अच्‍छे ट्रैक रिकॉर्ड वाली कंपनियां ही जॉइंट वेंचर्स में कर पाएंगी निवेश

मुंबई। विदेशी इकाइयों और जॉइंट वेंचर्स में सिर्फ उन्हीं कंपनियों को निवेश करने की मंजूरी दी जाएगी, जिनका ट्रैक रिकॉर्ड बढ़िया होगा। भारतीय कंपनियों को अपनी नेटवर्थ का चार गुना तक निवेश विदेश में करने की इजाजत है लेकिन इसका काफी दुरुपयोग हुआ है। कई लोग देश से पैसा बाहर भेजने और कर्ज की रकम को डायवर्ट करने के लिए इस रूट का इस्तेमाल करते रहे हैं।
इसके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने 15 दिन पहले ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ओडीआई) पर अडवाइजरों और कानूनी जानकारों के साथ हुई मीटिंग में इसका संकेत दिया था। इस मीटिंग में मौजूद एक सूत्र ने बताया, ‘ट्रैक रिकॉर्ड का आधार पिछले तीन वित्त वर्ष का मुनाफे या औसत मुनाफा हो सकता है।’
विदेश में कंपनी के नेटवर्थ के चार गुना तक निवेश के नियम के दुरुपयोग के कई मामले सामने आए हैं। हालांकि, इसका मकसद सब्सिडियरी और जॉइंट वेंचर के रास्ते दूसरे देशों में भारतीय कंपनियों के निवेश को बढ़ावा देना था। यह गड़बड़ी इस तरह से की जा रही है।
मान लीजिए कि 50 करोड़ रुपये की नेटवर्थ वाली कोई नई कंपनी बैंकों से 150 करोड़ रुपये का कर्ज लेती है और विदेश में अपनी पूर्ण हिस्सेदारी वाली सब्सिडियरी यानी इकाई या जॉइंट वेंचर में 200 करोड़ रुपये का निवेश करती है, जिसकी उसे कानूनन इजाजत है। इसके बाद वह भारत और विदेश में अपना कामकाज बंद कर देती है।
इस पर सीनियर चार्टर्ड अकाउंटेंट दिलीप लखानी ने कहा, ‘विदेशी इकाई में अपना और कर्ज का पैसा लगाने की इजाजत है इसलिए इसमें फंड के गबन की आशंका रहती है। खासतौर पर नई कंपनियों की तरफ से। कानूनी तौर पर कंपनियों की ऐसी हरकत रोकने का कोई प्रावधान नहीं है।’
उन्होंने कहा, ‘इसलिए ओडीआई के लिए कुछ शर्तें तय करने में कोई बुराई नहीं है। यह अच्छा प्रस्ताव है। सिर्फ असली कंपनियों को ही ओडीआई रूल का फायदा मिलना चाहिए।’
बैंक डिफॉल्ट के बाद कंपनियों के फरेंसिक ऑडिट से पता चला कि ओडीआई रूट का इस्तेमाल गबन के लिए किया जा रहा था। हाल ही में एक दवा कंपनी का ऑडिट पूरा हुआ है। इससे पता चला कि इस कंपनी ने अफ्रीका में कई सब्सिडियरी में निवेश किया है, जिससे उसे कोई रिटर्न या बहुत कम रिटर्न मिला है। इन सब्सिडियरीज ने भारत में पैरेंट कंपनी को कोई डिविडेंड भी नहीं दिया है और वे सभी घाटे में चल रही हैं। जहां अधिकतर मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों को मुनाफे में आने में पांच से छह साल का समय लगता है, वहीं लगातार तीन साल तक मुनाफे में बने रहने में उन्हें वर्षों लग सकते हैं। वैसे कंपनियों को विदेशी सब्सिडियरीज की एनुअल परफॉर्मेंस रिपोर्ट भी जमा करनी होती है।
इस पर चोकसी एंड चोकसी एलएलपी के सीनियर पार्टनर मितिल चोकसी ने बताया, ‘क्या रेग्युलेटर्स ने पहले जमा की गई इन रिपोर्ट्स की जांच की है। अगर ऐसा किया जाता तो फंड की हेराफेरी के कई मामलों को रोका जा सकता था। ट्रैक रिकॉर्ड की शर्त पहले भी थी, लेकिन इसे बिजनस को बढ़ावा देने के लिए खत्म किया गया था। इसीलिए नेटवर्थ के बरक्स निवेश की सीमा भी बढ़ाई गई थी।’
-एजेंसी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »