सरकारें तो बदलीं लेकिन नहीं बदली मथुरा की तस्‍वीर: नेता मस्‍त, अधिकारी ‘व्‍यस्‍त’, जनता त्रस्‍त

महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में इस वक्‍त चारों ओर भाजपा का परचम लहरा रहा है। सांसद भाजपा की, पांच में से चार विधायक भाजपा के, जिला पंचायत अध्‍यक्ष भाजपा की और मेयर भी भाजपा के। चार में से दो विधायक कबीना मंत्री।
सोने पर सुहागा ये कि उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक भी भाजपा की ही सरकार।
लेकिन भगवा के इस स्‍वर्णिम काल में भी भगवान कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त मथुरा नगरी जस की तस है। जैसी माया और अखिलेश के राज में थी, वैसी ही आज भी है।
कांग्रेस के शासनकान में जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन अर्थात ‘जे नर्म’ का जमकर ढिंढोरा पीटा गया और कहा गया कि उससे मथुरा की काया पलट जाएगी, किंतु नतीजा ढाक के तीन पात रहा।
सैकड़ों करोड़ रुपए भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था की भेंट चढ़ गए लेकिन मथुरा में नाले-नालियों एवं सीवर की गंदगी तक के निकास का मुकम्‍मल इंतजाम नहीं हो पाया। हुआ तो ये कि मथुरा की तत्‍कालीन नगर पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता करीब दो करोड़ रुपए के घोटाले में फंस गई जो आज भी न्‍यायालय में लंबित है।
2014 में मोदी सरकार बनने के बाद जब यूपी में योगी राज आया तो मथुरा के लोगों को उम्‍मीद बंधी की अब शायद मथुरा के दिन बहुरेंगे परंतु एकसाल बीत जाने पर भी मथुरा की दयनीय दशा बरकरार है।
बात चाहे साफ-सफाई की हो अथवा यातायात व्‍यवस्‍था की, अपराध की हो या व्‍यापार की। कहीं कुछ नहीं बदला।
योगी आदित्‍यनाथ के शपथ ग्रहण करने के साथ ही शहर के बीचोंबीच मयंक चेन नामक सर्राफा व्‍यवसाई के यहां दो व्‍यवसाइयों की हत्‍या करके करोड़ों के माल की डकैती डालकर बदमाशों ने जो चुनौती भाजपा सरकार को दी थी, वह आजतक कायम है। लूट, डकैती, चोरी, हत्‍या, राहजनी, बलात्‍कार और टटलुओं द्वारा किए जाने वाले विशेष अपराधों के ग्राफ में कोई कमी नहीं आई है।
चंद दिनों मथुरा के एसएसपी रहे प्रभाकर चौधरी ने यातायात व्‍यवस्‍था में अपनी इच्‍छाशक्‍ति के बल पर आमूल-चूल परिवर्तन करके जरूर दिखाया लेकिन उनका स्‍थानांतरण होते ही हर दिन जाम लगने का सिलसिला फिर शुरू हो चुका है।
गंदगी के मामले में तो मथुरा ने सबसे निचले पायदान तक भी न पहुंचकर सिद्ध कर दिया कि नगर पालिका को नगर निगम में तब्‍दील करके नगरीय क्षेत्र का नहीं, गंदगी के साम्राज्‍य का भी विस्‍तार किया है।
कहने को मथुरा सहित उससे जुडे विभिन्‍न धार्मिक स्‍थलों का कायाकल्‍प करने के लिए अरबों रुपए की योजनाएं बनाई गई हैं, कुछ पर काम भी चल रहा है किंतु सच्‍चाई यह है कि ऐसी योजनाएं मायावती के शासन में रहते भी बनी थीं और अखिलेश राज में भी। अब योगीराज उसी लकीर पर काम कर रहा है परंतु धरातल पर हालात बदलते दिखाई नहीं दे रहे। हर योजना किसी न किसी वजह से अटकी पड़ी है।
यहां तक कि करीब 180 एकड़ में फैले जिस सरकारी ‘जवाहर बाग’ को राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त माफिया रामवृक्ष यादव के चंगुल से मुक्‍त कराने में दो पुलिस अधिकारी शहीद हो गए, उसका स्‍वरूप बदलने के लिए बनाई गई योजना भी अभी रेंग रही है।
यह हाल तो तब है जबकि सरकार ने पूरे ब्रज क्षेत्र के विकास को ‘उत्तर प्रदेश ब्रजतीर्थ विकास परिषद’ का गठन कर उसकी कमान पूर्व प्रशासनिक अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप तथा पूर्व पुलिस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र के अनुभवी हाथों में सौंप रखी है। यह दोनों अधिकारी अपने सेवाकाल में लंबे समय तक मथुरा में तैनात भी रह चुके हैं।
