कुछ मीठा हो जाए

चाकलेट बनाने वाली मशहूर कंपनी कैडबरी, जो पहले कैडबरीज़ के नाम से जानी जाती थी, का नाम भारत में बच्चा-बच्चा जानता है। राखी हो, जन्मदिन हो, दीवाली हो, कोई त्योहार हो, मदर्स डे, फादर्स डे जैसा कोई बहाना हो, कैडबरी का स्पेशल पैक और उसका विज्ञापन सामने आ जाता है। कैडबरी की तरफ से स्पैशल पैक भी आ जाता है और उसका विज्ञापन भी खूब होता है। क्या आपने कभी सोचा है कि जब सारे लोग कैडबरी को जानते ही हैं और यह भी पता है कि हर त्योहार पर उनका पैक आ ही जाएगा तो फिर उन्हें विज्ञापन की ज़रूरत क्यों है? क्या आपने कभी सोचा है कि एक छोटा दुकानदार विज्ञापन क्यों नहीं देता? मैंने उन दुकानदारों से ही पूछा एक बार कि कैडबरी जैसे हर छोटे-बड़े मौके पर विज्ञापन देती है, आप क्यों नहीं देते विज्ञापन? उत्तर वही था जिसकी मुझे उम्मीद थी।

सभी दुकानदारों का कहना था कि कैडबरी तो बड़ी कंपनी है, बहुराष्ट्रीय कंपनी है, बहुत बड़ा बजट है उनके पास इसलिए वो विज्ञापन दे सकते हैं, पैसा खर्च कर सकते हैं। हमारे पास वैसा बजट कहां कि हम पैसा बर्बाद करें इन चीजों पर। यानी अपनी दुकान की पब्लिसिटी का खर्च भी उन्हें पैसा बर्बाद करना मालूम होता है।

हम सब ने गूगल का नाम तो सुना ही है। गूगल जब शुरू हुई थी तो एक गैरेज से शुरू हुई थी, आईफोन दुनिया के सबसे मंहगे फोन हैं, आईफोन बनाने वाली कंपनी जब शुरू हुई थी तो वो भी एक छोटे से गैरेज से शुरू हुई थी, पर नज़रिया क्या था? नज़रिया यह था कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बनना है। पैसे नहीं थे उनके पास। उन्होंने भी पेट काट कर काम शुरू किया, किसी ने बीवी की सैलेरी से घर चलाया किसी ने घर ही गैरेज में बना लिया, पर नज़रिया यही रखा कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बनना है। व्यवसाय की उन्नति के कुछ मूलभूत नियमों का पालन किये बिना हम एक हद से ज्यादा बड़े नहीं बन सकते। छोटे व्यवसायी अक्सर यहीं गलती करते हैं कि वे व्यवसाय की उन्नति के उन मूलभूत नियमों को नहीं समझ पाते और सारी उम्र यही कहते रहते हैं कि हमारे पास वैसा बजट कहां कि हम पैसा बर्बाद कर सकें। ये छोटे व्यवसायी अपनी ही उन्नति के लिए पैसा खर्च करने को निवेश नहीं मानते, खर्च नहीं मानते, सीधा-सीधा पैसे की बर्बादी मानते हैं।

दरअसल कैडबरी बड़ी कंपनी ही इसलिए है क्योंकि वह हमेशा हमारे दिमाग में रहना चाहती है, वरना दस साल के बाद जो नये बच्चे आयेंगे उन्हें कैडबरी का पता नहीं होगा। कैडबरी का विज्ञापन आज बंद हो जाए, तो दस साल, हद बीस साल के बाद कोई नया खिलाड़ी आ जाएगा और कैडबरी खत्म हो जाएगी। इसीलिए कैडबरी का विज्ञापन चलता है ताकि वह हमेशा हमारे दिमाग में बनी रहे। अब सोचिये कि इसका हमारे रिश्तों पर क्या असर है? क्या हम अपने सहकर्मियों, दोस्तों और रिश्तेदारों के दिलो-दिमाग में सबसे ऊपर हैं? बस इसी नुक्ते पर सोचिए, और फिर सोचिए कि रिश्ते जीवंत रखने का क्या मतलब है? क्यों हमें रिश्तों में निवेश करना चाहिए? जरूरत न होने पर भी निवेश करना चाहिए रिश्तों में?

यह समझना कठिन नहीं है कि लोग बूढ़े हो जाते हैं तब कहीं जाकर व्यावहारिक जीवन की कुछ समझ आती है, उस समय जब सारा जीवन बीत गया। जीवन का असली मज़ा खत्म हो गया। शरीर में अब वो दम-खम नहीं, वो लोच नहीं, वो फुर्ती नहीं। मन बच्चा है, पर शरीर अब बिलकुल कच्चा है। दरअसल हम इस विचार से बंधे हुए हैं कि रिटायरमेंट की उम्र 60 वर्ष है। जो बच्चे नौकरी में या व्यवसाय में आये ही हैं उन्हें यह अपना लक्ष्य बना लेना चाहिए कि रिटायरमेंट की आदर्श उम्र 40 वर्ष हो। तब उन्हें काम पर जाने की चिंता न हो और वे अपनी इच्छा से कहीं भी समय बिताने के लिए स्वतंत्र हों। उस वक्त शरीर में दम होता है, बच्चे कुछ बड़े हो चुके होते हैं। तब आपके पास पैसा होना चाहिए, और खाली समय होना चाहिए ताकि आप विश्व भ्रमण पर जाएं और जीवन का आनंद उठाएं। लेकिन हमारे देश में बच्चे सोचते हैं कि बड़ा हो जाउंगा तो मज़े करूंगा। बड़े होकर सोचते हैं कि नौकरी लग जाएगी तो मज़े करूंगा। जॉब के बाद सोचते हैं कि शादी हो जाएगी तो मज़े करूंगा, लेकिन जब शादी हो जाती है तो खर्च और बढ़ जाता है, और जब तक कुछ और समझ में आये, घर में कोई चुन्नू-मुन्नू आ जाता है। इस बीच अगर प्रमोशन हो जाती है या नई नौकरी मिल जाती है तो कार ले लेते हैं, घर ले लेते हैं या बड़ा घर ले लेते हैं और ईएमआई शुरू हो जाती है। फिर बच्चों की पढ़ाई, सेटलमेंट, शादी और फिर लगता है कि रिटायर होंगे तो मन की करेंगे।

बहुत से लोग जो नौकरी में जाते हैं, उनकी इन्क्रीमेंट लगती है और तनख़ाह बढ़ जाती है पर प्रमोशन नहीं होती, क्योंकि वो पांच साल के अनुभव के बाद भी वही कर रहे होते हैं जो नौकरी के पहले साल में करते थे। कुछ नया नहीं सीखा, तो कुछ नया करने का मौका भी नहीं है। मन भी नहीं है कुछ नया करने का और जिंदगी बस चल रही है। रोज उठते हैं, तैयार होते हैं, आफिस जाते हैं, शाम को वापिस आ जाते हैं और आकर बीवी को अपने साथियों की शिकायतें सुनाते हैं। कोई मोटिवेशन न होने के कारण ऐसे लोग आफिस में बस इतना ही काम करते हैं कि नौकरी बची रहे।

कर्मचारियों के साथ अक्सर एक और गड़बड़ हो सकती है। जेट एयरवेज की आर्थिक स्थिति जब खराब थी तो 16 हज़ार लोगों की नौकरी खतरे में थी। बहुत बड़ी खबर बनी थी वह। खूब शोर मचा था। कर्मचारी हाय-हाय कर रहे थे। ये वो लोग थे, जिनका वेतन बहुत बढ़िया था, लेकिन इन में बहुत से लोगों के पास इतनी बचत नहीं थी कि चार महीने भी निकाल सकें, न ही एयरलाइन से बाहर कहीं नौकरी की संभावना थी क्योंकि और कुछ कभी सीखा ही नहीं, जरूरत ही नहीं समझी।

अब कोरोना के कारण फिर से सवा दो करोड़ से अधिक लोगों की नौकरी चली गई है। बहुत से व्यवसायियों के साथ भी यही हुआ है कि उनका व्यवसाय बंद हो गया है। दरअसल हम किसी संकटकालीन स्थिति के लिए तैयारी ही नहीं करते और इसी का हश्र होता है कि जब संकट आता है तो हम धराशायी हो जाते हैं। ज़माना अब डिजिटल का है और हर व्यवसाय धीरे-धीरे पूरी तरह से तकनीक आधारित होता जा रहा है। इसलिए इलाज यही है कि हम नौकरी में हों या उद्यमी हों, तकनीक का प्रयोग करना सीखें, उसे जीवन में उतारें और ऐसा कुछ भी सीखें ताकि अनपेक्षित स्थितियों के लिए भी तैयार हों, संकटकालीन स्थिति के लिए भी तैयार हों। ऐसा करें तो जीवन में मिठास आयेगी और हम हमेशा कह सकेंगे कि कुछ मीठा हो जाए।

PK Khurana

– पी. के. खुराना,
हैपीनेस गुरू , मोटिवेशनल स्पीकर

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