मानव के विचार व वृत्ति का भूमि व Environment पर सीधा प्रभाव

महर्षि अध्यात्म विवि की Drigana kislowski का शोध-निष्‍कर्ष, environment में आध्यात्मिक स्तर पर प्रदूषित हैं भूमि-जल

नई दिल्‍ली। 26 अक्टूबर को हेडलबर्ग, जर्मनी में संपन्न स्थल और चलन-वलन : नागरी और अतिनागरी संशोधन से संबंधित 9 वीं अंतरराष्ट्रीय परिषद में महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की श्रीमती ड्रगाना किस्लौस्की ने प्रतिपादित किया कि आध्यात्मिक और सूक्ष्म पहलुओं को ध्यान में न लेकर भूमि का परीक्षण करने पर हम परीक्षण में ध्यान देने योग्य 50 प्रतिशत सूत्रों से वंचित हो जाते हैं। भौतिकवादी आचरण, आध्यात्मिक साधना का अभाव, स्वभावदोष और अहं के कारण प्रभावित प्रत्येक व्यक्ति के विचार और वृत्ति के कारण Environment में नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते रहते हैं। वे स्पंदन भूमि, जल, वनस्पति और प्राणियों द्वारा ग्रहण भी किए जाते हैं । इसलिए वर्तमान में संसारभर की भूमि और जल आध्यात्मिक स्तर पर प्रदूषित हैं ।

अंतिम संस्कार के स्थानों में सर्वाधिक नकारात्मकता दिखाई दी परंतु उसमें भी दफन भूमि में दहन भूमि की तुलना में अधिक नकारात्मकता थी

इसके साथ ही मानव की त्रुटियों का दुरुपयोग कर नकारात्मक स्पंदन वातावरण की कुल नकारात्मकता बढाते हैं । मानवजाति पर इसका अनिष्ट परिणाम होता है । हम व्यक्तिगत स्तर पर मानवजाति में समग्र परिवर्तन नहीं कर सकते; परंतु आध्यात्मिक साधना करने से हमारे आसपास एक सुरक्षा कवच बनता है तथा हम मानसिक स्थिरता और उच्च गुणवत्तायुक्त जीवन साध्य कर पाते हैं । इस परिषद का आयोजन द स्पेसेस एंड फ्लो रिसर्च नेटवर्क और कॉमन ग्राउंड रिसर्च नेटवर्क ने किया था । इस शोधनिबंध के लेखक महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवले तथा सहलेखक श्री. शॉन क्लार्क और श्रीमती ड्रगाना किस्लौस्की हैं ।

अपने शोधनिबंध में श्रीमती किस्लौस्की ने मिट्टी से प्रक्षेपित होनेवाले सूक्ष्म स्पंदनों का अध्ययन फरवरी 2018 में प्रारंभ किया तथा 9 मास चले एक अद्वितीय प्रयोग के संबंध में जानकारी दी । इस प्रयोग में कुल 24 देशों की मिट्टी के 169 नमूने का अध्ययन यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर उपकरण से किया गया । यह उपकरण भूतपूर्व अणु वैज्ञानिक डॉ. मन्नम मूर्ति द्वारा विकसित किया गया है । इस उपकरण से वास्तु, वस्तु, प्राणी और व्यक्ति की सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा तथा उनका प्रभामंडल मापा जाता है । इस उपकरण द्वारा प्रविष्ट परीक्षण में संसारभर की मिट्टी के अधिकांश नमूनो में सकारात्मक ऊर्जा की तुलना में नकारात्मक ऊर्जा अधिक दिखाई दी । भारत के एक आध्यात्मिक शोध केंद्र के विविध स्थानों की मिट्टी के 8 नमूनों की अत्युच्च सकारात्मकता के कारण प्रयोग के कुल निष्कर्ष पर परिणाम हो रहा था । अतः वे नमूने प्रयोग से हटा दिए गए । शेष मिट्टी के 161 नमूनों में से 79 प्रतिशत नमूनों में कष्टदायक स्पंदन प्रक्षेपित होते दिखाई दिए । केवल 20 प्रतिशत अर्थात 32 नमूनो में सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल दिखाई दिया ।

ये मिट्टी के 32 नमूने क्रोएशिया, श्रीलंका और भारत इन तीन देशों के थे । क्रोएशिया की मिट्टी के नमूनों में से भी केवल एक आश्रम के आसपास के नमूने में सकारात्मकता दिखाई दी । श्रीलंका मे नमूनो में से केवल रामसेतु जैसे तीर्थक्षेत्र के आसपास की मिट्टी के नमूने में ही सकारात्मकता दिखाई दी । इंडोनेशिया और नेपाल के २ नमूनों में भी अंशात्मक सकारात्मकता दिखाई दी; परंतु उसमें भी सकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल नहीं था । अंतिम संस्कार के स्थानों में सर्वाधिक नकारात्मकता दिखाई दी परंतु उसमें भी दफन भूमि में दहन भूमि की तुलना में अधिक नकारात्मकता थी ।

जब Environment में सकारात्मकता होती है, तब पंचमहाभूत स्थिर रहते हैं तथा प्रकृति भी नियंत्रित रहती है ।

संसार भर की मिट्टी के नमूनों में इतनी नकारात्मकता क्यों है ? वर्तमान मे अपने आसपास का संसार निरंतर अस्थिरता की स्थिति में है । किसी भी क्षण सामाजिक अस्थिरता, प्राकृतिक आपदा, आतंकवादी कृत्य अथवा युद्ध का सामना करना पड सकता है । युगों युगों से करोडों लोगों को मृत्यु के मुख में ढकेलनेवाली सामाजिक उथलपुथल और अभी तक हुए युद्ध भले ही विस्मृत हो गए हों; परंतु भूमि ने इन अनिष्ट घटनाआें की स्मृतियों को सहेज कर रखा है ।

भारत के एक आध्यात्मिक शोध केंद्र की मिट्टी के 8 नमूनों में नकारात्मकता न होने तथा असाधारण सकारात्मकता होने की कारणमीमांसा क्या है ? क्योंकि इस आध्यात्मिक शोध केंद्र में न्यूनतम 10-15 संत निवास करते हैं, वहां सभी लोग निरंतर स्वभावदोष निर्मूलन और स्वयं की आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं । वहां अखंड आध्यात्मिक शोध के उपक्रम होते रहते हैं । इसलिए आश्रम में दैवी शक्ति आकर्षित होती है ।

इस प्रयोग का समग्र मानवजाति की दृष्टि से क्या महत्त्व है ? इस प्रयोग से एक नया सूत्र ध्यान में आया कि भूमि का परीक्षण करते समय उसके सूक्ष्म स्पंदनों का भी अध्ययन करना चाहिए । वर्तमान स्थिति में मानवजाति का वातावरण पर शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक स्तर पर सीधा अनिष्ट परिणाम हो रहा है । इसलिए प्रदूषित हुई भूमि और जल का पुनः समाज पर अनिष्ट परिणाम होता है । इसका नकारात्मक परिणाम मानव के मन पर होता है तथा नकारात्मक स्पंदन उसका अनुचित लाभ उठाते हैं । इससे निर्माण हुए दुश्‍चक्र में मनुष्य फंस जाता है और वह आध्यात्मिक साधना रोककर भौतिकवाद का स्वीकार करता है । इसके परिणामस्वरूप समाज में अनेक अनाचारों का संक्रमण होकर कुल जीवन की गुणवत्ता का पतन होता है । प्रमुखता से मानवनिर्मित और नकारात्मक स्पंदनों के सहयोग से वातावरण में बढी नकारात्मकता के कारण पंचमहाभूतों में अस्थिरता निर्माण होती है । फलस्वरूप विचित्र जलवायु और प्रचंड प्राकृतिक आपदा जैसे संकटों का हमें सामना करना पडता है । जब Environment में सकारात्मकता होती है, तब पंचमहाभूत स्थिर रहते हैं तथा प्रकृति भी नियंत्रित रहती है ।

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