हेमा मालिनी से टूटा भाजपा का भ्रम: 2019 के लिए नए उम्‍मीदवार की तलाश शुरू

श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली मथुरा से 2019 के लोकसभा चुनावों में हेमा मालिनी के स्‍थान पर भाजपा किसी अन्‍य को उम्‍मीदवार बनाने का मन बना चुकी है। यह जानकारी भाजपा के ही उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों ने दी है।
इन सूत्रों का कहना है कि भाजपा का हेमा मालिनी को लेकर भ्रम टूट चुका है। पार्टी को इस बात का भरोसा नहीं रहा कि मथुरा से हेमा मालिनी दोबारा अपनी जीत सुनिश्‍चित करने में सक्षम हैं।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक गत दिवस प्रधानमंत्री ने लोकसभा सांसदों के साथ बैठक में जो चेतावनी दी थी, उसके केन्‍द्र में उत्तर प्रदेश के सांसद तो थे ही, हेमा मालिनी जैसे जनप्रतिनिधि भी थे जिनकी निष्‍क्रियता से क्षेत्रीय जनता के साथ-साथ खुद पीएम एवं पार्टी अध्‍यक्ष अमित शाह भी संतुष्‍ट नहीं हैं।
उल्‍लेखनीय है कि प्रधानमंत्री ने स्‍पष्‍ट तौर पर कहा था कि बार-बार ”व्‍हिप” जारी करने के बावजूद कुछ सांसदों का सदन में उपस्‍थित न होना यह दर्शाता है कि वह पार्टी तथा अपनी जिम्‍मेदारी के प्रति गंभीर नहीं हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने इस आशय की स्‍पष्‍ट चेतावनी भी दी कि 2019 के चुनाव में वह ऐसे हर सांसद का लेखा-जोखा देखकर ही उन्‍हें उम्‍मीदवार बनाएंगे। यदि वह पार्टी तथा क्षेत्रीय जनता की अपेक्षाओं पर खरे उतरते दिखाई नहीं देते तो उनका पत्ता कटना तय समझा जाए।
गौरतलब है कि हेमा मालिनी की भी गिनती भाजपा के उन सांसदों में होती है जिनकी सदन में अनुपस्‍थिति पर सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। इसके अलावा अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा में भी वह अपनी सुविधा के अनुसार उपस्‍थित होती हैं, न कि जनता की जरूरत के हिसाब से।
मथुरा की जनता का कहना है कि सांसद महोदया अपने क्षेत्र की जगह छोटे पर्दे पर जरूर दिन में कई-कई बार दिखाई दे जाती हैं। कभी एक खास कंपनी का वाटर प्‍यूरीफायर (RO) बेचते हुए तो कभी उसी कंपनी के वेजिटेबल एंड फ्रूट प्‍यूरीफायर की वकालत करते हुए। पतंजिल के बिस्‍किट बेचते भी उन्‍हें टीवी पर देखा जा सकता है लेकिन अपने संसदीय क्षेत्र में वह कब आती हैं और कब चली जाती हैं, इसकी जानकारी उनके निजी सचिव के अतिरिक्‍त किसी को नहीं होती।
कहने को प्रधानमंत्री के आह्वान पर भगवान श्रीकृष्‍ण की आल्‍हादिनी शक्‍ति राधारानी का गांव ”रावल” उन्‍होंने विकास कार्य कराने के लिए गोद लिया था लेकिन उसका कितना विकास हुआ है, उसकी जानकारी वहां जाकर तथा गांववासियों से पता करके की जा सकती है। यह बात अलग है कि अब उन्‍होंने फिर जनपद का एक अन्‍य गांव पैठा भी गोद लिया है।
इसके अलावा अखबारों में प्रकाशित समाचारों से यह भी जानकारी मिलती रही है कि उन्‍होंने मथुरा के ”जंक्‍शन” रेलवे स्‍टेशन पर अपनी सांसद निधि से कुछ कुर्सियां लगवाई हैं।
उस रेलवे स्‍टेशन पर जिसे रेल विभाग वर्षों पहले देश के मॉडल रेलवे स्‍टेशन बनाने का चुनाव कर चुका है और जहां कई वर्षों से कार्य प्रगति पर है। हालांकि यह प्रगति कितनी हुई है और रेल विभाग मथुरा जंक्‍शन को कब तक मॉडल स्‍टेशन के रूप में पेश कर पाएगा, इन प्रश्‍नों के उत्तर मिलना बाकी हैं।
