ज़माना अच्छा हो फिर ये भी भरम रखते हैं- Salil Saroj

आज पढ़‍िये Salil Saroj की तीन रचनायें

 

मुझे भुला दिया तो रात भर जागते क्यूँ हो
मेरे सपनों में दबे फिर पाँव भागते क्यूँ हो

एक जो कीमती चीज़ थी वो भी खो दी
अब बेवजह इस कदर दुआ माँगते क्यूँ हो

इतना ही आसान था तो पहले बिछड़ जाते
वक़्त की दीवार पे गुज़रे लम्हात टाँगते क्यूँ हो

गर सब निकाल दिया खुरच-खुरच के जिस्म से
फिर मेरी हँसी से अपनी तस्वीर रँगते क्यूँ हो

………..
खुद को सबसे दूर किया है उसने
जब से मुझे मंजूर किया है उसने

इश्क़ की राह इतनी आसान नहीं
करके, जुर्म जरूर किया है उसने

आँखें दरिया, लब समंदर हो गए
हुश्न को ऐसे बेनूर किया है उसने

खुद का अक्स साफ दिखता नहीं
खुद को चकानाचूर किया है उसने

…….

ज़ुल्फ़ों को चेहरे पे कितना बेशरम रखते हैं
ज़माना अच्छा हो फिर ये भी भरम रखते हैं

ये बारिश छू के उनको उड़ न जाए तो कैसे
बदन में तपिश और साँसों को गरम रखते हैं

कमर जैसे पिसा की मीनार,निगाहें जुम्बिश
अपनी हर इक अदा में कितने हरम रखते हैं

उनको पढ़ कर सब सब पढ़ लिया समझो
वो अपनी तासीर में क्या महरम रखते हैं

वो चलें तो ज़िंदगी ,वो रूक जाएँ तो मौत
अपने वजूद में खुदा का करम रखते हैं

Salil Saroj

 

– सलिल सरोज

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