DRDO में बनाई गई हाइपरसोनिक विंड टनल, ऐसी सुविधा अब तक केवल रूस और अमेरिका के ही पास

नई दिल्‍ली। भारत के हाइपरसोनिक मिसाइल विकास कार्यक्रम को गति देने के लिए बीते 19 दिसंबर को एक नई अहम सुविधा हासिल हुई है। हैदराबाद में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की प्रयोगशाला में एक नए हाइपरसोनिक विंड टनल का उद्घाटन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने किया है जहां आवाज से 5 से 12 गुना अधिक गति वाली रॉकेट प्रणालियों का परीक्षण किया जा सकता है। ऐसी सुविधा अब तक केवल रूस और अमेरिका ने ही विकसित की है और भारत में इसका विकास पूरी तरह भारतीय औद्योगिक और वैज्ञानिक क्षमता के आधार पर किया गया है। इस सुविधा का इस्तेमाल हाइपरप्लेन जैसी अत्यधिक जटिल अंतरिक्ष व हमलावर मिसाइल प्रणालियों के विकास में किया जा सकता है। दुश्मन के ठिकानों पर मिसाइलों से अचूक हमला करने की भारत की क्षमता इस सुविधा (विंड टनल) की वजह से बेमिसाल होगी। हाइपरसोनिक मिसाइलें जब दुश्मन की धरती पर गिरेंगी तो उसे अपने बचाव के लिए क्षण भर का भी वक्त नहीं मिलेगा।
हाइपरसोनिक मिसाइलों की रेस में तीसरे नंबर पर भारत
हमलावर बैलिस्टिक मिसाइलों के विकास की दौड़ में भारत पीछे रहा लेकिन देर से ही सही, मंजिल तक पहुंच चुका है। भारत ने अब तक 350 किलोमीटर मारक दूरी वाली पृथ्वी और सात सौ से 5,000 किलोमीटर क्षमता वाली अग्नि के अलावा पनडुब्बियों से छोड़ी जाने वाली मिसाइलों का भी सफल विकास किया है। अब भविष्य हाइपरसोनिक मिसाइलों का है जिनके विकास की दौड़ में भारत अमेरिका और रूस के बाद तीसरे स्थान पर चल रहा है। हालांकि चीन ने भी हाइपरसोनिक मिसाइल बनाई है लेकिन वह स्क्रैमजेट तकनीक वाली नहीं है।
भारत की क्षमता से चीन को भी होने लगा खौफ
पारंपरिक मिसाइलों के विकास में विकसित देशों ने कई तरह के रोड़े अटकाए लेकिन इन बाधाओं को पार करते हुए भारतीय मिसाइल वैज्ञानिकों ने इतनी क्षमता तो हासिल कर ही ली है कि भारत से कई गुना अधिक मिसाइल भंडार रखने वाला चीन उससे खौफ खा रहा है। लेकिन अब जो मिसाइल क्षमता भारत अगले कुछ सालों के भीतर हासिल करने जा रहा है वह चीन के लिए भारी चिंता का विषय होगा। हाइपरसोनिक मिसाइलें आवाज से पांच से 8 गुना अधिक गति से जाने की क्षमता वाली कही जा सकती हैं। इससे कम गति से जाने वाली सुपरसोनिक मिसाइलें आवाज से दो-चार गुना अधिक मारक गति वाली होती हैं। आवाज से कम गति से मार करने वाली मिसाइलें सबसोनिक मिसाइल कही जाती हैं।
ब्रह्मोस से दोगुनी रफ्तार वाली मिसाइल चाहिए
भारत में पहले ही रूस के सहयोग से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस का न केवल विकास हो चुका है बल्कि वह तीनों सेनाओं को सौंपी भी जा चुकी है। ब्रह्मोस की मारक गति आवाज से 2.8 गुना अधिक है और फिलहाल यह दुनिया की सबसे तेज गति से जाने वाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। भारतीय मिसाइल वैज्ञानिकों की कोशिश है कि ब्रह्मोस की कम से कम दोगुनी गति से अधिक मारक गति वाली हाइपरसोनिक मिसाइल भारत के मिसाइल भंडार में शामिल हो। दुश्मन की हमलावर बैलिस्टिक मिसाइलों को आसमान में ही मार गिराने वाली एंटी मिसाइल प्रणालियों- अमेरिकी थाड और पैट्रियट तथा रूसी एस-400 का विकास हो चुका है, इसलिए विकसित देशों की सेनाएं ऐसी हमलावर मिसाइलों की तलाश में हैं जिन्हें कोई एंटी मिसाइल बीच आसमान में ही ध्वस्त न कर सके।
