हरियाणा में हो रही है बीटी बैंगन की अवैध खेती, 2010 से है रोक

हरियाणा के फतेहाबाद जिले में किसानों के अवैध रूप से जेनेटिकली मॉडिफाइड बैंगन या बीटी बैंगन की खेती करने का मामला सामने आया है। इन बैंगन की जांच करके केंद्रीय प्रयोगशाला ने इसकी पुष्टि की है। यह देश में अपनी तरह का पहला मामला है, जिसमें किसानों ने फसलों के ऐसे बीज का इस्‍तेमाल खेती के लिए किया है जिसके प्रयोग की भारत में अनुमति नहीं है। भारत में वर्तमान समय में केवल बीटी कॉटन के वाणिज्यिक उत्‍पादन की अनुमति है, जोकि खाद्यान्‍न की श्रेणी में नहीं आता है।
हरियाणा सरकार के अधिकारी ने बताया, ‘नेशनल ब्‍यूरो ऑफ प्‍लांट जेनेटिक रिसोर्स की लैब ने शुक्रवार को अपनी रिपोर्ट दी है। हमने 29 अप्रैल को दो नमूने भेजे थे। इनमें इस बात की पुष्टि हुई है कि फतेहाबाद के रटिया ब्‍लॉक में बीटी बैंगन की खेती हुई है।’ अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि इस रिपोर्ट को मुख्‍य सचिव की अध्‍यक्षता वाले पैनल के पास भेज दिया गया है जो इस बात पर फैसला करेंगे कि किस तरह से आधे एकड़ में खड़ी फसल को नष्‍ट किया जाए और इस बात की जांच की जाए कि किसान जीवन सैनी को बीटी बैंगन का बीज कहां से मिला।
कहां से लाया गया बीटी बैंगन का बीज?
इस जांच में यह पता लगाया जाएगा कि क्‍या बीटी बैंगन के बीज को बांग्‍लादेश से तस्‍करी करके लाया गया है जहां पर इसकी खेती की अनुमति है। जीएम फूड्स का विरोध कर रहे कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारत में जीएम फूड फसलों को लाने के लिए कुछ स्‍वार्थी लोग तस्‍करी का सहारा ले रहे हैं। ये कार्यकर्ता जीएम फूड्स के मानव स्‍वास्‍थ्‍य, पर्यावरण और जैव विविधता पर गंभीर दुष्‍प्रभाव को देखते हुए इसके खिलाफ हैं।
भारत में हालांकि बॉयोटेक नियंत्रक ने अक्‍टूबर 2009 में इसके प्रयोग की अनुमति दे दी है लेकिन फरवरी 2010 से सरकार ने इसके व्‍यावसायिक इस्‍तेमाल पर अनिश्चितकालीन रोक लगा रखी है। माना जा रहा है कि अगर जांच होगी तो यह सभी जरूरी पक्षों और महाराष्‍ट्र हाइब्रिड सीड्स कंपनी तक पहुंचेगी जिसने भारत में बीटी बैंगन को विकसित किया है और परीक्षण किया है।
बीटी बैंगन पर इसलिए लगी है रोक
बता दें कि बीटी बैंगन दिखने में तो साधारण बैंगन जैसा ही होता है लेकिन फर्क इसकी बुनियादी बनावट में है। इस बैंगन की, उसके पौधे की, हर कोशिका में एक खास तरह का जहर पैदा करने वाला जीन होगा, जिसे बीटी यानी बेसिलस थिरूंजेनेसिस नामक एक बैक्टीरिया से निकालकर बैंगन की कोशिका में प्रवेश करा दिया गया है। इस जीन को, तत्व को पूरे पौधे में प्रवेश करा देने की सारी प्रक्रिया बहुत ही पेचीदी और बेहद महंगी है। इसी प्रौद्योगिकी को जेनेटिक इंजिनियरिंग का नाम दिया गया है।
मध्यप्रदेश के जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के खेतों में बीटी बैंगन की प्रयोगात्मक फसलें ली गई थीं। इस बात की जांच की गई कि इसे खाने से कितने कीड़े मरते हैं। जांच से पता चलता कि बैंगन में प्राय: लग सकने वाले 70 प्रतिशत कीट इस बैंगन में मरते हैं। इसे ही सकारात्मक नतीजा माना गया। प्राणियों पर इसके प्रभाव का अब तक अधकचरा अध्ययन हुआ है। ऐसे तथ्य सामने आए हैं कि बीटी बैंगन खाने वाले चूहों के फेफड़ों में सूजन, अमाशय में रक्तस्राव, संतानों की मृत्युदर में वृद्धि जैसे बुरे प्रभाव दिखे हैं।
-एजेंसियां

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