आईसीएचआर ला सकता है रामसेतु से जुड़े आस्था और विज्ञान के मामले में नया मोड़

Ram-Setu
आईसीएचआर ला सकता है रामसेतु से जुड़े आस्था और विज्ञान के मामले में नया मोड़

धर्म, आस्था और अध्यात्म को किसी प्रामाणिकता की जरूरत नहीं पड़ती और आईसीएचआर रामसेतु के धर्म, आस्था और अध्यात्म से जुड़े मिथकों का शोध कर ये पता लगाएगी कि ये पुल वाकई मानव निर्मित है या फिर भौगोलिक रूप से कुदरत ने इसे बनाया है.
फिलहाल तो वाल्मिकी रामायण को ही आधार मानकर चला जा रहा है क्‍योंकि वाल्‍मिकी रामायण में उसी सेतु का जिक्र है जो कि दक्षिण के धनुषकोटी और श्रीलंका के पंबन को आपस में जोड़ता है. आईसीएचआर का पायलट प्रोजेक्ट मई में शुरू हो जाएगा जो कि नवंबर तक अपनी रिपोर्ट पेश करेगा.

आईसीएचआर के चेयरमैन वाई सुदर्शन राव ने कहा कि रामसेतु सिर्फ एक मिथक या प्राकृतिक चमत्कार है इसका पता लागने के लिए अब तक पानी के भीतर कोई खोज नहीं हुई है. ऐसे में आईसीएचआर की रिसर्च से आस्था और विज्ञान से जुड़े इस मामले में नया मोड़ आ सकता है.

धर्म, आस्था और अध्यात्म को किसी प्रामाणिकता की जरूरत नहीं पड़ती है. प्रमाण धर्म को मजबूत, आस्था को गहरा और अध्यात्म को अनंत तक ले जाने का काम करते हैं. ऐसे में वैज्ञानिक तथ्य या तर्क आस्था को आहत करने का काम करते हैं क्योंकि विज्ञान भी ब्रह्मांड की उत्पत्ति को लेकर ईश्वरीय कण की खोज में ही उलझा हुआ है.

विज्ञान भी नहीं झुठला पाता ये  संयोग

आस्था को गहराता एक प्रमाण श्रीलंका के पूर्वोत्तर में मन्नार द्वीप और भारत के रामेश्वरम के बीच डूबता-उतरता है. करोड़ों हिंदुओं की आस्था इसे रामसेतु कहती है तो विज्ञान इसे एडम्स ब्रिज कहता है लेकिन एक संयोग ऐसा है जिसे विज्ञान भी नहीं झुठला पाता है. वाल्मिकी रामायण में उसी सेतु का जिक्र है जो कि दक्षिण के धनुषकोटी और श्रीलंका के पंबन के बीच को जोड़ता है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि पुराणों के दावों से आस्था का पुल कोई न कोई आधार रखता है क्या?

पुराणों के मुताबिक श्रीराम ने वानर सेना की मदद से मन्नार की खाड़ी में रामेश्वरम और श्रीलंका के बीच एक पुल तैयार किया था. लेकिन तत्कालीन यूपीए-2 सरकार ने सेतु समुद्रम परियोजना के तहत इस पुल को तोड़ने की योजना बनाई जिससे राजनीतिक विवाद गहरा गया.

मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया. अब केंद्र की मोदी सरकार इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टोरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) से पुल की सत्यता की जांच करा रही है.

जेमिनी-11 उपग्रह से तस्वीर ली गई थी रामसेतु की तस्‍वीर 

नासा ने सैटेलाइट इमेज से भारत और श्रीलंका को समुद्र में जोड़ती एक पतली रेखा की तस्वीर जारी की थी. 14 दिसंबर 1966 को जेमिनी-11 उपग्रह से तस्वीर ली गई थी. तस्वीर में धनुषकोटि से जाफना तक द्वीपों की पतली सी रेखा मिली थी. उसके बाद आई.एस.एस-1 ए ने रामेश्वरम और जाफना द्वीपों के बीच उथली चट्टानों की श्रृंखला का पता लगाया था.

समुद्र में इन चट्टानों की गहराई 3 फुट से 30 फुट के बीच है और लंबाई 48 किमी है. साल 1993 में नासा के इस तस्वीर को जारी करने के बाद इसे रामसेतु कहा जाने लगा. हालांकि, कुछ वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक पुल कहते हैं तो पौराणिक मान्यता इसे रामसेतु पुकारती है.