HSTDV का सफल परीक्षण कर चुका है DRDO
डीआरडीओ को अब तक इसलिए कोसा जाता रहा है कि भारत की सेनाओं को आत्मनिर्भर बनने में वह खास योगदान नहीं कर सका है। वही डीआरडीओ अब दुनिया की इस सबसे अडवांस्ड शस्त्र प्रणाली से भारत को लैस करने का भरोसा दिला रहा है। इस हाइपरसोनिक कार्यक्रम से भारत को अंतरिक्ष और मिसाइल ताकत बनाने की दिशा में उसने अहम कदम उठाए हैं और इसको कामयाब बनाने के लिए भारत के राजनीतिक नेतृत्व को भी समुचित इच्छा शक्ति दिखानी होगी। बीते सात सितंबर को भारतीय मिसाइल वैज्ञानिकों ने ऐसे ही हाइपरसोनिक तकनीक प्रदर्शक यान (एचएसटीडीवी) का सफल परीक्षण कर हाइपरसोनिक दुनिया में अपने प्रवेश की घोषणा की थी। मिसाइल वैज्ञानिकों का दावा है कि हम चार से पांच सालों के भीतर ही आवाज से छह से सात गुना अधिक गति से मार करने वाली हाइपरसोनिक मिसाइलों का विकास कर सकेंगे।
कैसे काम करती हैं ये मिसाइलें?
इस मिसाइल में जिस इंजन का इस्तेमाल किया गया है, उसे स्क्रैमजेट इंजन कहते हैं जो हाइपरसोनिक गति से रॉकेट को आगे बढ़ाता है। इस इंजन को गति देने के लिए अपने साथ किसी तरह का ईंधन लेकर चलने की जरूरत नहीं होती है बल्कि यह हवा से ही ईंधन पैदा करता है। वायुमंडल में जो हवा होती है उसी से यह इंजन ऑक्सीजन खींचता है और फिर इसे ही जलाकर अपनी ऊर्जा हासिल करता है। हाइपरसोनिक गति से जाने की क्षमता वाले इस स्क्रैमजेट इंजन की बदौलत हाइपरप्लेन का विकास किया जा सकता है जिस पर किसी उपग्रह को सवार कर अंतरिक्ष में भेजा जा सकता है। यह हाइपरप्लेन बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है और यह अंतरिक्ष में उपग्रहों को भेजने वाले रॉकेटों का विकल्प बन सकता है।
सुपर मिलिट्री पॉवर बन जाएगा भारत
फिलहाल जब भी अंतरिक्ष में उपग्रह भेजना होता है, इसके लिए नया रॉकेट बनाना पड़ता है। इसी हाइपरप्लेन से मिसाइलें भी छोड़ी जा सकती हैं। इस तरह के हाइपरप्लेन की परिकल्पना नब्बे के दशक में भारत के महान रक्षा व मिसाइल वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने की थी। तब से ही प्रयोगशाला स्तर पर हाइपरसोनिक प्रणाली की अवधारणा विकसित करने और इसे साकार रूप देने के लिए हैदराबाद के रक्षा संस्थानों में शोध एवं विकास कार्य चल रहा था। इस तरह की अडवांस्ड रक्षा प्रणाली भारतीय सैन्य क्षमता में एक बड़ी खाई को भरने में मदद करेगी। अभी जब भारत बहुपक्षीय सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसी हाइपरसोनिक मिसाइल प्रणाली का स्वदेशी विकास भारतीय राजनीतिक नेतृत्व को दुनिया के बाकी प्रतिद्वंद्वी देशों से निबटने में आत्मशक्ति प्रदान करेगा। इस तरह की हमलावर शस्त्र क्षमता भारत को सुपर मिलिट्री पॉवर का दर्जा दिलाने में भी मददगार साबित होगी।
-एजेंसियां

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