छत्रपति श‍िवाजी म्यूजियम में इन्हें भी शाम‍िल करने की मांग

ताजमहल के निकट निर्माणाधीन म्यूजियम का नामकरण छत्रपति शिवाजी के नाम पर किया जाना देशप्रेम की भावना को संचारित करने के लिए एक बड़ा माध्यम होगा लेकिन जब तक हम म्यूजियम के माध्यम से ब्रज क्षेत्र जीवन्त विरासतों और कलाओं से पर्यटकों को रूबरू नहीं करायेंगे तब तक यह म्यूजियम बनाया जाना लाभप्रद नहीं होगा इसके लिए म्यूजियम में बनाये जाने वाले आॅडिटोरियम में प्रतिदिन ब्रज क्षेत्र की लोक कलाओं, रास लीला, भगत व संगीत के कार्यक्रम होने चाहिए ताकि पर्यटक रात्रि में भी रूक सके। यह मांग आज आगरा डवलपमेन्ट फाउन्डेशन (एडीएफ) के अध्यक्ष पूरन डाबर एवं सचिव के0सी0 जैन द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मेल के द्वारा भेजे गये पत्र में कही गयी।

भेजे गये पत्र में यह कहा गया कि देश विदेश से आने वाले अधिकांश पर्यटक केवल ताजमहल को देखकर ही वापस चले जाते हैं और वे आगरा और ब्रज की संस्कृति से रूबरू नहीं हो पाते हैं। इस उद्देश्य से पर्यटक आगरा व आसपास के क्षेत्र के विभिन्न पहलूओं को जान सकें, निर्माणाधीन म्यूजियम में निम्न कोम्पोनेन्ट्स का समावेश होः-

संगीत नृत्य व स्थानीय संस्कृति के प्रतिदिन शोः– पर्यटक केवल ऐतिहासिक ईमारतों को ही नहीं देखना चाहते हैं अपितु संगीत, नृत्य व स्थानीय संस्कृति को देखना व समझना चाहते हैं। इसके लिए जरूरी है कि निर्माणाधीन म्यूजियम के आॅडिटोरियम में प्रतिदिन रोचक व यादगार शोज हों और उसके लिए स्थानीय व ब्रज के कलाकारों को ही अवसर मिले। प्रारम्भ में इन कलाकारों को पर्यटन व संस्कृति विभाग आर्थिक सहयोग दे और थोड़े दिन बाद जब यह शो लोकप्रिय हो जायेंगे तो वह स्वतः चल पड़ेंगे। इस प्रकार के शोज के माध्यम से हम पर्यटकों के रात्रि प्रवास को भी बढ़ावा दे सकेंगे। संगीत के क्षेत्र में आगरा घराना का भी विशेष योगदान रहा है।

वैक्स प्रतिमाऐंः– म्यूजियम में बनायी जाने वाली बीथकाओं (गैलरीज) में ब्रज क्षेत्र के क्रान्तिकारियों, साहित्यकारों व अग्रणीं राजनीतिज्ञों की वैक्स प्रतिमाऐं भी लगायी जायें।

स्थानीय व माइग्रेटरी पक्षियों व प्राकृतिक स्थलों का परिचयः– यही नहीं, इस क्षेत्र में आने वाली पशु पक्षियों की वैक्स प्रतिमाऐं भी लगायी जायें ताकि इस क्षेत्र की प्रकृति से हम लोगों को जोड़ सकें। सूर सरोवर पक्षी विहार, चम्बल पक्षी अभ्यारण्य, ताज नेचर वाॅक आदि का भी परिचय इस म्यूजियम के माध्यम से किया जाये। प्राकृतिक इतिहास में जहांगीर का योगदान भी दर्शाया जाये जिनके द्वारा सबसे पहले सारस क्रेन के सम्बन्ध में गहराई से अध्ययन कराया गया था।

शिल्प कलाओं का जीवन्त प्रदर्शनः– इसके अतिरिक्त स्थानीय शिल्प कलाओं जैसे जरदोजी, इनले वर्क, मूर्तिकला, परम्परागत दरी व कालीन कला, कांच के खिलौने बनाने की कलाओं का जीवन्त प्रदर्शन हो ताकि न केवल पर्यटक उनको बनाने की कला को बारीकी से समझ सके बल्कि स्थानीय उत्पादों को खरीदने में भी उसकी रूचि बढ़े। क्राफ्ट म्यूजियम के माॅडल के रूप में भी यह जाना जाये।

स्थानीय मेलेः– तैराकी का मैला, गनगौर का मेला, बटेश्वर का मेला आदि परम्परागत मेलों के बारे में भी बताया जाये।