खुद हेमा मालिनी के अनुसार उनके आराध्‍य भगवान श्रीकृष्‍ण हैं और इसलिए कृष्‍ण की क्रीड़ा स्‍थली वृंदावन में व्‍याप्‍त गंदगी उन्‍हें परेशान करती है। वह जब कभी वृंदावन जाती हैं तो वहां फैले गंदगी के साम्राज्‍य को देखकर व्‍यथित भी होती हैं। सांसद महोदया अपनी व्‍यथा तो व्‍यक्‍त करती हैं परंतु साफ-सफाई के लिए शायद ही कुछ करती हों। वृंदावनवासी और वहां बाहर से हजारों की तादाद में हर दिन आने वाले श्रृद्धालु कहते हैं कि जितना ध्‍यान हेमा जी व्‍यथा व्‍यक्‍त करने पर देती हैं, उतना भी यदि सफाई कराने पर दिया होता तो तीन वर्ष के उनके कार्यकाल में वृंदावन की सूरत कुछ जरूर बदल जाती।
हेमा मालिनी की इस व्‍यथा-कथा पर क्षेत्रीय नागरिक यह कहने से नहीं चूकते कि यदि सांसद महोदया प्रधानमंत्री के ”स्‍वच्‍छ भारत” अभियान की ही लाज रख लेतीं तो उन्‍हें व्‍यथित नहीं होना पड़ता।
बॉलीवुड से ड्रीम गर्ल का खिताब प्राप्‍त हेमा मालिनी के पति धर्मेन्‍द्र भी एक बार भाजपा की ही टिकट पर राजस्‍थान के बीकानेर से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे।
बताया जाता है कि ”ही मेन” कहलाने वाले अभिनेता धर्मेन्‍द्र ने भी चुनाव जीतने के बाद कभी बीकानेर की ओर मुड़कर देखना मुनासिब नहीं समझा लिहाजा राजनीति ने उन्‍हें सन्‍यास दे दिया।
हेमा मालिनी इससे पहले उच्‍च सदन राज्‍यसभा की सदस्‍य भी रह चुकी हैं लेकिन लोकसभा में संभवत: यह उनका पहला अनुभव है।
उनका अनुभव जैसा भी हो किंतु मथुरा की जनता का बाहरी प्रत्‍याशियों को लेकर अनुभव कभी अच्‍छा नहीं रहा। जिसमें अब हेमा मालिनी का नाम भी जुड़ गया है।
हरियाणा से आकर मथुरा में लोकसभा का चुनाव जीतने वाले मनीराम बागड़ी हों या फिर महामंडलेश्‍वर जैसी भारी-भरकम उपाधि प्राप्‍त डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी जी महाराज, सभी ने मथुरा की जनता को निराश किया।
साक्षी जी महाराज को तो मथुरा की जनता ने दो बार लोकसभा भेजा किंतु उन्‍होंने दोनों बार साबित किया कि वह गेरुआ भले ही पहनते हों परंतु अवसरवादी उतने ही हैं, जितना कोई दूसरा खांटी राजनेता हो सकता है।
2009 के लोकसभा चुनावों में मथुरा की जनता ने एकबार फिर बाहरी प्रत्‍याशी पर भरोसा करके राष्‍ट्रीय लोकदल के युवराज तथा जाट नेता चौधरी अजीत सिंह के पुत्र जयंत चौधरी को भारी मतों से विजयी बनाकर लोकसभा सदस्‍य बनवाया किंतु जयंत चौधरी अपने किसी वायदे पर खरे नहीं उतरे। उन्‍होंने साबित कर दिया कि बाहरी प्रत्‍याशी पर भरोसा करके मथुरावासियों ने जो भूल की है, उसका खामियाजा भुगतना होगा।
इस सबके बाद भी नरेन्‍द्र मोदी के कहने पर 2014 के चुनावों में कृष्‍ण की नगरी के वाशिंदों ने हेमा मालिनी के सिर जीत का सेहरा बंधवाया परंतु हेमा मालिनी उनके लिए अपने खिताब ”ड्रीम गर्ल” से अधिक कुछ साबित नहीं हुईं।
बात चाहे पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले मथुरा के जवाहरबाग कांड की रही हो अथवा योगी सरकार के पदार्पण करते ही मयंक चेन पर हुई दो सर्राफों की हत्‍या तथा करोड़ों रुपए लूटकर ले जाने जैसी वारदात की, स्‍थानीय सांसद हेमा मालिनी दोनों वक्‍त अपने मूल कार्य में व्‍यस्‍त रहीं। उन्‍हें पीड़ितों के परिवार से तत्‍काल मिलने का समय नहीं मिला। जवाहर बाग कांड में एसपी सिटी तथा एसओ की हत्‍या हो जाने के बाद भी वह तब मथुरा आईं जब पार्टी हाईकमान ने उन्‍हें इसके लिए बाध्‍य किया।
