जीत की गंगा Kashmir से निकलेगी ?

यदि भाजपा Kashmir में अलगाववादियों का दमन,370 एवं 35-ए की धारा खत्म करती है तो Kashmir से जीत की गंगा निकल सकती है
जीत जीत होती है फिर कैसे हासिल की गई उसका कोई मायना नहीं रह जाता है। 2014 में लोकसभा के चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने जीत के सभी फार्मूलों को अपनाया और नतीजा भी पक्ष में आया। जीतना और उस जीत को पचाना अर्थात् घमण्ड का आना भी एक बड़ी घटना होती है। जब केवल जीत ही उद्देश्य रहता है तब कई अनीतिगत, विपरीत स्वभाव, गुण, धर्म, सिद्वान्त न केवल बोने हो जाते है बल्कि इन्हें नजरअंदाज भी करना पड़ता है, ऐसी ही कुछ घटना जम्मू एवं कश्मीर में भाजपा ने पी.डी.पी. के साथ मिल सत्ता की सीढी चढ़ी।
चूंकि विपरीत धु्रव एवं स्वभाव था, स्वभावानुसार दूध में नींबू की बूंद 40 माह बाद सिद्ध हुई। जम्मू एवं Kashmir की मुख्यमंत्री महबूबा ने भी महबूबा की ही तरह अपने स्वार्थ, हित की राजनीति की जिसके परिणामस्वरूप कश्मीर के हालात बद से बदतर हो गये। जब भाजपा की सत्ता की महदोही टूटी तब तक भाजपा को काफी नुकसान हो चुका था। 600 जवानों का शहीद होना, 11 हजार पत्थरबाजों के खिलाफ दर्ज मुकदमों का वापस होना, रमजान में सीज फायर का घातक निर्णय का होना, महबूबा के हर राष्ट्र विरोधी अभियान में भाजपा की बराबर की भागीदारी रही है। इसलिए भाजपा भी अपने पापकर्मो से बच नही सकती। सरेआम पाकिस्तान का झण्डा फहराना, न केवल संविधान विरोधी है बल्कि देशद्रोह भी है। ऊपर से उन देशद्रोही लोगों को बच्चा कहना भी उनकी अर्थात् महबूबा की एक मासूमियत भरी अदा है, दिनों दिन चारों और मरते सैनिकों की शहादत ने न केवल भाजपा की छवि को कलंकित कर दिया बल्कि देश में भी उसकी हिन्दुत्वादी छवि को भी गहरा धक्का लगा।
भाजपा का ये सत्ता के लालच ने उसे कितना नुकसान पहुंचाया में तो भविष्य के ही गर्त में है। लेकिन कहते है जब जागे तभी सबेरा। हिन्दुत्व में पाप के पश्चाताप का भी प्रावधान है। यह वही भाजपा है जो विपक्ष में रहते कहती थी कि हमें हमारे एक सैनिक के बदल 10 सिर चाहिए को अब सांप सूंध गया? अब भाजपा के दामन पर सैनिकों के खून के धब्बे, श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बलिदान की प्रतिज्ञा, धारा 370, कश्मीरी पंडितों के लौटने की आस सभी कुछ अब प्रतीक्षा कर रहे हैं। निःसंदेह महबूबा तो अपनी चाल में सफल रही अर्थात् जनता से जो वायदा किया जो मंशा थी वह चोरी और सीना जोरी से पूरा किया। लेकिन भाजपा के हाथ रीते के रीते ही रहे हासिल तो कुछ हुआ नहीं बदनामी के सिवाए कुछ नहीं मिला।
चूंकि अब भाजपा को 2019 में पुनः जनता के बीच जाना है तब अब जनता तो पूछेगी क्या हुआ तेरा वादा, जिसका वादा कर सत्ता हासिल की मसलन मंदिर, 370 धारा को हटाना, एक देश एक निशान एक संविधान सपने का क्या हुआ? यहां यक्ष प्रश्न उठता है वास्तव में हिन्दुत्व के मुद्दे को छोड़ विकास के मुद्दे पर भाजपा बहुमत में आ सकती हैं? क्या महंगाई, रोजगार का मुद्दा जुमला बन गया? यहां यक्ष प्रश्न फिर उठता है भाजपा को भोग के बाद कर्म का ध्यान कैसे आया? भाजपा ने शायद सोचा था घाटी के मुसलमानों के प्रति उदार  रवैये से उनकी उदारवादी छवि निर्मित होगी लेकिन हुआ बिल्कुल उलट घाटी के मुस्लिम तो साथ आये नहीं हिन्दूपंथी भी छिटकने लगे।
महाराष्ट्र में उद्वव ठाकरे भी मोदी सरकार को इस मुद्दे पर घेरने में पीछे नहीं रहे है। मंदिर वही बनाऐंगे, नारा भी सबके विकास के साथ खो गया, अब जब लोकसभा चुनाव को एक साल का भी कम समय बचा है भाजपा की धड़कन बढ़ना स्वाभाविक है। वही Kashmir में उमर अब्दुल्ला भी सरेआम धमकी दे रहा है कि हिन्दू अमरनाथ की यात्रा को भूल जाए। कोई इनसे पूंछे क्या ये वहां के डाॅन है या जन प्रतिनिधि यदि डाॅन हैं तो उनको सही जगह पहुंचाया जाये और यदि जनप्रतिनिधि है तो चुनाव आयोग द्वारा उन्हें अयोग्य घोषित किये जाया।
यदि भाजपा कश्मीर में अलगाववादियों का दमन,370 एवं 35-ए की धारा खत्म करती है तो भाजपा के जीत की गंगा पूरे देश Kashmir से निकलकर बह सकती है। वर्षों का नासूर भी खत्म होगा सो अलग फिर शांति और अमन छाना निश्चित है। डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की आत्म प्रसन्न होगी सो अलग।
shashi-tiwari
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डाॅ. शशि तिवारी,
शशि फीचर.ओ.आर.जी.,
लेखिका सूचना मंत्र की संपादक है

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