गौरवपूर्ण व्यवसायिक पृष्ठभूूिमः– आगरा किस प्रकार व्यवसाय का बड़ा केन्द्र रहा यहां न केवल स्थानीय सेठ थे अपितु डच, ग्रीक व यूरोपियन ने भी यहां की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दिया। जिसमें सांस्कृतिक विरासत के रूप में सेठों की रावतपाड़ा, बेलनगंज व राजामंडी आदि में हवेलियां उल्लेखनीय हैं।

जूते व पेठे की कहानीः– जूते की कहानी और यात्रा जो पिछले लगभग 1000 वर्ष की है उसे भी इस म्यूजियम में दर्शाया जाये और आगरा को फुटवियर सिटी आॅफ इण्डिया के रूप में भी परिचय कराया जाये। पेन्टिंग के माध्यम से पेठा निर्माण की प्रक्रिया भी दर्शायी जाये।

साहित्यिक यात्राः– प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार जैसे अमृतलाल नागर व राम विलास शर्मा आदि का जन्म आगरा में हुआ उनका परिचय भी इस म्यूजियम के माध्यम से हो। म्यूजियम में एक गैलरी नजिर अखराबादी को भी समर्पित हो जो साझा संस्कृति को प्रदर्शित कर सके।

धार्मिक पृष्ठभूमिः– इस क्षेत्र में जो ऐतिहासिक भवन व प्रख्यात मन्दिर हैं उनके भी बड़े माॅडल प्रदर्शित किये जायें ताकि यहां की शिल्प कला और धार्मिक पृष्ठभूमि भी पर्यटकों को ज्ञात हो सके।

जैन धर्म का इतिहासः– जैन धर्म के इतिहास को शौरीपुर व बटेश्वर के द्वारा भी दिखाया जाये जो उनके 22वें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथ की जन्मस्थली है और मथुरा चैरासी मंदिर अंतिम केवली भगवान जम्मू स्वामी की निर्माणभूमि को भी सम्मिलित किया जाये। फतेहपुर सीकरी व मथुरा में प्राचीन जैन प्रतिमाओं का मिलना भी इन क्षेत्रों का विशेष महत्व जैन धर्म की दृष्टि से है। इसे म्यूजियम में बताया जाये।

ईसाई धर्म का इतिहासः– ईसाई धर्म की दृष्टि से भी लाल ताजमहल (कैथोलिक सिमेट्री) निकट भगवान टाॅकीज, सेन्ट पीटर्स चर्च व अकबरी चर्च के रूचिकर इतिहास से भी पर्यटकों को रूबरू कराया जाये।

कुल मिलाकर यह म्यूजियम हमारी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक, धार्मिक और परम्परागत कलाओं की विरासत को दिखाने वाला हो, जहां आधुनिक टेक्नोलाॅजी और तरीके अपनाये जायें। मात्र कुछ आर्टिफेक्टस को प्रदर्शित करने से हम पर्यटकों को अपने उत्कृष्ट इतिहास और कला को नहीं बता सकेंगे।

एडीएफ की ओर से यह भी सुझाव दिया गया कि एक विशेषज्ञों की समिति का गठन कर लिया जाये जो इस म्यूजियम की रूपरेखा को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का बनाने में अपने सुझाव दे। स्थानीय इतिहासकारों और स्टेक होल्डर्स को भी इस समिति में सहभागी बनायें।

वी फॉर आगरा ग्रुप के वरिष्ठ सदस्य डॉ. मुकुल पाण्डया, संदीप सिंघानियां व संजीव शर्मा द्वारा भी इन मांगों का समर्थन करते हुए आगरा के बहुआयामी पृष्ठभूमि को इस म्यूजियम के माध्यम से देश व दुनियां के सामने लाने की मांग की।

यह म्यूजियम किसी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की अनुभवी निजी संस्था द्वारा संचालित हो अन्यथा सरकारी व्यवस्थाओं के अनुरूप यहां ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती है। आगरा किले का प्रकाश व ध्वनि कार्यक्रम (लाइट एण्ड साउण्ड प्रोग्राम) इसका साक्षी है कि आगरा किले का इतना अच्छा वैन्यू होते हुए भी इसका सफलतापूर्वक संचालन नहीं हो सका है। एडीएफ के सचिव के0सी0 जैन द्वारा यह आशा व्यक्त की गयी कि निर्माणाधीन म्यूजियम आगरा के दर्शनीय स्थलों की फेहरिस्त में अपना महत्वपूर्ण स्थान हासिल करेगा। पत्र में यह भी अनुरोध किया गया कि वर्चुअल मीटिंग के माध्यम से हमें व अन्य स्टेकहोल्डर्स को अपनी बात प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया जाये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *