कब्‍जे में सरकारी बंगले: नीति और नैतिकता के ”हमाम में नंगे” हैं सभी पाटियों के पूर्व मुख्‍यमंत्री

Government bungalows in occupation: All parties former chief ministers 'Naked in the hammam' of policy and ethics
कब्‍जे में सरकारी बंगले: नीति और नैतिकता के ”हमाम में नंगे” हैं सभी पाटियों के पूर्व मुख्‍यमंत्री

सवा सौ करोड़ से ज्‍यादा की आबादी वाले जिस देश में हर आम आदमी का सबसे बड़ा सपना किसी भी तरह सिर पर एक छत खड़ी कर लेना होता है, वहां एकड़ों में बने सरकारी बंगलों पर पूर्व मुख्‍यमंत्रियों का काबिज होना यह साबित करता है कि फिरंगियों की कार्बन कापियां ही स्‍वतंत्रता के सात दशक बाद तक शासन कर रही हैं।
कहने को देश में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था है और उसी व्‍यवस्‍था के तहत सरकारों की अदला-बदली भी होती रहती है लेकिन कड़वी सच्‍चाई यह है कि बदलती सिर्फ सूरतें हैं, सीरतें जस की तस बनी रहती हैं।
पार्टी का झंडा भले ही बदल जाता हो किंतु डंडा नहीं बदलता क्‍योंकि हर झंडे के लिए एक डंडे की दरकार होती है, और वह डंडा सबका समान होता है। डंडा थामने वाले हाथ बेशक बदलते रहे किंतु उसकी मार आज भी यथावत है।
बात चाहे देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की हो या फिर आज के दौर की सर्वाधिक सफल भाजपा की। राम मनोहर लोहिया के आदर्शों पर चलने का पाखंड पालने वाली समाजवादी पार्टी की हो अथवा दलितों की स्‍वयंभू मसीहा बसपा प्रमुख मायावती की।
राजा और रंक जैसे शब्‍द किताबों के पन्‍नों में तो धुंधले दिखाई देते हैं लेकिन सच्‍चाई के धरातल पर पूरे वजूद के साथ खड़े मिलते हैं। स्‍वतंत्रता के आंदोलन से जन्‍मी कांग्रेस से लेकर स्‍वतंत्र भारत की पैदायश भाजपा तक में शासक होने का गुमान समान रूप से व्‍याप्‍त है। जाहिर है कि इनके बाद उपजीं सपा व बसपा जैसी देशभर की क्षेत्रीय पार्टियां भी सोच के स्‍तर पर इनसे इतर नहीं हैं।
यही कारण है कि बेशकीमती जगहों पर बने सरकारी बंगलों को कब्‍जाने की नीति त्‍यागने के लिए बार-बार न्‍यायपालिका को सामने आना पड़ता है।
यह हाल तो तब है जबकि जिंदगी पर कब्‍जा किसी का नहीं है, यदि जिंदगी पर कब्‍जा होता तो शायद ये नेता पिछले सत्‍तर सालों में देश की आधी जमीन कब्‍जा चुके होते क्‍योंकि पूर्व मुख्‍यमंत्रियों के अलावा तमाम दूसरे ऐसे पद हैं जिनकी नेमप्‍लेट्स सरकारी बंगले कब्‍जाने के काम आ रही हैं।
इस संदर्भ में अभी-अभी आए सुप्रीम कोर्ट के आदेश से प्रभावित होने वाले पूर्व मुख्‍यमंत्रियों की बात करें तो उनमें निवर्तमान मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव, उनके पिता मुलायम सिंह यादव तथा बसपा सुप्रीमो और पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती तो हैं हीं, साथ ही वतर्मान केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, राजस्‍थान के राज्‍यपाल कल्‍याण सिंह एवं कब्र में पैर लटकाए पड़े नारायण दत्त तिवारी तक शामिल हैं।
बताया जाता है कि राजस्थान के राज्यपाल एवं पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के माल एवेन्यू स्‍थित बंगले में न तो कल्याण सिंह रहते हैं न ही उनका कोई परिवार। उसमें सिर्फ उनके नौकर-चाकर रह रहे हैं।
राजशाही मानसिकता का इससे अधिक घिनौना उदाहरण और क्‍या हो सकता है।
यही हाल कालीदास मार्ग स्‍थित राजनाथ सिंह के बंगले का है जिसका आज की तारीख में भी किराया मात्र 5320 रुपये प्रतिमाह दिया जाता है।
सबसे विवादित बंगला मायावती का
पांच एकड़ में फैला मायावती का बंगला सर्वाधिक विवादास्‍पद है क्‍योंकि लाल पत्थरों से बने इस बंगले की दीवारें इतनी ऊंची हैं जिनके पार झांकना तक संभव नहीं हो सकता। चारों तरफ से इसे किसी महल की तरह घेरा गया है।
अखिलेश और मुलायम के बंगले अगल-बगल
मुलायम सिंह यादव का बंगला 5 विक्रमादित्य मार्ग पर है। यह बंगला 6000 स्क्वॉयर फीट में बने अखिलेश यादव के सरकारी बंगले से सटा हुआ है। दोनों बंगले अंदर से जुड़े हैं और उनमें आने-जाने का रास्ता भी बना है। मुलायम के बंगले का किराया 13500 रुपये है।
‘आरोही’ नामक नारायण दत्त तिवारी का बंगला माल एवेन्यू में है और इसका किराया फिलहाल प्रति माह सिर्फ 7550 रुपये अदा किया जा रहा है।
राजनाथ सिंह और कल्‍याण सिंह को अपने-अपने वर्तमान पद के अनुसार सरकारी बंगला दिल्‍ली व जयपुर में अलग से प्राप्‍त है, फिर लखनऊ के सरकारी बंगलों पर काबिज रहने का औचित्‍य केवल छद्म लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था को ही समझ में आ सकता है।
झारखंड में भी पांच पूर्व मुख्‍यमंत्रियों का कब्‍जा
बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के अलावा झारखंड में भी बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा और हेमंत सोरेन ने भी पूर्व मुख्‍यमंत्रियों की हैसियत से सरकारी बंगले कब्‍जा रखे हैं। इनमें से हेमंत सोरेन वर्तमान में विपक्ष के नेता हैं। शिबु सोरेन का बंगला वर्तमान सीएम रघुबर दास के आधिकारिक आवास के पास ही स्थित है। वहीं हेमंत सोरेन कांके रोड और अर्जुन मुंडा का आवास जेल मोरे में स्थित है। यह सभी आवास रांची के पॉश इलाके में स्थित हैं।
आपको बता दें कि झारखंड विधानसभा में भी उत्तर प्रदेश की तरह पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास देने का बिल पास किया जा चुका है।
बिहार
बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, चारा घोटाले में सजायाफ्ता जगन्नाथ मिश्र और जीतनराम मांझी भी इस समय सरकारी आवासों को कब्‍जाए बैठे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बाद अब इन्हें भी अपना बंगला खाली करना होगा। इनमें से राबड़ी देवी का आवास पॉश इलाके 10 सर्कुलर रोड पर स्थित है।
राजस्थान
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और जगन्नाथ पहाड़िया को भी अपने-अपने सरकारी आवास खाली करने होंगे।
मजे की बात यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व उप राष्‍ट्रपति भैरो सिंह शेखावत की मृत्यु के 8 साल बाद भी उनके दत्तक पुत्र विक्रमादित्य सिंह सरकारी बंगले में रह रहे हैं जिसे अब उन्हें छोड़ना पड़ेगा।
जम्मू-कश्मीर
सुप्रीम कोर्ट का फैसला जम्मू-कश्मीर में भी लागू होगा। इसके तहत राज्यसभा में विपक्ष के नेता व राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद और जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला को भी अपने सरकारी आवास खाली करने होंगे।
मध्‍य प्रदेश
गेरुआ वस्‍त्र धारण करके खुद को साध्‍वी बताने वाली उमा भारती भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। वर्तमान केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने भी मध्‍य प्रदेश के दूसरे पूर्व मुख्‍यमंत्रियों दिग्विजय सिंह, कैलाश जोशी और बाबूलाल गौर की तरह सरकारी बंगला कब्‍जा रखा है।
असम
असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और प्रफुल्ल कुमार मोहंता को भी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से करारा झटका लगा है क्‍योंकि अब इन्‍हें पूर्व मुख्‍यमंत्री की हैसियत से प्राप्‍त सरकारी बंगले खाली करने होंगे।
मणिपुर
मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह वर्तमान में विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन पर भी समान रूप से लागू होगा।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दलगत राजनीति तो दिखावा है, असलियत यह है कि नीति व नैतिकता के हमाम में सब के सब नंगे हैं और यहां आकर इनकी कथनी व करनी का भेद स्‍पष्‍ट तौर पर समझ में आता है।
पूर्व राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम जैसे अपवादों को छोड़ दें तो हर पार्टी के नेता इस मामले में समान नजर आते हैं। यहां आकर दल नहीं, ऐसी दलदल दिखाई देती है जिसमें जितना घुसो, उतना धंसते जाने का खतरा है।
आश्‍चर्य तो इस बात का है कि दिग्‍गी राजा या उमर अब्‍दुल्‍ला जैसे एक-दो नेता के अलावा इनमें से कोई चांदी की चम्‍मच मुंह में लेकर पैदा नहीं हुआ। सबके सब आम लोगों के बीच से ही आते हैं किंतु सत्ता का नशा क्‍या चढ़ा, अब ये खुद को किसी राजा-महाराजा से कम समझने के लिए तैयार नहीं।
संभवत: इसी नशे को ”हिरन” करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि जनता की अदालत से सत्ता गंवाने के बाद ये लोग आम आदमी ही हैं, लिहाजा इन्‍हें सरकारी बंगलों में रहने का कोई हक नहीं है।
अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का कब तक तथा कितना पालन किया जाता है अथवा सरकारी बंगलों पर स्‍थाई कब्‍जे के लिए जिस तरह की कारस्‍तानी मायावती और अखिलेश यादव ने अपने-अपने शासनकाल में की थी, वैसी ही किसी कारस्‍तानी का रास्‍ता निकालकर सर्वोच्‍च न्‍यायालय को ठेंगा दिखाने की व्‍यवस्‍था की जाती है क्‍योंकि ऐसे मामलों में सत्ता पक्ष व विपक्ष एकसुर से रेंकने लगते हैं।
सांसद और विधायकों के वेतन-भत्ते बढ़ाने का उदाहरण सामने है, जिसकी खातिर सांप व नेवलों में दोस्‍ती होते देर नहीं लगती।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अपना काम कर दिया। अब बारी है उसके आदेश का पालन कराने वालों की। एक ऐसा आदेश जिसके लपेटे में सत्ता पक्ष के नेता भी हैं और विपक्ष के भी। पूर्व मुख्‍यमंत्री भी हैं और वर्तमान मंत्री भी। राज्‍यपाल भी हैं और राजा भी।
माने तो ठीक अन्‍यथा “लोक प्रहरी” अभी जिंदा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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