नेताओं की बदजुबानी का यह दौर आखिर कहां तक जाएगा, क्‍या इस पर विचार किया?

सात चरणों में संपन्‍न होने जा रहे 2019 के लोकसभा चुनाव नेताओं की बदजुबानी के लिए भी जाने जाएंगे, हालांकि फिलहाल यह कहना मुश्‍किल है कि बदजुबानी का ऐसा सिलसिला आगे भी जारी रहेगा या इसे रोकने के कोई इंतजाम किए जाएंगे।
यूं देखा जाए तो अबकी बार चुनावी रैलियों में बेशक हर नेता ने अपनी बदजुबानी को नई धार दी परंतु इसकी शुरूआत काफी पहले ही हो चुकी थी।
सबसे पहले कब और किसने अपनी जुबान को बेलगाम तरीके से इस्‍तेमाल किया और कौन इसके लिए जिम्‍मेदार है, यह प्रश्‍न उसी प्रकार बेमानी हो जाता है जिस प्रकार यह जानने की कोशिश करना कि पहले अंडा आया या पहले मुर्गी।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि नेताओं की बदजुबानी ने समाज में वैमनस्‍यता को बढ़ावा दिया है। दलगत राजनीति इस कदर समाज पर हावी हो चुकी है कि अपने नेताओं की बदजुबानी को भी उनके समर्थक हर हाल में जायज ठहराने पर तुले रहते हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे को गरियाने वाले नेता तो आपस में मिलने पर परस्‍पर सहोदरों सा व्‍यवहार करते हैं परंतु समर्थकों के बीच एक अघोषित पाला खिंच जाता है।
कौन नहीं जानता कि इन दिनों भाजपा और मोदी को पानी पी-पीकर कोसने वाली मायावती एक-दो नहीं तीन-तीन बार भाजपा की मदद से ही मुख्‍यमंत्री बनी थीं। किसे नहीं पता कि आज मायावती को दौलत की बेटी बताने वाली भाजपा को किसी समय मायावती में एक ‘श्रेष्‍ठ नेता’ के तमाम गुण दिखाई देते थे। मायावती के सर्वाधिक राखीबंध भाई भााजपा में ही हुआ करते थे।
दूसरी ओर जिस समाजवादी पार्टी ने, बकौल मायावती उन्‍हें जान से मारने की कोशिश की, वही मायावती आज अपना समूचा प्‍यार अखिलेश पर उड़ेल रही हैं।
इसी प्रकार कल तक भाजपा और उसके नेतृत्‍व के लिए बिछ जाने वाले नवजोत सिंह सिद्धू आज उसके खिलाफ अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं।
जो प्रियंका चतुर्वेदी चंद रोज पहले तक कांग्रेस के पक्ष में टीवी पर इतनी आक्रोशित हो जाती थीं कि जैसे अभी मारने-मरने पर आमादा हो जाएंगी, उन्‍होंने निजी भावनाएं या कहें कि ”महत्‍वाकांक्षा” पूरी होते न देख शत-प्रतिशत दक्षिणपंथी शिवसेना से हाथ मिलाने में देर नहीं की और ठीकरा यह कहकर फोड़ा कि कांग्रेस में गुंडों को तरजीह दी जा रही है।
जिन दलित नेता उदित राज ने पूरे पांच साल मोदी सरकार में मलाई मारी, वही टिकट न मिलने पर भाजपा के दुश्‍मन खेमे में जा खड़े हुए।
उत्तर प्रदेश में मात्र तीन सीटें पाने को सपा और बसपा नेतृत्‍व के सामने शीर्षासन करने वाले राष्‍ट्रीय लोकदल के मुखिया अजीत सिंह की चर्चा के बिना राजनीति के गिरते स्‍तर की कहानी पूरी नहीं हो सकती। रालोद मुखिया अजीत सिंह हाशिए पर जा पहुंचे लेकिन अपनी फितरत नहीं बदली।
उनकी इस फितरत से वाकिफ लोग संभवत: इसीलिए अब भी यह कहते सुने जा सकते हैं कि 23 मई का इंतजार कीजिए। पता नहीं 23 मई के बाद अजीत सिंह गठबंधन की गांठ तोड़कर भागने का श्रेय लेने में भी विलंब न करें।
