हिन्दू Swastik सकारात्‍मक व नाजी Swastik से नकारात्‍मक तरंगों का होता है प्रक्षेपण

स्पेन। महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से स्पेन के अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में शोधनिबंध की प्रस्तुति की गई जिसमें बताया गया कि हिन्दुओं के धार्मिक चिह्न Swastik से सकारात्मक, तो नाजियों के Swastik चिह्न से नकारात्मक तरंगों का प्रक्षेपण होता है।

आज अनेक जालस्थानों के माध्यम से मूल ‘हिन्दू स्वस्तिक’ चिह्न तथा ‘नाजी स्वस्तिक’ चिह्न में भेद स्पष्ट करनेवाले तथ्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं; किंतु आज हम भौतिक एवं ऐतिहासिक भेदों से आगे जाकर इन दोनों स्वस्तिकों में अंतर पर ध्यान देंगे । इसके लिए हम इन दोनों स्वस्तिकों से प्रक्षेपित होनेवाली तरंगों का अध्ययन करेंगे । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के शोध केंद्र में वैज्ञानिक उपकरण आणि सूक्ष्म परीक्षण की सहायता से इस विषय में शोध किया गया । इससे दिखाई दिया कि नाजियों का स्वस्तिक धारण करनेवालों पर प्रचुर मात्रा में नकारात्मक प्रभाव पडा है, तो हिन्दुओं का धार्मिक चिह्न स्वस्तिक धारण करनेवाले पर प्रचुर मात्रा में सकारात्मक प्रभाव पडा है ।

Hindu Swastik is positive and negative waves from negative swastika launches
Hindu Swastik is positive and negative waves from negative swastika launches

महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की श्रीमती ड्रगाना किस्लौस्की ने स्पेन में हुए अंतराष्ट्रीय परिषद में यह निष्कर्ष रखा । 25 एवं 26 अप्रैल को स्पेन स्थित ग्रैनडा विश्‍वविद्यालय की ओर से आयोजित ‘समाज में विद्यमान धर्म एवं अध्यात्म’ के संदर्भ में वैज्ञानिकों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न हुआ । इस सम्मेलन में श्रीमती किस्लौस्की ने ‘हिन्दू एवं नाजी स्वस्तिक की आध्यात्मिक सच्चाई’, यह शोधनिबंध प्रस्तुत किया । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी इस शोधनिबंध के लेखक हैं तथा श्रीमती ड्रगाना किस्लौस्की एवं श्री. शॉन क्लार्क सहलेखक हैं ।

श्रीमती ड्रगाना किस्लौस्की ने विविध प्रतीकों के विषय में विशेषरूप से हिन्दू एवं नाजी स्वस्तिक के अंतर्गत किए गए विविध प्रयोगों के विषय में विस्तार से जानकारी दी । इसमें विशेषरूप से उन्होंने भूतपूर्व परमाणु वैज्ञानिक डॉ. मन्नम् मूर्ति के प्रयासों से विकसित उपकरण, ‘यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर’ (यू.टी.एस.) उपकरण की सहायता से किए गए शोध की जानकारी दी है । इस उपकरण की सहायता से सजीव अथवा निर्जीव वस्तु की सकारात्मक एवं नकारात्मक ऊर्जा और प्रभामंडल मापा जाता है । इस शोध से पता चला कि मूल हिन्दू धार्मिक प्रतीक स्वस्तिक में प्रचुर मात्रा में सकारात्मक ऊर्जा होती है तथा नाजियों के स्वस्तिक में प्रचुर मात्रा में नकारात्मक ऊर्जा होती है ।

श्रीमती किस्लौस्की ने, ‘नाजी अपनी भुजाओं पर जिस पद्धति से स्वस्तिक चिह्न बांधते थे’, उससे तथा ‘मूल हिन्दू प्रतीक स्वस्तिक को भुजाआेंपर बांधने से’ क्या होता है, इसका अध्ययन करने के लिए किए गए प्रयोग की जानकारी दी । इस प्रयोग में सम्मिलित दो लोगों में से पहले को आध्यात्मिक कष्ट था; इसलिए प्रयोग से पहले भी उसके शरीर से नकारात्मक तरंगें प्रक्षेपित हो रही थीं । परीक्षण से पहले, दूसरे व्यक्ति से सकारात्मक तरंगों का प्रक्षेपण हो रहा था । पहले व्यक्ति की भुजा पर नाजी स्वस्तिक बांधने पर उसकी नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल दोगुना (5.73 मीटर) हो गया । दूसरे व्यक्ति में 5 मीटर लंबा नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल बना तथा उसकी पहले की सकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो गई ।

उक्त परीक्षण के पश्‍चात उनकी भुजाओं पर से नाजी स्वस्तिक उतारने के पश्‍चात तथा दोनों व्यक्ति परीक्षण से पहले की मूल स्थिति में आने तक, परीक्षण रोक दिया गया । मूल स्थिति में लौटनेपर उनकी भुजाओ पर हिन्दू स्वस्तिक बांधा गया । उसके 20 मिनट पश्‍चात किए गए परीक्षण में पहले व्यक्ति में विद्यमान नकारात्मक ऊर्जा का प्रभामंडल पूर्णरूप से नष्ट हुआ दिखाई दिया । इतना ही नहीं, उस व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न हुई, जिसका प्रभामंडल 1 मीटर अर्थात लगभग दोगुना था । ये दोनों चिह्न किस प्रकार शक्तिशाली हैं, यह भी इस प्रयोग में दिखाई दिया । नाजी स्वस्तिक धारण करनेवाले व्यक्तिपर इसका प्रचुर मात्रा में नकारात्मक प्रभाव पडा, परंतु प्राचीन भारतीय स्वस्तिक का बडी मात्रा में सकारात्मक प्रभाव दिखाई दिया ।

अंत में शोधनिबंध का सार रखते हुए श्रीमती ड्रगाना किस्लौस्की ने कहा कि प्रत्यके प्रतीक से सूक्ष्म तरंगों का प्रक्षेपण हता है । ये तरंगें सकारात्मक अथवा नकारात्मक हो सकती हैं । अधिकतर धार्मिक नेता अपने धार्मिक प्रतीकों से प्रक्षेपित होनेवाली सूक्ष्म तरंगों की ओर ध्यान नहीं देते । ऐसे प्रतीकों में किसी प्रकार का परिवर्तन करने पर, उनसे प्रक्षेपित होनेवाले तरंगों में परिवर्तन होता है । फलस्वरूप इन तरंगों से भक्तों को हानि हो सकती है । अतः कलाकार अथवा धार्मिक नेताओ को किसी भी धार्मिक प्रतीक में कोई परिवर्तन करने से पहले इस महत्त्वपूर्ण बात को ध्यान में रखना चाहिए; क्योंकि इसके दूरगामी परिणाम होते हैं ।

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