इनके अलावा सांसद हेमा मालिनी ने भी ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ के नाम से एक संस्‍था रजिस्‍टर्ड करा रखी है जिसमें न सिर्फ हेमा मालिनी बल्‍कि उनके समधी व भाई सहित करीब आधा दर्जन लोग ट्रस्‍टी हैं।
करोड़ों देशवासियों की आराध्‍य यमुना मैया तो निश्‍चित ही खून के आंसू रो रही होगी क्‍योंकि उसके साथ अनवरत छल किया जा रहा है। उसके साथ छल करने में कोई शासक पीछे नहीं रहा। यमुना जल हाथ में लेकर सौगंध खाने वाले और यमुना की पूजा करके चुनाव का पर्चा दाखिल करने वाले नेताओं ने यमुना को कहीं का नहीं छोड़ा। हरियाणा में हिंदूवादी सरकार बन जाने पर भी हथिनी कुंड से यमुना के लिए पानी उपलब्‍ध कराने का कोई रास्‍ता निकालना तो दूर, उसे लेकर चर्चा तक की आवश्‍यकता महसूस नहीं की जा रही। मथुरा-वृंदावन के अधिकांश नाले सीधे यमुना में गिर रहे हैं नतीजतन यमुना का जल स्‍नान अथवा पान करने लायक तक नहीं है।
जीवन दायिनी और मोक्ष प्रदायिनी यमुना का प्रदूषित जल आज क्षेत्रीय नागरिकों के जीवन पर संकट का कारण बन चुका है। अनेक लोग यमुना के प्रदूषित जल की वजह से गंभीर बीमारियों का शिकार हो चुके हैं।
यह बात अलग है कि यमुना को ‘मां’ का दर्जा देने के कारण बहुत से लोग आज भी यमुना को इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं ठहराते किंतु नेताओं को जिम्‍मेदार मानने से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं।
सच भी यही है कि यमुना मैली हुई है तो नेताओं की कथनी और करनी में चले आ रहे भेद के कारण, न कि उसके अपने कारण। यमुना को गंदगी का पर्याय बना देने में नेताओं की वादाखिलाफी ने बड़ी भूमिका अदा की है।
आश्‍चर्य की बात यह भी है कि मथुरा जैसे विश्‍वविख्‍यात धार्मिक स्‍थल की बदहाली बरकरार रखकर भाजपा 2019 के लोकसभा चुनावों में 2014 की अपनी कामयाबी दोहराने के सपने देख रही है।
माना कि यूपी की पूर्ववर्ती सरकारें भी कृष्‍ण की नगरी को उसका गौरवपूर्ण स्‍वरूप दिलाने में असफल रहीं किंतु योगीराज से नाराजगी की बड़ी वजह उसके द्वारा धार्मिक स्‍थानों के पूर्ण विकास का सपना दिखाना तथा उत्तर प्रदेश को भयमुक्‍त करके उत्तम प्रदेश के रूप में स्‍थापित करने का भरोसा दिलाना है।
बाकी बात रही स्‍थानीय भाजपा नेताओं की तो उनकी दयनीय दशा का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को रालोद के युवराज जयंत चौधरी का समर्थन करना पड़ा और 2014 में स्‍वप्‍न सुंदरी को मथुरा लाना पड़ा।
2019 के लिए भी फिलहाल तो कोई ऐसा चेहरा सामने दिखाई नहीं दे रहा जो हेमा मालिनी की जगह ले सके लिहाजा यदि हेमा मालिनी की जगह किसी और के बावत सोचा भी जाता है तो पार्टी एकबार फिर किसी बाहरी को नए रैपर में लपेटकर पेश कर सकती है किंतु मथुरा का भाग्‍य विधाता होगा तो बाहरी ही।
ऐसे में यह कह पाना बेहद मुश्‍किल है कि मथुरा को उसका गौरवशाली अतीत कब तक नसीब होगा और कब तक यमुना प्रदूषण मुक्‍त हो पाएगी।
कब तिराहे-चौराहों को जाम के झाम से और सड़कों को अतिक्रमण की मानसिकता से मुक्‍ति मिलेगी। कब मथुरावासियों सहित यहां आने वाले पर्यटक व तीर्थयात्री भयमुक्‍त होकर भ्रमण कर सकेंगे। कब जलभराव जैसी मामूली सी समस्‍या का समाधान होगा और कब टटलुओं के लूट का कारोबार ध्‍वस्‍त होगा।
कहने को एक साल काफी कम है और चार साल बाकी हैं, किंतु बताने को पंद्रह साल का कारनामा भी है जिसने मथुरा तथा मथुरावासियों एवं ब्रज और ब्रजवासियों सहित यमुना मैया को भी सिर्फ ठगा ही ठगा है।
अंत में कहने को मात्र यही शेष रह जाता है कि ”ठग जाने ठगही की माया और खग ही जाने खग की भाषा”।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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