Maldives सेना प्रमुख ने कहा, भारत हमेशा हमारे साथ रहा है, हर तरह से हमारी मदद की है

Maldives की राजधानी माले में हुए समारोह में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शरीक हुए

माले। हिंद महासागर में भारत के पड़ोसी देश Maldives में शनिवार को सियासी तौर पर बड़ा फेरबदल हुआ.
सितंबर में हुए चुनावी नतीजों के बाद विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को चुनाव में हरा दिया था.
सोलिह ने शनिवार को राष्ट्रपति पद की शपथ ली. Maldives की राजधानी माले में हुए समारोह में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शरीक हुए. ये प्रधानमंत्री मोदी का पहला मालदीव दौरा है.
Maldives में चीन का दख़ल काफ़ी बढ़ गया है. इससे पहले भारत मालदीव का सबसे क़रीबी देश हुआ करता था. क्या प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे के कारण दोनों देशों के बीच बढ़ती दूरियां कम होंगी?
इन्हीं सब मुद्दों पर बीबीसी ने मालदीव सेना के प्रमुख मेजर जनरल अहमद शियाम से बात की.
हिंद महासागर क्षेत्र में चीन के बढ़ते असर को कैसे देखते हैं?
चीन एक बेहद मज़बूत, औद्योगिकीकरण के झुकाव वाला बड़ा देश है और वे व्यापार को बढ़ावा देने, विकास और रक्षात्मक क्षेत्रों के रास्ते तलाश रहे हैं. मालदीव हिंद महासागर के मध्य में स्थित है जहां हमारे समुद्र मार्ग से हज़ारों जहाज़ गुज़रते हैं. यहां स्वतंत्रता होनी चाहिए और साथ ही साथ व्यापार या मानवीय उद्देश्य के लिए किए जा रहे कामों में बाधा नहीं होनी चाहिए.
क्या आप यह कह रहे हैं कि चीन स्थानीय मामलों का ख़याल रखे या आप यह कह रहे हैं कि कोई इसमें अवरोध पैदा कर रहा है?
हमें हमेशा अपने पानी और क्षेत्र पर जंगली नियम लागू नहीं करने चाहिए. हमें दूसरों की संवेदनशीलता को लेकर भी समझदार होना चाहिए. चीन, भारत, यूरोपीय राष्ट्रों और अमरीका जैसे देशों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि उन्होंने दूसरे देशों में बहुत योगदान दिया और इससे उन्हें भी फ़ायदा होगा.
अगस्त महीने में भारत में मालदीव को लेकर कुछ चिंताएं देखी गईं. ऐसी चर्चाएं थीं कि मालदीव में आपातकाल लागू करने के समय टकराव हो सकता था. क्या आपको लगता है कि मालदीव पर हिंद महासागर में बड़े राष्ट्रों के बीच टकराव हो सकता है?
मुझे ऐसा नहीं लगता. मालदीव में जो हुआ वह स्थानीय था. चीज़ें वैसी नहीं होती जैसा उन्हें चित्रित किया जाता है. लोग अपने लाभ के लिए बोलते हैं लेकिन मैंने देखा है कि भारत और मालदीव के बहुत अच्छे रिश्ते हैं.
‘भारत ने हमेशा मदद की’
मैं सोचता हूं कि कोई देश सैन्य दृष्टि से अगर मालदीव की मदद कर सकता है तो वह भारत है और भारत हमेशा हमारे साथ रहा है. चाहे वह आर्थिक या शैक्षिक दृष्टि से हो हर तरह से भारत ने हमारे मदद की है और बड़ी भूमिका अदा की है. चीन के नज़रिए से देखें तो मुझे लगता है कि उनका ध्यान केवल व्यापार विकसित करने, आर्थिक मामलों और मूलभूत योजना पर अधिक है. विकास के लिए चीन या भारत को समान रूप से एकसाथ आना चाहिए लेकिन जब हम सैन्य साझेदारी चुनेंगे तो उसके लिए हमें चौंकन्ना रहना होगा.
तो क्या चीन की भूमिका अधिक सैन्य नहीं है?
नहीं, यह सच नहीं है. मैं हमेशा मीडिया में यह ख़बरें देखता हूं कि मालदीव ने चीन को द्वीप बेच दिए हैं. ये बिलकुल सच नहीं है. मालदीव का नागरिक होने के नाते विदेशी ताक़तों को हम अपनी ज़मीन नहीं देंगे. चीन द्वारा मालदीव के द्वीप ख़रीदने की ख़बरें अनुमानों पर आधारित है. ये सच नहीं है.
मालदीव में हमारी एक द्वीप एक होटल नीति है क्योंकि हमारे कई द्वीप फ़ुटबॉल मैदान से भी छोटे हैं. पर्यटन मंत्रालय की एक प्रक्रिया है जिसके तहत लोग इन्हें कुछ समय के लिए ले सकते हैं और पर्यटन मंत्रालय की ये नीति भारत, चीन या यूरोप किसी के लिए अलग नहीं है. यह एक तरह का पट्टा है. इसका सेना से कोई लेना-देना नहीं है.
‘मालदीव में मौजूद भारतीयों के ख़िलाफ़ नहीं’
क्या यह सच है कि मालदीव ने भारत से कहा था कि वह आपके देश में तैनात अपने लोगों और सामानों को वापस ले जाए?
हम एक बेहतर विकल्प की ओर जाना चाहते थे. स्वाभाविक रूप से हर कोई यह चाहेगा. अब हमारे यहां छोटी-छोटी हवाई पट्टियां बन गई हैं तो ये ज़्यादा अच्छा है कि हेलिकॉप्टरों की जगह विमानों का इस्तेमाल हो. यही एक मुद्दा था.
तो क्या आप भारतीय साज़ो-सामान या भारतीयों की मौजूदगी के ख़िलाफ़ नहीं हैं?
बिलकुल नहीं है, साथ ही हम बहुत से चीज़ें ख़ुद करना चाहते हैं. शुरुआत में हम मदद मांग सकते हैं लेकिन हमें जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा होना होगा न कि बार-बार किसी से पूछना होगा.
क्या प्रक्रिया पूरी हो गई है? या अंतिम तारीख़ तय है?
यह चल रही है. पिछले साल जब हमें डॉर्नियर विमान का प्रस्ताव दिया गया था तो हमने अपने पायलट को ट्रेनिंग के लिए भेजा था और जब यह विमान आ जाएगा हमारा पायलट तैयार रहेगा.
हमें इस पूरी प्रक्रिया को जल्द से जल्द अपनाने के लिए तैयार रहना चाहिए. यह बहुत ज़रूरी है और इसी को दोस्तों के ज़रिए आत्मनिर्भर बनना कहते हैं. मुझे इसमें विश्वास नहीं है कि हमारी ज़िम्मेदारियों के लिए हम किसी से बार-बार पूछते रहें.
-BBC

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