गायत्री सिन्हा करेंगी ब्रह्म कुंड पर ब्रज के प्रस‍िद्ध साँझी मेले का उद्घाटन

साँझी एक लोक पर्व है। यह मूलतः संध्या की उपासना का लोकानुष्ठान है, जो प्रायः पूरे उत्तर भारत में पितृपक्ष के दौरान शाम के समय कुँवारी कन्याओं के द्वारा मनाया जाता है। इस के केंद्र में है लोकचित्रण, जिस में पूरे पितृपक्ष भर भित्ति पर गाय के गोबर व मिट्टी आदि से प्रत्येक दिन नई आकृतियाँ बनाई जातीं हैं।

लेकिन ब्रज की देवालयी संस्कृति में साँझी का नवाचार हुआ है। वह यहाँ श्री राधिकाजी की साँझी के रूप में प्रतिष्ठापित है, जो गोबर से नहीं, बल्कि पुष्पों और रंगों से बनाई जाती है। साँझी ब्रज-वृंदावन के देवालयों में एक कला परम्परा के रूप में विकसित हुई है। जिसे आज हम पुष्प साँझी, रंग साँझी और जल साँझी के रूप में देख सकते हैं।

ब्रज की देवालयी रंग साँझी में मिट्टी की एक अठ पहलू वेदी पर बेलोें की जटिल ज्यामिति आकृतियों का निर्माण किया जाता है, जिनमें खाकों के माध्यम से सूखे रंगों का संयोजन किया जाता है। इस केंद्र में होता है श्रीराधाकृष्ण के लीला प्रसंगों का चित्रण। इसी क्रम में प्रत्येक दिन नई आकृतियाँ जन्म लेतीं हैं,जो शाम के समय सामान्यजन के लिए एक अद्भुत कला संसार और भक्त साधकों के लिए एक भाव संसार की रचना करतीं हैं।

पर आज शायद बहुत कम लोग यह जानते हैं कि इस देवालयी कला के विकास में अत्यन्त महत्वूपर्णं योगदान है राजस्थान कृष्णगढ़ के महाराजा सावंतसिंह ‘नागरीदासजी’ का। हम यह जानते ही है कि महाराजा सावंतसिंह ब्रजभाषा के एक श्रेष्ठ कवि थे और चित्रकला के उन्नायक भी थे। इन्हीं के दरबार में प्रसिद्ध कृष्णगढ़ लघुचित्र शैली विकसित हुई। किन्तु इन सब से ऊपर सावंतसिंह एक परम कृष्णभक्त साधक भी थे।

महाराजा सावंत सिंह सन् 1753 ई0 के लगभग अपनी उपपत्नी बनीठनी के साथ वृंदावन आ गये और फिर शेष जीवन यहीं व्यतीत किया। वृंदावन में यमुना के किनारे नागरीदासजी का घेरा है, जहाँ इनके द्वारा निर्मित मन्दिर है और इसी परिसर में महाराजा सावंतसिंह ‘नागरीदास’ तथा बनीठनी की समाधियाँ हैं।

इस कलाप्रेमी भक्तवर महाराजा ने अपने समय में देवालयों से बाहर वृन्दावन के प्रसिद्ध पौराणिक स्थल ब्रह्मकुंड के खुले मैदान में भव्य साँझी मेले का प्रारंभ कराया और रासलीला मंच के लिए ‘ साँझी फूल बीनन समय संवाद ‘ लीला लिखी ही नहीं ,बल्कि उसे ब्रह्मकुंड पर मंचित भी कराया। ब्रह्मकुंड पर प्रतिवर्ष होने वाले इन साँझी मेलों के माध्यम से तत्कालीन वृंदावन के साँझी कलाकारों, रासधारियों, गायकों तथा कवियों को अत्यन्त प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। दरबारी चित्रकारों ने भी नागरीदासजी के काव्य पर आधारित कृष्णगढ़ शैली में ‘साँझी लीला’ विषयक चित्र बनाये।

ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, गोदा विहार, वृंदावन में संग्रहीत अभिलेखों, पाण्डुलिपियों तथा वृंदावनी इतिहास के ग्रंथों में इन भव्य साँझी मेलों का तत्कालीन सजीव विवरण मिलता है। संस्थान में संग्रहीत कवि गोपालराय कृत ‘वृंदावन धामानुरागावली’ ग्रंथ दुर्लभ ऐतिहासिक महत्व का है, जिसमें विक्रम संवत् 1900 से पूर्व कालीन वृंदावन के देवालयों, कुंजों, घाटों, कुंडों एवं मुहल्लों का तत्कालीन वर्णन दर्ज है, में भी ब्रह्मकुंड के साँझी मेलों का वर्णन कुछ इस प्रकार प्राप्त होता है-
” पुनि साँझिन में पाँच दिना तहँ, मेला जुरत है भारी।

