असाध्‍य diseases को जड़ से मिटाने में सक्षम है गो-मूत्र

Gau Mutra is able to remove irreversible diseases
असाध्‍य diseases को जड़ से मिटाने में सक्षम है गो-मूत्र

गौमूत्र असाध्‍य diseases को जड़ से मिटाने में सक्षम होता है जबकि हम में से  अधिकांशत: गो-मूत्रका नाम सुनकर अपनी नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं,  लेकिन सच यह है कि गौ मूत्र का प्रयोग कई दवाइयों में भी किया जाता है।

गव्यं समधुरं किंचिद् दोषघ्नम क्रिमि कुष्ठनुत्| कंडूच शमयेत् पीतं सम्यग्दोषोदरे हितम|| – चरक सूत्राणि अध्याय १ श्लोक १०२

तथा

गोमूत्रं कटु तीक्षणोष्णम् सक्षारत्वं वातलम्| लघ्वग्नि दीपनं मेध्यम् पित्तलम् वातनुत्||

शूलगुल्मोदरानाहविरेकास्थापनादिषु| मूत्रप्रयोगसाध्येषु गव्यं मूत्रं प्रोजयेत्||      – सुश्रुत सूत्र मूत्र वर्ग

पर्यायवाची (Synonyms)

स्त्रवण, सुरभि जल, गोजल, गो अम्भा, गोद्रव, गोपानिज, मेहन, मूत्र, गोझार

गुणधर्म (Properties)

गुण – तीक्ष्ण

रस – कटु, तिक्त, कषाय

विपाक – कटु

वीर्य – ऊष्ण

दोषघ्नात – कफ एवं वातशामक, पित्तवर्द्धक

गोमूत्र कसैला, कड़वा तथा तीखा होता है स्वाद में| यह आसानी से पचनेवाला, क्षयकारक तथा प्रकृति में गर्म होता है| यह भूख बढ़ाने वाला, भोजन पचाने वाला, कब्ज तोड़ने वाला, पित्त को बढ़ाने वाला, बुद्धि बढ़ाने वाला, बहुत ही कम मृदु होता है| यह कफ-वात को कम करने वाला, त्वचा रोग, गुल्म, खून की कमी, श्वेत प्रदर, दर्द, बवासीर, अस्थमा, सामान्य बुखार, बलगम, आँख मुँह के रोगों, स्त्रियों में डायरिया में परम लाभकारी है| इन सबके अतिरिक्त गोमूत्र के कई अन्य लाभ होते हैं|

लक्षण (Indications)

सभी जीवों में देशी गाय का मूत्र सर्वोत्तम होता है! यह न केवल भूख बढ़ाकर पाचन सुदृढ़ करता है बल्कि त्वचा विकारों में भी विशेष लाभकारी है|

गोमूत्र का निम्नलिखित रोगों में विशेष प्रयोग होता है:

गुर्दों की बीमारी
कुष्ठ रोग
श्वेत प्रदर
त्वचा रोग
कफ बलगम
बवासीर
खून की कमी
पीलिया
मुँह के छालों
मूत्राशय सम्बन्धी
अस्थमा, फेफड़ों से सम्बंधित रोगों में
कान के रोगों में

मात्रा (Dosage)

10 ml दिन में दो बार या चिकित्सक के निर्देशानुसार| पीने से पहले ताज़े गोमूत्र को 4 तह (4 folds) कपड़े से छान लें|

अनुपान (To be taken with)

गुनगुने जल के साथ लें| पित्त के रोगी सादे जल के साथ लें|

गोमूत्र अर्क

ताज़े गोमूत्र की भाप को ठंडा करके गोमूत्र अर्क प्राप्त किया जाता है| गोमूत्र अर्क मात्रा में कम लिया जाता है| इसकी जीवन अवधि लंबी होती है अर्थात यह जल्दी खराब नहीं होता|

गोमूत्र से सम्बंधित विशेष सावधानियाँ

गोमूत्र हमेशा स्वस्थ देशी गाय का ही लिया जाना चाहिए|
गोमूत्र  को हमेशा निश्चित तापमान पर रखा जाना चाहिए| न अधिक गर्म और न अधिक ठंडा|
गोमूत्र की मात्रा ऋतु पर निर्भर करती है| चूँकि इसकी प्रकृति कुछ गर्म होती है इसीलिए गर्मियों में इसकी मात्रा कम लेनी चाहिए|
यदि शरीर में पित्त बढ़ा हुआ है तो वैद्य की सलाह के अनुसार ही इसे लेना चाहिए| पित्त के लक्षण पहचानने के लिए उत्तम महेश्वरी जी की बहुचर्चित पुस्तक अपने डॉक्टर स्वयं बनें अवश्य पढ़ें!
आठ वर्ष से कम बच्चों और गर्भवती स्त्रियों को गोमूत्र अर्क वैद्य की सलाह के अनुसार ही दें|

