने देश में ही विकसित एंटी बैलिस्टिक अग्नि-5 मिसाइल का उपयोग किया। अग्नि-5 की रेंज 5500 किलोमीटर तक है। इसकी रफ्तार आवाज से 24 गुना ज्यादा होती है। भारत के पास स्वॉर्डफिश कैटेगरी का लॉन्ग रेंज ट्रैकिंग राडार भी है। यह 600 से 800 किमी की रेंज में कुछ भी डिटेक्ट कर सकता है। डीआरडीओ इसकी क्षमता बढ़ाकर 1500 किलोमीटर तक करने वाला था, लेकिन इसके बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई। यह लक्ष्य की पहचान कर सैटेलाइट के मूवमेंट का पता लगाता है। लक्ष्य की पहचान के बाद मिसाइल लॉन्च की जाती है। जमीन पर स्थित राडार मिसाइल को लक्ष्य तक ले जाते हैं। इसके बाद मिसाइल पर लगी हीट शील्ड हट जाती है। इसके बाद मिसाइल इस सैटेलाइट को नष्ट कर देती है।
जंग की स्थिति में फायदे में रहेगा भारत
जिस देश के पास यह टेक्नोलॉजी होती है, माना जाता है कि जंग होने की स्थिति में वह अतिरिक्त फायदे में होता है। ऐसी तकनीक दुश्मन के किसी भी सैटेलाइट को जाम कर सकती है या नष्ट कर सकती है। ऐसा करने पर दुश्मन को अपने सैनिकों के मूवमेंट या परमाणु मिसाइलों की पोजिशनिंग करने में परेशानी आ सकती है। भारत के इस तकनीक को हासिल करने के ये मायने हैं कि चीन या पाकिस्तान से जंग होने की स्थिति में सही समय पर इसका इस्तेमाल करने पर यह मिसाइल देश का सबसे बड़ा हथियार होगी। डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख डॉ. सारस्वत ने इस उपलब्धि पर कहा कि भारत की अंतरिक्ष को मिलिट्राइज करने की योजना नहीं है, लेकिन अगर दुनिया या हमारे विरोधी राष्ट्र अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती करते हैं तो भारत के पास उनका मुकाबला करने की अब ताकत है।
दुश्मन देश में ब्लैक आउट कर देगी यह मिसाइल
डिफेंस एक्सपर्ट कर्नल (रिटायर्ड) यूएस राठौड़ ने बताया कि युद्ध शुरू होने से ऐन पहले दुश्मन के सैटेलाइट को निशाना बनाने से उसकी संचार व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी। ऐसे में ऑडियो और विजुअल की कमी से दुश्मन देश में ब्लैक आउट की स्थिति पैदा हो जाएगी। नेविगेशन और जासूसी से जुड़े मिलिट्री सैटेलाइट अंतरिक्ष में काफी लो एल्टीट्यूड पर होते हैं। भारत ने लो एल्टीट्यूड पर ही सैटेलाइट को ध्वस्त करने का टेस्ट किया है, ऐसे में देश के लिए यह बड़ी उपलब्धि है। पाकिस्तान के पास कम्युनिकेशन सैटेलाइट की संख्या काफी कम है। उसके ज्यादातर सैटेलाइट चीन की मदद से ऑपरेट होते हैं। एक सवाल यह भी है कि आखिर क्यों भारत को इस क्षमता को हासिल करने की बात दुनिया के सामने जाहिर करनी पड़ी? इसकी वजह यह है कि यह क्षमता रखने वाले तीन देशों के बारे में सिर्फ मीडिया रिपोर्ट्स के जरिए ही बातें सामने आती रही हैं। भारत पहला देश है, जिसने खुलकर यह ऐलान किया है।
चीन ने 2007 में यह क्षमता हासिल की
अमेरिका के ऑफिस ऑफ द डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने पिछले कुछ सालों में अपने ऑर्बिट में ऐसे कई टेस्ट किए हैं। सबसे पहले 2007 चीन ने केटी-1 रॉकेट लॉन्च किया था। इस रॉकेट ने चीन के मौसम उपग्रह फेंग युन 1-सी को धरती से 800 किलोमीटर की ऊंचाई पर लो अर्थ ऑर्बिट में मार गिराया। इस टेस्ट के बाद 2500 से 3000 टुकड़े बिखर गए। बताया जाता है कि 2013 में चीन ने एंटी सैटेलाइट मिसाइल डीएन-2 का परीक्षण कर लिया। इस टेस्ट के बाद अंतरिक्ष में तैर रहे चीनी उपग्रह के कुछ टुकड़े रूसी सैटेलाइट से टकरा गए थे। अमेरिकी नेशनल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ने अपनी मिलिट्री में एंटी सैटेलाइट मिसाइलों के लिए विशेष यूनिट बना ली है। उसने काउंटर स्पेस क्षमताओं को विकसित करने के लिए ट्रेनिंग भी शुरू कर दी है।
अंतरिक्ष में हथियार तैनात नहीं किए जा सकते
1963 में अमेरिका ने अंतरिक्ष में जमीन से छोड़े गए एक परमाणु बम का परीक्षण किया। इस विस्फोट से अंतरिक्ष में मौजूद अमेरिका और रूस के सैटेलाइट नष्ट हो गए। इसके बाद 1967 में ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ नाम से एक अंतर्राष्ट्रीय संधि हुई। इसमें तय हुआ कि अंतरिक्ष में किसी भी तरह के विस्फोटक हथियार को तैनात नहीं किया जाएगा। हालांकि, इस संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद भी अमेरिका और रूस एंटी सैटेलाइट हथियारों पर काम करते रहे। फरवरी 2019 तक इस संधि पर 108 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं।
लो अर्थ ऑर्बिट क्या है?
लो अर्थ ऑर्बिट पृथ्वी की सतह से 160 किलोमीटर और 2,000 किलोमीटर के बीच ऊंचाई पर स्थित है। 2022 में भारत की ओर से जो तीन भारतीय अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे, वे भी इस लो अर्थ ऑर्बिट में रहेंगे। इस प्रोजेक्ट पर इसरो ने कहा था कि सिर्फ 16 मिनट में तीन भारतीयों को श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र से स्पेस में पहुंचा दिया जाएगा। तीनों भारतीय स्पेस के ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ में 6 से 7 दिन बिताएंगे।
-एजेंसियां

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