एकादसि ते मावस लौं फूलन बीनैं पिय-प्यारी।।
नृपति नागरीदासहि नें तहँ, मेला ए लगवाये।
पिय-प्यारी संवादहिं के अपु आप कवित्त बनाये।।
जहाँ छत्तुरी उभय तहाँ, ठाढ़े होत हैं पिय-प्यारी।
मुरलीराय वंश के तहाँ ते, पढ़त कवित्त हँकारी।।
सिद्धराय के सुत बलदेवराय अब तहीं नवीने।
वृन्दावनसत पै सत कवित्त, अनूपम तिननें कीने।।
पुनि कविता कछु और हु निज कृत, कवित्त अनेक बनाये।
नागर नृप की बानी के जे, बाने बंद कहाये।।
ब्रह्मकुंड पर प्रिया र प्रीतम, संग कवित्त जे पढ़ईं।
पाँच दिना लौं साँझिन में, ब्रजवासिन कौं सुख मढ़ईं।।”

18वीं सदी में नागरीदासजी द्वारा प्रारंभ किया गया यह ब्रह्मकुंड का साँझी मेला 19वीं सदी के अंत तक अपनी प्रसिद्धि के चरम शिखर पर पहुँच गया था। इस का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि गोस्वामी सुन्दर लाल द्वारा विक्रम संवत् 1906 में लिखित ‘ब्रजयात्रा’ ग्रंथ में ब्रह्मकुंड के पौराणिक महात्म्य के स्थान पर उसका साँझी लीला स्थल के रूप में उल्लेख किया गया है –
‘‘ नैर्ऋत्य कोण में ब्रह्मकुंड है, तहाँ साँझी के बनाइवे कूँ सखीन सहित राधिकाजी आईं। श्रीकृष्ण सों वाद भयो…………..’’
साँझी संध्या की उपासना का पर्व है। पौराणिक आख्यान के अनुसार संध्या ब्रह्माजी की मानस पुत्री है। संभवतः इसीलिए नागरीदासजी ने साँझी मेला के लिए ब्रह्मकुंड का चयन किया था।

परन्तु जैसा कि होता है समय ने महाराजा सावंतसिंह ‘नागरीदास’ को भुला दिया और वह प्रति वर्ष ब्रह्मकुंड पर होने वाला साँझी मेला भी उन्नीसवीं सदी के बाद बन्द हो गया। इस मेले का अंतिम उल्लेख मथुरा के अंग्रेज कलैक्टर एफ. एस. ग्राउस द्वारा सन् 1883 ई0 में लिखित पुस्तक ‘ मथुराः ए डिस्ट्रिक्ट मेमाॅयर ’ की उस सूची में मिलता है, जिस में वृन्दावन के उत्सवों, त्यौहारों और मेलों का नाम दिया गया है। 20वीं सदी में शनैः शनैः ब्रह्मकुंड भी खण्डहर होता चला गया और बाद में यह पौराणिक कुंड एक कूड़ा घर बना दिया गया।

लेकिन सन् 2009 ईं0 में द ब्रज फाउंडेशन (Brajfoundation.org )के भागीरथी प्रयास से इस पवित्र कुंड का जीर्णोंद्धार हुआ। फिर सन् 2015 ई0 में द ब्रज फाउंडेशन एवं ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के संयुक्त सद्प्रयासों से भुला दिया गया साँझी मेला पुनः प्रारंभ किया गया। अब यह मेला प्रतिवर्ष आयोजित होता है।

जिसमें ब्रज के प्रमुख साँझी कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। साँझी लीला मंचन, साँझी के पदों का गायन एवं बच्चों की विभिन्न कला प्रतियोगिताएँ तथा ब्रज की साँझी कला पर केन्द्रित अकादमिक प्रदर्शनी यहाँ आयोजित की जाती है।
विगत् वर्षों में इस मेले ने अपनी पुरानी ख्याति को फिर से अर्जित कर लिया है। इस का कला वैभव प्रतिवर्ष बढ़ रहा है।

” नागरिया रस रगमगे दोउ कुसुम सेज कैं माँझ I
साँझी पूजत पिय मिलें परम सलौंनी साँझ II “

द ब्रज फाउंडेशन के व‍िनीत नारायण  के अनुसार इस बार साँझी कला मेले में मुख्य अतिथि श्रीमती गायत्री सिन्हा होंगी। वे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कला समीक्षक हैं। जिनके व्याख्यान दुनिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के कला मर्मज्ञों के बीच वर्षभर लगातार होते रहते हैं। उन्होंने भारतीय और विदेशी कलाओं पर अनेक शोध ग्रंथ लिखे हैं। वे प्राचीन कला-कृतियों के संरक्षण का भी कार्य करवाती हैं। पिछले कई वर्षों से उन्हें साँझी मेला उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है, पर वे विदेश यात्राओं पर होने के कारण नही आ सकीं। इस बार वे आज 14 सितंबर की शाम 6 बजे साँझी मेले का उद्घाटन करेंगी और ब्रज के लोक कलाकारों की कलाकृतियों को देखने व ब्रह्म कुंड पर एक संक्षिप्त उद्बोधन करने के बाद कल सुबह दिल्ली लौट जाऐंगी। उल्लेखनीय है कि गत 4 वर्षों में भी साँझी मेले का उद्घाटन श्रद्धेय संतगणों, केंद्रीय केबिनेट मंत्रियगणों व सांसद आदि करते रहे हैं।
Dharm Desk-Legend News

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