उच्च शिक्षा में मौलिकता का समावेश जरूरीः कुलपति Dr. Rana Singh

संस्कृति यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक विषयबोध कार्यक्रम में Dr. Rana Singh के साथ अन्‍य वक्‍ताओं ने दिए सुझाव

मथुरा। समय तेजी से बदल रहा है। अब हम पारम्परिक शिक्षा प्रणाली से युवा पीढ़ी का भला नहीं कर सकते, ऐसे में जरूरी है कि हम शिक्षण में मौलिकता को तरजीह दें। हम वैश्विक बदलाव को आत्मसात कर ही छात्र-छात्राओं को स्वावलम्बी बना सकते हैं, उक्त विचार संस्कृति यूनिवर्सिटी में हुए प्राध्यापक विषयबोध कार्यक्रम में कुलपति Dr. Rana Singh ने व्यक्त किए। प्राध्यापक विषयबोध कार्यक्रम का शुभारम्भ मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पार्चन और दीप प्रज्वलित कर किया गया।

प्राध्यापक विषयबोध कार्यक्रम में कुलपति डा. राणा सिंह ने कहा कि आज शिक्षा, शिक्षक और शिक्षण में बदलाव की जरूरत है। अब समय आ गया है कि हम अपनी शिक्षा पद्धति के बारे में पुनर्विचार करते हुए उसे नए सिरे से परमार्जित करें। हमारे पास आज दुनिया तक पहुंचने का ऐसा मौका है जो अब से पहले कभी नहीं था। हम इन तमाम बदलावों को आत्मसात कर भारतीय युवा पीढ़ी को नई दिशा दे सकते हैं। युवा पीढ़ी की भलाई के लिए हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को इस मौलिकता के साथ तैयार करना होगा जो हमारे हिसाब और जरूरतों के मुताबिक हो क्योंकि हजारों सालों से यह धरती जिज्ञासुओं व साधकों की रही है। कुलपति डा. सिंह ने आधुनिक युग में सेवा के सुनहरे अवसरों का जिक्र करते हुए, उन्हें हासिल करने के उपाय भी बताये।

इस अवसर पर प्रति-कुलपति डा. अभय कुमार ने कहा कि आज हम देश की पारम्परिक शिक्षा प्रणाली की ओर मुड़कर देखें तो बहुत कुछ बदला हुआ नजर आता है। अब तक हमारी चिन्ता यही रही है कि किस तरह से शिक्षा की पहुंच को व्यापक किया जाए। उच्च शिक्षा की व्यापकता की इन कोशिशों से युवाओं का कितना भला हुआ, यह बताने की जरूरत नहीं है। देखा जाए तो हर विद्यार्थी की प्रतिभा, पृष्ठभूमि और जिन हालातों में उसने समय बिताया है, ये बातें भी शिक्षा में काफी प्रभाव डालती हैं, दुर्भाग्यवश शिक्षा के क्षेत्र में इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया गया। इस अवसर पर प्रति-कुलपति डा. अभय कुमार ने प्राध्यापकों का आह्वान किया कि वे शिक्षणेत्तर गतिविधियों के साथ-साथ रिसर्च पेपरों की तैयारी और उनके प्रकाशन पर भी निरंतर प्रयास करें।

यूनिवर्सिटी के कार्यकारी निदेशक पी.सी. छाबड़ा ने अपने उद्बोधन में प्राध्यापकों का आह्वान किया कि वे छात्र-छात्राओं को तालीम देने के साथ ही उनकी सुयोग्यता और सुदृढ़ता पर भी सतत नजर रखें। श्री छाबड़ा ने कहा कि आज वही शैक्षणिक संस्थान युवाओं की पसंद हैं, जहां अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस अवसर पर संस्कृति यूनिवर्सिटी के सलाहकार प्रो. अनिल माथुर ने यूजीसी के क्रिया-कलापों की विस्तार से जानकारी दी। प्रो. माथुर ने बताया कि आज अभिभावक उच्च शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हुए अपने बच्चों को सुशिक्षित करने पर जोर दे रहे हैं, ऐसे में हमारा दायित्व है कि हम बदलाव के इस दौर का लाभ उठाएं।

रजिस्ट्रार डा. आदित्य शर्मा ने संस्कृति यूनिवर्सिटी की कार्यप्रणाली के साथ ही यहां की सेवा-शर्तों पर सविस्तार जानकारी दी। हेड कार्पोरेट रिलेशन आर.के. शर्मा ने प्लेसमेंट के क्षेत्र में संस्कृति यूनिवर्सिटी की पिछले साल की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए इस साल प्लेसमेंट को आने वाली कम्पनियों की जानकारी दी। श्री शर्मा ने कहा कि संस्कृति यूनिवर्सिटी की कौशलपरक शिक्षा रंग ला रही है, यही वजह है कि यहां के छात्र-छात्राएं लगातार सफलता हासिल कर रहे हैं। मुख्य परीक्षा नियंत्रक राजेश टंडन ने कहा कि प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करती है कि जिसके पास भी चीज अच्छी होगी, लोग उसी के पास जाएंगे।

कार्यक्रम के अंत में डा. आदित्य शर्मा ने आभार माना। प्राध्यापक विषयबोध कार्यक्रम का संचालन मैनेजर कार्पोरेट रिलेशन तान्या शर्मा ने किया।

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