अफस्पा के तहत सेना की ताकत घटाने की जगह बढ़ाने के पक्ष में है सरकार

Government favor of increasing the strength of the army in AFSPA
अफस्पा के तहत सेना की ताकत घटाने की जगह बढ़ाने के पक्ष में है सरकार

नई दिल्ली। केंद्र सरकार अफस्पा (सशस्त्र बल सुरक्षा कानून) वाले क्षेत्रों में सेना की ताकत घटाने के समर्थन में नहीं है। बुधवार को सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में आए फैसले को रद्द करने के लिए अपनी जोर आजमाइश की।
सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में जिन क्षेत्रों में अफस्पा है वहां भी अशांति के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा किए जाने वाले एनकाउंटर में होने वाली मौतों के लिए एफआईआर को अनिवार्य किया था।
8 जुलाई 2016 को सर्वोच्च न्यायालय ने अफस्पा के अंतर्गत सुरक्षा बलों को दी जाने वाली विशेष सुरक्षा अधिकारों को निरस्त कर दिया था। इस आदेश के विरोध में केंद्र सरकार ने तर्क दिया है, ‘अगर सर्वोच्च न्यायालय के उक्त आदेश को जारी रखा गया तो एक दिन अशांति वाले क्षेत्रों में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना असंभव हो जाएगा।’ केंद्र सरकार का बयान एक रूप में आर्मी चीफ विपिन रावत के हालिया बयान की ही पुष्टि करता है।
आर्मी चीफ ने जम्मू-कश्मीर के पत्थरबाजों को चेताते हुए कहा था कि सुरक्षा ऑपरेशन में बाधा पहुंचाने वाले और आतंकियों की मदद करने वाले पत्थरबाजों को भी आतंकी ही समझा जाएगा और उसी अनुसार ऐक्शन लिया जाएगा।
अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा, ‘भारतीय सेना को परिस्थितियों के अनुसार त्वरित निर्णय लेने की शक्तियां देनी ही होंगी। उन शक्तियों के आधार पर लिए गए फैसले को एक सामान्य मौत के बाद की जाने वाली पड़ताल की तरह ही नहीं की जा सकती है।’
आसान शब्दों में कहें तो सरकार का तर्क है कि ऑपरेशन के दौरान सेना द्वारा की गई कार्यवाही को न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता है।
ध्यान देने की बात है कि केंद्र सरकार का यह तर्क सेना को न्यायिक समीक्षा से मुक्त रखने की प्रक्रिया पर ही जोर देता है। अटॉर्नी जनरल ने कड़े शब्दों में कहा, ‘सेना को पूरी ताकत के साथ अशांत क्षेत्रों में कार्यवाही की छूट होनी चाहिए। सेना जब हथियारों से लैस उपद्रवियों का सामना कर रही हो तो उसे अपने ताकत के इस्तेमाल की छूट होनी ही चाहिए।’ केंद्र सरकार की तरफ से यह भी तर्क दिया गया कि अगर कोई सैनिक किसी आतंकी के खिलाफ कार्यवाही कर रहा हो और उसे एफआईआर किए जाने का भय बना रहे तो आतंकियों के खिलाफ लड़ाई बहुत मुश्किल हो जाएगी। वकील आर बालासुब्रमण्यन की तरफ से दायर क्यूरेटिव पिटिशन की सुनवाई में केंद्र सरकार की तरफ से अपना यह पक्ष रखा गया।
मामले की सुनवाई कर रहे चीफ जस्टिस जे. एस. खेहर की अध्यक्षता वाले बेंच ने कहा, ‘आप ऐसा नहीं कर सकते हैं कि इस क्यूरेटिव पिटिशन पर कोर्ट दुबारा मेरिट के आधार सुनवाई करे।’ कोर्ट के इस संभावित तर्क को समझते हुए अटॉर्नी जनरल ने जोर देकर कहा कि यह बहुत गंभीर मामले से जुड़ी याचिका है। रोहतगी ने कहा, ‘महज सुरक्षा बलों के लिए ही यह महत्वपूर्ण याचिका नहीं है। एनकाउंटर और आतंकियों से मुकाबले में सुरक्षा बल के जवान हर बार अपनी जान खतरे में डालते हैं। सिर्फ सुरक्षा बलों के लिए नहीं देश की संप्रभुता और अखंडता के लिहाज से भी यह बेहदज महत्वपूर्ण याचिका है।’
-एजेंसी

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