आम आदमी पार्टी के खास नेताओं ने भी बदजुबानी की राजनीति में तो अपना उल्‍लेखनीय स्‍थान बनाया ही है, साथ ही सत्ता की भूख पूरी करने के लिए किसी भी स्‍तर तक गिर जाने का भी रिकॉर्ड जिस तेजी से कायम किया है, उसकी मिसाल मिलना मुश्‍किल है।
जिस कांग्रेस के खिलाफ अन्‍ना हजारे के कंधों का सहारा लेकर अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी ने राजनीति के गलियारों में प्रवेश किया, उसी कांग्रेस के साथ ”पैक्‍ट” करने के लिए ”साष्‍टांग दंडवत” हो जाने का ऐसा ‘बेशर्म अंदाज’ शायद ही पहले कभी सामने आया होगा।
मात्र पांच साल पहले कांग्रेसी नेताओं और विशेषकर शीला दीक्षित के लिए अपशब्‍दों का नित नया पिटारा खोलने वाले अरविंद केजरीवाल को इन चुनावों में उन्‍हीं से ”दे दाता के नाम, तुझको अल्‍ला रखे” की तर्ज पर झोली फैलाकर सीटों की भीख मांगते हुए किसने नहीं देखा।
उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्‍चिम तक आज ऐसे राजनीतिक दलों, नेताओं और प्रत्‍याशियों की पूरी फौज मिल जाएगी जिनके शब्‍दकोश में दीन-ईमान जैसा कुछ होता ही नहीं। जो एक मुंह से जिनके लिए गालियां निकालते हैं, दूसरे मुंह से उनकी ‘विरुदावली’ गाने का काम करते हैं।
सच कहा जाए तो मनुष्‍य के रूप में रेंगते दिखाई देने वाले ये ऐसे जीव हैं जिनकी फितरत के सामने गिरगिट के रंग बदलने की कहावत बेमानी हो चुकी है।
सांप जितनी जल्‍दी अपनी केंचुली नहीं बदल सकता, उतनी जल्‍दी यह अपना खोल बदल लेते हैं।
बदजुबानी इनकी इसी फितरत का हिस्‍सा और करवट लेती उस राजनीति का संकेत है जिसमें अंतत: पिसना उस जनता को ही होगा जो अपने मां-बाप से अधिक तरजीह इनके मान-सम्‍मान को देने लगी है।
किसी के भी विचारों से सहमत या असहमत होना हर व्‍यक्‍ति का विशेषाधिकार है लेकिन उन विचारों को थोपने के लिए असभ्‍य आचरण करना, किसी का अधिकार नहीं हो सकता।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का आशय यह नहीं कि जो मुंह में आए वही बकने लगें और किसी के लिए कुछ भी कह दें। हर स्‍वतंत्रता एक जिम्‍मेदारी का बोध कराने के लिए होती है, निरंकुश व्‍यवहार करने के लिए नहीं।
लोगों द्वारा, लोगों के लिए, लोगों की सरकार चुनना भी स्‍वतंत्रता की जिम्‍मेदारी का अहसास बनाए रखने और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था को जीवित रखने का दायित्‍वबोध है। नेता यदि आज इसे नहीं समझ रहे तो हमें समझना होगा।
नहीं समझे तो बदजुबानी का जहर और दलबदुओं की फितरत का प्रभाव हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा।
सत्ता की खातिर नेता हमें भी उस गर्त में ले जाएंगे जहां से निकल पाना हमारे लिए मुश्‍किल होगा, और हमारी यही मुश्‍किल उनके घृणित उद्देश्‍यों को पूरा करने का हथियार बनती रहेगी।
बेहतर होगा कि समय रहते गंभीरता से इस स्‍थित पर विचार करें ताकि आने वाले चुनावों में मुंह खोलने से पहले नेता यह सोचने के लिए मजबूर हो जाएं कि उनकी बदजुबानी उनका राजनीतिक भविष्‍य चौपट कर सकती है। उनकी दिशा ही नहीं, दशा भी निर्धारित कर सकती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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