हिन्दी-लेखन: क्यों जरूरी है शब्दों की सही वर्तनी?

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हिन्दी-लेखन: क्यों जरूरी है शब्दों की सही वर्तनी?

देवनागरी लिपि की ठीक समझ बना ली जाए तो हिन्दी-लेखन में शब्दों की वर्तनी की समस्या काफ़ी हद तक हल हो जानी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा है नहीं। हिन्दी लिखने में लोग उस अँग्रेज़ी से भी ज़्यादा ग़लतियाँ करते दिखाई देते हैं, जिसमें कि बग़ैर हिज्जा-रटाई के एक भी शब्द लिख पाना मुश्किल है। अँग्रेज़ी के प्रति शुद्धता के आग्रह का हाल यह है कि इन दिनों दैनिक समाचार पत्रों तक में, जहाँ समय की कमी और ‘डेडलाइन’ का दबाव हमेशा सिर पर सवार रहता है, अँग्रेज़ी शब्दों के सही उच्चारण के लिए ‘अ’ और ‘ओ’ के बीच की अर्धविवृत ध्वनि के लिए चन्द्र का चिह्न ( ॅ ) बड़ी ज़िम्मेदारी से लगाया जाने लगा है। अँग्रेज़ी को बिगड़ने से बचाने और हिन्दी को व्याकरण के बन्धनों से मुक्त करने की इस प्रगतिशील मानसिकता का दर्शन और ठीक से करना हो तो समाचार पत्रों के साथ-साथ टीवी चैनलों में लगातार चलने वाली समाचार पट्टियों में प्रयोग किए जा रहे बॉन्ड, लॉन्च, ब्रॉन्ज, फॉन्ट, पॉन्ड, सॉन्ग, रॉन्ग, लॉन्ग जैसे शब्दों पर दृष्टि डालिए। यह बात समझ से परे है कि जब लिखना कम्प्यूटर के कुञ्जीपटल पर अङ्गुलियाँ टेककर ही है तो इन शब्दों को बॉण्ड, लॉञ्च, फॉण्ट, पॉण्ड, सॉङ्ग, रॉङ्ग, लॉङ्ग जैसे शुद्ध रूपों में लिखने में कौन-सा अतिरिक्त ज़ोर पड़ता है? क्या अँग्रेज़ी उच्चारण को शुद्ध बनाए रखने के लिए हिन्दी को अशुद्ध बनाना ज़रूरी है?

इस प्रवृत्ति के पीछे दो ही कारण समझ में आते हैं। एक तो यह कि ऊँचे ओहदे सँभाल रहे बहुत से लोग नागरी वर्णमाला का साधारण-सा नियम नहीं जानते कि पञ्चमाक्षरों का प्रयोग किन स्थितियों में होता है; और दूसरे, यह कि हिन्दी के सरलीकरण और उसे व्याकरण की बन्दिशों से बाहर निकालने का भूत कुछ लोगों पर कुछ ज़्यादा ही सवार है। वास्तव में यह साधारण-सा नियम हृदयङ्गम करने में कोई बहुत बड़ी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि अनुनासिक व्यञ्जन स्ववर्गीय व्यञ्जनों से पूर्व आएँ तो उनके ङ्, ञ्, ण्, न्, म् रूपों का प्रयोग होता है। यह छोटी-सी समझदारी पैदा कर लेने में भला क्या बुराई है कि नागरी वर्णमाला में कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग तथा पवर्ग के रूप में पाँच वर्गों का विभाजन गहरे ध्वनि वैज्ञानिक कारणों के चलते हैं। यों, इन नियमों को भाषा-व्याकरण की किसी भी किताब में देखा जा सकता है, पर सीधी-सपाट सी बात यह है कि जब हज़ारों-लाखों अँग्रेज़ी शब्दों की अलग-अलग हिज्जे-रटाई का पुरुषार्थ अनथक भाव से किया-कराया जा सकता है तो फिर क्या संसार की सर्वाधिक विज्ञानसम्मत एक लिपि की वैज्ञानिकता की रक्षा के लिए दो-चार आसान से नियम नहीं समझे-समझाए जा सकते?

जो लोग सरलीकरण के तर्क पर हिन्दी भाषा में वर्तनी के प्रति उच्छृङ्खल व्यवहार के आदी हैं उन्हें याद रखना चाहिए कि सरल का मतलब आमजन के लिए सम्प्रेषण योग्य आसान शब्दों का प्रयोग होना चाहिए न कि अपने अज्ञान और हठ को जायज़ ठहराने की पिनक में शब्दों को ग़लत ढङ्ग से लिखना। इस प्रवृत्ति से भाषा सरल नहीं, उलटे कठिन और दुर्बोध बनेगी। उदाहरण के लिए ‘शकल’ शब्द का अर्थ होता है ‘टुकड़ा’; अब यदि इसे सरलीकरण के नाम पर ‘सकल’ लिखा जाने लगे, जिसका अर्थ होता है ‘सम्पूर्ण’, तो भला बताइए भाषा कठिन बनेगी या सरल? क्या ‘आप्रवासी’ और ‘अप्रवासी’ को वर्तनी के एक ही तराजू में तौला जा सकता है? ‘आप्रवासी’ का अर्थ है ‘बाहर से आकर प्रवास करने वाला’, जबकि ‘अप्रवासी’ का अर्थ होगा ‘प्रवास न करने वाला’। यहाँ स्वीकारात्मक अर्थ वाले ‘आ’ और नकारात्मक अर्थ वाले ‘अ’ उपसर्गों में अन्तर स्पष्ट है। इसी तरह ‘लुटना’ में मात्रा की ज़रा-सी असावधानी हो जाय तो यह बड़ी आसानी से ‘लूटना’ में बदल जाएगा। क्या आप ‘खोलना’ को ‘खौलना’, ‘गगरा’ को ‘घघरा’, ‘गदा’ को ‘गधा’, ‘सुर’ को ‘सूर’, ‘साँस’ को ‘सास’ लिखे जाने का समर्थन कर सकते हैं?

उर्दू में तो नुक़्ते के हेरफेर से भी अर्थ का अनर्थ हो जाता है। ‘ज़िला’ का मतलब होता है—जनपद, लेकिन ज़रा-सी चूक में यदि इसमें से नुक़्ता ग़ायब कर दिया जाय तो यह आभा और चमकने का अर्थ देने लगता है। इसी से समझ सकते हैं कि ‘ज़िलेदार’ और ‘जिलेदार’ के अर्थ में कितना अन्तर होगा। हम सब ‘कमर’ को अच्छी तरह जानते ही हैं, पर इसे नुक़्ता लगाकर ‘क़मर’ बना दिया जाय तो इसका मतलब चन्द्रमा हो जाता है। इसी तरह अरबी में ‘क़दर’ का मतलब है–आदेश, पराकाष्ठा, तक़दीर वग़ैरह, पर नुक़्ता हटाने पर अँधकार और मैलेपन का अर्थ देने लगता है। फारसी में ‘कदर’ केवड़े का पेड़ होता है। ‘द’ को हल् करके ‘क़द्र’ लिख दिया जाय तो शायद आपको इसका अर्थ समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। आप जाने कितनों की क़द्र करते होंगे और आपके भी जाने कितने क़द्रदान होंगे। ‘क़द’ शरीर की लम्बाई का अर्थ देता है तो ‘कद’ कोशिश, हठ, वैमनस्य वग़ैरह हो जाता है। ऐसे सैकड़ों शब्द हैं।

स्पष्ट है कि शब्दों की वर्तनी में यदि एकरूपता और स्थिरता का अभाव होगा तो भाँति-भाँति के भ्रम पैदा होंगे। भाषा के विकास और उसकी दीर्घजीविता के लिए शब्दों के स्वरूप में स्थिरता ज़रूरी है। ऐसा न हो तो आप आसानी से कल्पना कर सकते हैं कि विज्ञान और गणित जैसे विषयों में कैसे-कैसे अनर्थ और अस्पष्टता की स्थितियाँ दिखाई देंगी। संस्कृत जैसी मृतप्राय भाषा के पुराने से पुराने शब्द आज भी पूरी स्पष्टता के साथ उच्चारित किए जाते हैं, परन्तु अँग्रेज़ी जैसी वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित भाषा के ढेर सारे शब्द दुर्बोध हो चुके हैं तो इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि संस्कृत के शब्दों की वर्तनी हमेशा स्थिर रही है, जबकि अँग्रेज़ी के बहुत सारे शब्द अपना मूल स्वरूप खो चुके हैं।

  • संत समीर जी की फेसबुक वॉल से साभार

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