किस तरह असाध्‍य diseases को जड़ से मिटाने में सक्षम है गो-मूत्र

1. गौमूत्र में किसी भी प्रकार के कीटाणु नष्ट करने की चमत्कारी शक्ति है। सभी कीटाणुजन्य व्याधियाँ नष्ट होती हैं।

2. गौमूत्र दोषों (त्रिदोष) को समान बनाता है। अतएव रोग नष्ट हो जाते हैं।

3. गौमूत्र शरीर में यकृत (लिवर) को सही कर स्वच्छ खून बनाकर किसी भी रोग का विरोध करने की शक्ति प्रदान करता है।

4. गौमूत्र में सभी तत्त्व ऐसे हैं, जो हमारे शरीर के आरोग्यदायक तत्त्वों की कमी की पूर्ति करते हैं।

5. गौमूत्र में कई खनिज, खासकर ताम्र होता है, जिसकी पूर्ति से शरीर के खनिज तत्त्व पूर्ण हो जाते हैं। स्वर्ण क्षार भी होने से रोगों से बचने की यह शक्ति देता है।

6. मानसिक क्षोभ से स्नायु तंत्र (नर्वस सिस्टम) को आघात होता है। गौमूत्र को मेध्य और हृद्य कहा गया है। यानी मस्तिष्क एवं हृदय को शक्ति प्रदान करता है। अतएव
मानसिक कारणों से होने वाले आघात से हृदय की रक्षा करता है और इन अंगों को होने वाले रोगों से बचाता है।

7. किसी भी प्रकार की औषधियों की मात्रा का अतिप्रयोग हो जाने से जो तत्त्व शरीर में रहकर किसी प्रकार से उपद्रव पैदा करते हैं उनको गौमूत्र अपनी विषनाशक शक्ति से नष्ट कर रोगी को निरोग करता है।

8. विद्युत तरंगें हमारे शरीर को स्वस्थ रखती हैं। ये वातावरण में विद्यमान हैं। सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप से तरंगंे हमारे शरीर में गौमूत्र से प्राप्त ताम्र के रहने से ताम्र के अपने विद्युतीय आकर्षक गुण के कारण शरीर से आकर्षित होकर स्वास्थ्य प्रदान करती हैं।

9. गौमूत्र रसायन है। यह बुढ़ापा रोकता है। व्याधियों को नष्ट करता है।

10. आहार में जो पोषक तत्त्व कम प्राप्त होते हैं उनकी पूर्ति गौमूत्र में विद्यमान तत्त्वों से होकर स्वास्थ्य लाभ होता है।

11. आत्मा के विरुद्ध कर्म करने से हृ्रदय और मस्तिष्क संकुचित होता है, जिससे शरीर में क्रिया कलापों पर प्रभाव पड़कर रोग हो जाते हैं। गौमूत्र सात्विक बुद्धि प्रदान कर, सही कार्य कराकर इस तरह के रोगों से बचाता है।

12. शास्त्रों में पूर्व कर्मज व्याधियाँ भी कही गयी हैं जो हमें भुगतनी पड़ती हैं। गौमूत्र में गंगा ने निवास किया है। गंगा पाप नाशिनी है, अतएव गौमूत्र पान से पूर्व जन्म के
पाप क्षय होकर इस प्रकार के रोग नष्ट हो जाते हैं।

13. शास्त्रों के अनुसार भूतों के शरीर प्रवेश के कारण होने वाले रोगों पर गौमूत्र इसलिए प्रभाव करता है कि भूतों के अधिपति भगवान शंकर हैं। शंकर के शीश पर गंगा है। गौमूत्र में गंगा है, अतएव गौमूत्र पान से भूतगण अपने अधिपति के मस्तक पर गंगा के दर्शन कर, शान्त हो जाते हैं। और इस शरीर को नहंीं सताते हैं। इस तरह भूताभिष्यंगता रोग
नहीं होता है।

14. जो रोगी वंश परंपरा से रोगी हो, रोग के पहले ही गोमूत्र कुछ समय पान करने से रोगी के शरीर में इतनी विरोधी शक्ति हो जाती है कि रोग नष्ट हो जाते हैं।

15. विषों के द्वारा रोग होने के कारणों पर गौमूत्र विषनाशक होने के चमत्कार के कारण ही रोग नाश करता है। बड़ी-बड़ी विषैली औषधियाँ गौमूत्र से शुद्ध होती हैं। गौमूत्र, मानव शरीर की रोग प्रतिरोधनी शक्ति को बढ़ाकर, रोगों को नाश करने की क्षमता देता है। प्उउनदपजल च्वूमत देता है। निर्विष होते हुए यह विषनाशक है।

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