अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू, निर्मोही अखाड़े ने रखी अपनी मांग

नई दिल्‍ली। अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार से सुनवाई शुरू हो गई। यह सुनवाई तब तक चलेगी, जब तक कोई नतीजा नहीं निकल जाता। मामले में एक पक्षकार निर्मोही अखाड़े ने मांग की कि विवादित 2.77 एकड़ की पूरी भूमि पर उनका नियंत्रण और प्रबंधन हो।
वहीं, कोर्ट ने सुनवाई की शुरुआत में ही साफ कर दिया कि इसकी रिकॉर्डिंग नहीं दिखाई जाएगी। संघ विचारक के एन गोविंदाचार्य ने अयोध्या भूमि विवाद मामले में नियमित सुनवाई की रिकॉर्डिंग के लिए सोमवार को शीर्ष कोर्ट में याचिका दायर की।
‘राम जन्मस्थान पर सैकड़ों साल से निर्मोही अखाड़े का हक’
मामले की सुनवाई 5 जजों की बेंच कर रही है। इसमें चीफ जस्टिस (सीजेआई) रंजन गोगोई, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एसए नजीर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ हैं। निर्मोही अखाड़े की तरफ से उनके वकील सुशील जैन पेश हुए थे। उन्होंने अपने पक्ष की तरफ से विवादित जमीन पर नियंत्रण और प्रबंधन की बात रखी।
जैन के मुताबिक, ‘‘अखाड़ा एक रजिस्टर्ड बॉडी (पंजीयक संस्था) है। मूल रूप से हमारा केस संपत्ति, कब्जा और प्रबंधन अधिकार को लेकर है। अखाड़े का राम जन्मस्थान पर सैकड़ों सालों से अधिकार है। सीता रसोई, चबूतरा, भंडार गृह भी अखाड़े के अधिकार क्षेत्र में है। इनका किसी भी मामले में विवाद से नाता नहीं रहा।’’
सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से पैरवी राजीव धवन ने की। जब बेंच ने सुशील जैन को कुछ दस्तावेजों को न पढ़ने के लिए कहा तो धवन ने भी इसमें दखलअंदाजी की। इस पर सीजेआई ने उन्हें फटकार लगाते हुए कहा कि कोर्ट की गरिमा बरकरार रखें।
‘1934 से 1949 तक विवादित ढांचे में शुक्रवार को नमाज हुई’
जैन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 1934 के पहले विवादित ढांचे में मुस्लिम नियमित तौर पर नमाज अदा करते थे। 1934 से 1949 तक यहां मुस्लिमों ने केवल शुक्रवार (जुमे) की नमाज पढ़ी।
जैन ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि विवादित ढांचे में वुजु (नमाज से पहले हाथ धोना) का प्रावधान नहीं था। इसी आधार पर हाईकोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि वहां लंबे समय से नमाज नहीं हुई थी।
मार्च में बनाया था मध्यस्थता पैनल
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 8 मार्च को इस मामले को बातचीत से सुलझाने के लिए मध्यस्थता पैनल बनाया था। इसमें पूर्व जस्टिस एफएम कलीफुल्ला, आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर, सीनियर वकील श्रीराम पंचू शामिल थे। हालांकि, पैनल मामले को सुलझाने के लिए किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका।
सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दाखिल की गईं
2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दाखिल की गई थीं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था- अयोध्या का 2.77 एकड़ का क्षेत्र तीन हिस्सों में समान बांट दिया जाए। पहला-सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा- निर्मोही अखाड़ा और तीसरा- रामलला विराजमान।
-एजेंसियां

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