आस्था का आधार ज्‍यादा गहरा

वाल्मिकी रामायण में वर्णन है कि मां सीता को रावण से छुड़ाने के लिये भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई की थी. लंका पर चढ़ाई के लिये समुद्र मार्ग आड़े आ रहा था. जिस वजह से श्रीराम ने वानर सेना की मदद से समुद्र पर पुल बांधा. श्रीराम ने पुल का नाम नल सेतु रखा था क्योंकि नल और नील नाम के वानरों की इंजीनियरिंग का ही नमूना वो पत्थर थे जो पानी में डूबते नहीं थे.
वाल्मिकी रामायण के मुताबिक पांच दिन में सौ योजन लंबे और दस योजन चौड़े पुल का निर्माण हो गया था. इसके अलावा कंबन रामायण, पद्म पुराण, महाभारत, कालिदास के रघुवंश और स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण और अग्नि पुराण में भी श्रीराम के सेतु का वर्णन है.

डूबते नहीं हैं रामसेतु के पत्थर

रामसेतु के लिये उपयोग किये गए न डूबने वाले पत्थर और उनका आपस में जुड़े रहना विज्ञान के लिये भी सवाल है. रामेश्वरम में आई सुनामी के बाद ऐसे कई पत्थर पुल से किनारे तक आ गए जो पानी में डूबते नहीं हैं. इन पत्थरों को लेकर वैज्ञानिक तर्क अलग हैं.

लेकिन आस्था को अपनी धार्मिक मान्यता के लिये इससे ज्यादा बड़े प्रमाण या दूसरे सबूतों की जरूरत महसूस नहीं होती. यही वजह है कि जब सेतुसमुद्रम परियोजना के तहत रामसेतु को तोड़ने की बात आई तो राजनीतिक और धार्मिक विवाद सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा.

क्या है सेतुसमुद्रम परियोजना?

सेतुसमुद्रम भारत और श्रीलंका के बीच तैयार होने वाली परियोजना है. इस परियोजना के तहत रामसेतु के इलाके के समुद्र को गहरा कर उसे समुद्री जहाजों के लायक बनाया जाएगा. परियोजना को पूरा करने के लिये उस संरचना को भी तोड़ा जाएगा जिसकी पहली तस्वीर नासा ने जारी की.

दरअसल, उथला समुद्र होने की वजह से भारत के पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक जाने के लिए एक जहाज को श्रीलंका के पीछे से चक्कर लगाकर जाना पड़ता है.

इस यात्रा में लगभग 780 किलोमीटर की अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ती है. इस यात्रा में 30 घंटे ज्यादा खर्च होते हैं. इसलिये 89 किमी लंबे दो चैनल बनाने की योजना बनाई गई. इससे बड़े-बड़े जहाज बिना श्रीलंका का चक्कर लगाए आ और जा सकें. इससे न सिर्फ समुद्री मार्ग का रास्ता छोटा होगा बल्कि हजारों करोड़ रुपए का तेल भी बचेगा.
एक चैनल रामसेतु पर जबकि दूसरा दक्षिण पूर्वी पामबान द्वीप के रास्ते पर पाक जलडमरू मध्य को गहरा कर के बनाया जाएगा. इस परियोजना से रामेश्वरम में देश का सबसे बड़ा शिपिंग हार्बर बन सकेगा. जबकि तूतिकोरन हार्बर एक नोडल पोर्ट में तब्दील हो जाएगा और तमिलनाडु के तटीय इलाकों में 13 छोटे एयरपोर्ट बन सकेंगे.

केंद्र की यूपीए -2 सरकार और रामसेतु विवाद

साल 2007 में आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने अपने हलफनामे में रामायण के पौराणिक चरित्रों के अस्तित्व को ही नकार दिया था. जिसके बाद बढ़े धार्मिक और राजनीतिक विवाद के चलते यूपीए-2 सरकार ने 29 फरवरी 2008 को सुप्रीम कोर्ट में नया हलफनामा पेश किया था.

सरकार ने कहा था कि रामसेतु के मानव निर्मित या प्राकृतिक बनावट तय करने के लिए कोई वैज्ञानिक विधि नहीं है.

वहीं, केंद्र सरकार ने आस्था का हवाला देते हुए ये तक तर्क दिया था कि कंबन रामायण और पद्म पुराम में जिक्र है कि खुद भगवान श्रीराम ने अपने धनुष से पुल तोड़ दिया था. इसके बाद पुल को लेकर आस्था का प्रश्न नहीं उठता है. न अब राम सेतु है और न राम सेतु तोड़ा जा रहा है.

वहीं सेतु समुद्रम परियोजना पर पर्यावरणविद् डॉ आरके पचौरी के नेतृत्व में बनी उच्च स्तरीय कमिटी ने भी रामसेतु तोड़ने के विकल्प पर ही जोर दिया था.

जबकि तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने 28 मार्च 2012 को केंद्र सरकार से राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का अनुरोध किया था. लेकिन करुणानिधि की डीएमके पार्टी ने केंद्र सरकार से रामसेतु को तोड़ने की मांग की थी.

इसके बाद सेतुसमुद्रम परियोजना का विरोध कर रहे याचिकाकर्ताओं ने वैकल्पिक मार्ग का सुझाव दिया था. यहां तक कि पर्यावरणविद् भी रामसेतु को तोड़ने के खिलाफ थे.

-Legend News

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