पार्टी सूत्र तो यह भी बताते हैं कि हेमा मालिनी के अपनी ही पार्टी के स्‍थानीय पदाधिकारियों से भी संबंध अच्‍छे नहीं हैं। पिछले दिनों एक पदाधिकारी का उनके निजी सचिव से भी अच्‍छा-खासा झगड़ा हो गया था क्‍योंकि उनके निजी सचिव खुद को असंवैधानिक तौर पर सांसद प्रतिनिधि कहते हैं।
पार्टी के स्‍थानीय पदाधिकारी साफ-साफ बताते हैं कि एकबार को शहरी क्षेत्र से निर्वाचित पार्टी के विधायक और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री सहित सरकार के प्रवक्‍ता का पदभार संभालने वाले श्रीकांत शर्मा से मुलाकात संभव है किंतु मात्र सांसद होते हुए हेमा मालिनी से मिलना आसान नहीं है।
पार्टीजन यह भी कहते हैं कि बेशक महिला तथा प्रसिद्ध अभिनेत्री होने के नाते हेमा मालिनी के साथ कुछ खास कारण जुड़े हैं किंतु कोई ”पद” मेल अथवा फी-मेल नहीं होता। जनता तथा पार्टी के कार्यकर्ता दोनों के लिए उनकी उपलब्‍धता उतनी ही जरूरी है जितनी किसी भी जनप्रतिनिधि की होनी चाहिए क्‍योंकि इनकी अपनी समस्‍याएं होती हैं और उन समस्‍याओं के समाधान के लिए ही उन्‍हें चुना जाता है।
यूं हेमा मालिनी ने शहर के मध्‍य कोई अपना ऑफिस बनाया हुआ है और उनके निजी सचिव कहते हैं कि वहां आने वाले लोगों की समस्‍याओं को भी पूरी गंभीरता से सुनकर उनका निराकरण कराया जाता है लेकिन जनता उनके इस दावे से सहमत नहीं है।
इधर, यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के मामले में भी हेमा मालिनी कहीं सक्रिय दिखाई नहीं देतीं जबकि यह मामला मथुरा ही नहीं समूचे ब्रज क्षेत्र की आस्‍था से जुड़ा है और इसके लिए कुछ लोग अपने स्‍तर पर हरसंभव प्रयास कर रहे हैं।
यमुना प्रदूषण के मामले में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय तथा नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल ने काफी आदेश-निर्देश स्‍थानीय प्रशासन को दे रखे हैं किंतु उन पर अमल कभी नहीं हुआ। स्‍थानीय सांसद होने के नाते हेमा मालिनी ने कभी इन आदेश-निर्देशों का अनुपालन कराने में कोई रुचि ली हो अथवा जिला प्रशासन से जवाब तलब किया हो, इसका कोई उदाहरण सामने नहीं आया।
जाहिर है कि यह सारी बातें न केवल पार्टी हाईकमान तक बल्‍कि पीएमओ तक भी पहुंच रही हैं और भाजपा किसी भी सूरत में 2019 के लिए कोई जोखिम उठाना नहीं चाहती। पार्टी तो 2024 तक की प्‍लानिंग करके चल रही है ताकि नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व में वह उस नए भारत का निर्माण कर सके जिसकी परिकल्‍पना कर रखी है और जिसका जिक्र पीएम भी अपनी प्रत्‍येक सार्वजनिक सभा में करते हैं।
पार्टी के राष्‍ट्र स्‍तरीय सूत्र और यहां तक कि आरएसएस के सूत्र भी कहते हैं कि तीन साल से अधिक के कार्यकाल में हेमा मालिनी ने ऐसा कोई उल्‍लेखनीय कार्य नहीं किया जिसके लिए उन पर 2019 में दांव लगाया जा सके।
हेमा मालिनी को पार्टी एवं संघ की मंशा का अहसास न हुआ हो, ऐसा हो नहीं सकता किंतु लगता है उनके लिए जनहित व पार्टीहित से कहीं अधिक निजी व्‍यावसायिक हित ऊपर हैं इसलिए उनके पास मनोरंजन जगत से जुड़ी गतिविधियां सोशल साइट्स पर शेयर करने का वक्‍त तो होता है परंतु जनसमस्‍याएं शेयर करने का समय नहीं होता।
हो सकता है कि उनके लिए राजनीति भी मनोरंजन का एक ऐसा माध्‍यम हो जिससे जितनी भी संभव हो सके दौलत और शौहरत तो हासिल की जाए लेकिन गंभीरता से लेना जरूरी नहीं क्‍योंकि विशिष्‍टता ”आम” बन जाने में नहीं, ”खास” बने रहने में है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी