Hindi diwas: ऐसा भी कहीं होता है कि मारौ घोंटूं फूटी आंख

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ब्रज में ये कहावत बहुत प्रचलित है- ”मारौ घोंटूं फूटी आंख”, यानि कुछ किया और कुछ और ही हो गया, यूं इसके शब्‍द विन्‍यास से आप लोग समझ पा रहे होंगे कि जब घुटने में मारने से आंख कैसे फूट गई, तो आप सही सोच रहे हैं और यही तो मैं भी कहना चाह रही हूं कि घुटने में मारने से आंख नहीं फूटा करती। और जब ऐसा किया जा रहा हो तो निश्‍चित जानिए कि समस्‍या को छुपाया जा रहा है और इसके हल करने में बेइमानी की जा रही है क्‍योंकि सही इलाज के लिए जब तक समस्‍या की जड़ तक न पहुंचा जाए तब तक उसका हल हो पाना असंभव होता है।

इसी कहावत ”मारौ घोंटूं फूटी आंख” का उदाहरण आज का हिंदी दिवस है।
सोशल मीडिया से लेकर चर्चाओं-गोष्‍ठियों में आज पूरा देश हिंदीमय दिखाई देगा मगर इधर दिवस समाप्‍त, उधर हिन्‍दीप्रेम गायब। कॉन्‍वेंट स्‍कूलों में अपने बच्‍चों को पढ़ाकर इतराने वाली ‘मॉम्‍स’, हिन्‍दी पर ”डिबेट” के लिए इंटरनेट की ”हेल्‍प” से बच्‍चों को ”डिक्‍टेट” कर रही हैं और सिखाते हुए पूछ भी रही हैं कि ”टेल मी बेटा, हू इज मैथिलीशरण गुप्‍त, यू मस्‍ट लर्न योर पॉइम व्‍हिच आई हैव गिव इट टू यू, गिव योर बेस्‍ट इन क्‍लास” ।

राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी की इस दशा (आशावादी होने के कारण मैं इसे अभी दुर्दशा नहीं कहूंगी) पर उक्‍त कहावत ”मारौ घोंटूं फूटी आंख” एकदम खरी उतरती है। बच्‍चे में प्रथम संस्‍कार देने वाला घर और मां ही जब बच्‍चे को अपनी रोमन लिपि में हिन्‍दी पर डिबेट के लिए लेसन देगी, तो कोई भी सरकार या कोई भी भाषाविज्ञानी एड़ीचोटी का जोर लगा ले, वह बच्‍चे को हिन्‍दी नहीं सिखा सकता। और यदि सिखा भी दी, तो अपनी राष्‍ट्रभाषा के लिए सम्‍मान नहीं पैदा कर सकता। बात यहां भी वही है कि रोग हमारे घर में है और इसका इलाज हम गोष्‍ठियों-परिचर्चाओं में ढूढ़ रहे हैं।

”मारौ घोंटूं फूटी आंख” कहावत का लब्‍बोलुआब ये है कि घुटने में मारने से आंख नहीं फूटा करती, जिस तरह पेट का रोग ईसीजी टेस्‍ट से ठीक नहीं हो सकता, ठीक उसी तरह हिन्‍दी को भी रोमन ट्रांसलेशन के ज़रिये ”अपनी राष्‍ट्रभाषा” नहीं बनाया जा सकता। हमारी नज़र में ये कहावतें भले ही हमसे कम शिक्षितों ने बनाई हों मगर ये रोजमर्रा की ज़िंदगी में जितना कुछ सिखा जाती हैं, उतना तो आज हम तमाम डिग्री लेकर भी नहीं सिखा सकते। ये भारतवर्ष अपनी जिजीविषाओं के लिए जाना जाता है और पेशे से गद्दारी हो या भाषा से धोखा, दोनों ही अपने अपने अस्‍तित्‍व के लिए खतरनाक हैं। हम मुलम्‍मों के सहारे कब तक अपना और आपनी भाषाओं का विकास कर पाऐंगे।

बेहतर तो यही होगा कि हम घुटने पर मार से आंख फूट जाने का इल्‍ज़ाम ना लगाएं वरना समस्‍या जस की तस बनी रहेगी और यह स्‍थिति इलाज न करके इल्‍ज़ाम तक ही सीमित रह जाएगी। साथ ही समस्‍या वहीं के वहीं रहेगी क्‍योंकि यह तरीका समस्‍या से मुंह फेर लेने के अलावा कुछ है ही नहीं।

– सुमित्रा सिंह चतुर्वेदी