भूकंप: आगरा और मथुरा सहित समूचा ‘ब्रजक्षेत्र’ है अति संवेदनशील जोन 4 में

आगरा व मथुरा सहित समूचा ‘ब्रजक्षेत्र’ भी शामिल है भूकंप के प्रति अति संवेदनशील जोन 4 में
क्‍या आगरा और मथुरा के नव निर्माण में अपनाई गई है भूकंपरोधी तकनीक?
क्‍या होती है भूकंपरोधी तकनीक और कैसे किसी इमारत को बनाया जाता है भूकंपरोधी?
देशभर में पिछले पिछले कुछ समय से कम और मध्यम तीव्रता के भूकंप लगातार आ रहे हैं। राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में तो दो महीने के अंदर दर्जनों छोटे-छोटे भूकंप आ चुके हैं। जानकारों का कहना है कि ये छोटे-छोटे भूकंप इस क्षेत्र में किसी बड़े भूकंप की आहट हैं। कुछ भूगर्भ वैज्ञानिकों का तो यहांं तक मानना है कि कम तीव्रता वाले ये भूकंप किसी विनाशकारी भूकंप की आहट हो सकते हैं।
देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के प्रमुख का कहना है कि हम भूंकप के समय, जगह और तीव्रता का अनुमान तो नहीं लगा सकते लेकिन इतना तय है कि एनसीआर में जमीन के नीचे लगातार भूगर्भीय हलचल हो रही है और इससे दिल्ली-एनसीआर में बड़ा भूकंप आ सकता है।
याद कीजिए कि 25 अप्रैल 2015 को आये भूकंप ने नेपाल में बर्बादी का जैसा मंजर दिखाया था, उसके बाद भारत में भी इस पर खासी चर्चा की जाने लगी है कि यदि नेपाल जैसा भूकंप कभी भारत के उन क्षेत्रों में आया जो भूकंप के प्रति अति संवेदनशील जोन 4 में आता है तो स्‍थिति क्‍या होगी।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि दिल्‍ली-एनसीआर ही नहीं, उसके आसपास का “ब्रज वसुंधरा” कहलाने वाला सारा क्षेत्र जिसमें मथुरा व आगरा भी शामिल हैं, भूकंप के प्रति अति संवेदनशील जोन 4 में आता है।
दिल्‍ली से आगरा जहां करीब 200 किलोमीटर दूर है जबकि मथुरा 146 किलोमीटर की दूरी पर है। आगरा एक एतिहासिक शहर है और वहां ताजमहल सहित अनेक विश्‍व प्रसिद्ध इमारत हैं जबकि मथुरा को भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त है। इन दोनों ही शहरों का पुराना रिहायशी इलाका न सिर्फ काफी घना है बल्‍कि इस इलाके में खड़ी तमाम इमारतें, दुकान तथा मकान जर्जर अवस्‍था को प्राप्‍त हो चुके हैं।
मथुरा में तो अंदर का एक बड़ा हिस्‍सा मिट्टी के टीलों पर बसा है और इस हिस्‍से में ढाई-ढाई, तीन-तीन सौ साल पुराने मकान भी देखे जा सकते हैं।
जाहिर है कि इन पुराने व जर्जर मकानों व इमारतों में इतनी सामर्थ्‍य शेष नहीं है कि वह नेपाल जैसे किसी बड़े भूकंप को झेल सकें।
इन रिहायशी हिस्‍सों में शासन-प्रशासन भी कुछ कर पाने में असमर्थ है किंतु यदि बात करें आगरा और मथुरा के उस बाहरी हिस्‍से की जो तरक्‍की की दौड़ में शामिल होकर बहुमंजिला इमारतों से तो भरता जा रहा है किंतु उनके भी निर्माण में भूकंपरोधी तकनीक का इस्‍तेमाल नहीं किया जा रहा, तो चिंतित होना स्‍वाभाविक है। हालांंकि इन इमारतों के भूकंपरोधी होने का प्रचार करके लोगों को गुमराह अवश्‍य किया जा रहा है।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर कैसे बनती है कोई इमारत भूकंपरोधी, क्‍या कहता है इस बारे में हमारा कानून और सच्‍चाई के धरातल पर हो क्‍या रहा है?
इन सब बातों के जवाब जानने के लिए ”लीजेण्‍ड न्‍यूज़” ने जब विशेषज्ञों से बात की तो चौंकाने वाले तथ्‍य सामने आये। किसी बिल्‍डिंग को भूकंपरोधी बनाने लिए सबसे जरूरी है सॉइल टेस्टिंग रिपोर्ट। यह रिपोर्ट बताती है कि उस जगह की मिट्टी में बिल्डिंग का कितना वजन सहन करने की क्षमता है। इलाके की मिट्टी की क्षमता के आधार पर ही बिल्डिंग में मंजिलों की संख्या तय की जाती है और डिजाइन तैयार किया जाता है। तकनीकी शब्दों में इसे सॉइल की ‘बियरिंग कैपेसिटी’ कहा जा सकता है। इस रिपोर्ट से ही यह पता चलता है कि नेचुरल ग्राउंड लेवल के नीचे कितनी गहराई तक जाकर भूकंप के प्रति बियरिंग कैपेसिटी मिल सकती है। मान लीजिए यदि रिपोर्ट बताती है कि हमें तीन मीटर नीचे जाकर बियरिंग कैपेसिटी मिलेगी, तो यहां से स्ट्रक्चरल इंजीनियर का काम शुरू होता है। वह रिपोर्ट के आधार पर वहां डेढ़ बाई डेढ़ मीटर की फाउंडेशन तैयार करेगा। इसके बाद स्ट्रक्चरल इंजीनियर का काम बिल्डिंग का डिजाइन तैयार करना होता है। आजकल भूकंपरोधी मकान बनाने के लिए लोड बियरिंग स्ट्रक्चर की बजाय फ्रेम स्ट्रक्चर बनाए जाते हैं, जिनसे पूरी बिल्डिंग कॉलम पर खड़ी हो जाती है। कॉलम को जमीन के नीचे दो-ढाई मीटर तक लगाया जाता है। फ्लोर लेवल, लिंटेल लेवल, सेमी परमानेंट लेवल (टॉप) और साइड लेवल (दरवाजे-खिड़कियों के साइड) में बैंड (बीम) डालने जरूरी होते हैं।
कौन करेगा जांच
–मिट्टी की जांच की जिम्मेदारी सेमी गवर्नमेंट और कई प्राइवेट एजेंसी संभालती हैं। इसके लिए इंश्योरेंस सर्वेयर्स की तरह इंडिपेंडेंट सर्वेयर भी होते हैं।
–इसके लिए वे बाकायदा एक निर्धारित फीस चार्ज करते हैं।
–जांच के बाद एक सर्टिफिकेट जारी किया जाता है।
क्या पता चलेगा
–मिट्टी प्रति स्क्वेयर सेंटीमीटर कितना लोड झेल सकती है?
–यह जगह कंस्ट्रक्शन के लिए ठीक है या नहीं?
–इलाके में वॉटर लेवल कितना है?
–वॉटर लेवल और बियरिंग कैपेसिटी का सही अनुपात क्या है?
–मिट्टी हार्ड है या सॉफ्ट?
कितना आएगा खर्च
90 गज के प्लॉट के लिए करीब 25 हजार रुपये।
बिल्डिंग के लिए जिम्मेदारी
–टेस्टिंग के बाद सर्वेयर और बिल्डिंग डिजाइन करने के बाद स्ट्रक्चरल इंजीनियर एक सर्टिफिकेट जारी करता हैं। बिल्डिंग को कोई नुकसान पहुंचने पर इसकी भी जवाबदेही तय की जा सकती है।
क्या है सेफ
–कॉलम में सरिया कम-से-कम 12 मिमी. मोटाई वाला हो।
–फाउंडेंशन कम-से-कम 900 बाई 900 की हो।
–लिंटेल बीम (दरवाजों के ऊपर) में कम-से-कम 12 मिमी मोटाई का स्टील इस्तेमाल किया जाए।
–पुटिंग में कम-से-कम 10-12 मिमी. मोटाई वाले स्टील का प्रयोग हो।
–स्टील की मोटाई कंक्रीट की थिकनेस के आधार पर कम या ज्यादा की जा सकती है।
–स्टील की क्वॉलिटी बेहतर होनी चाहिए, ज्यादा इलास्टिसिटी वाले स्टील से बिल्डिंग को मजबूती मिलती है।
तैयार मकान
अगर आप प्लॉट पर अपना मकान बनवाने की बजाय पहले से ही तैयार कोई मकान लेने जा रहे हैं, तो उसकी जांच करने के लिए आपके पास विकल्प सीमित हो जाते हैं। इसके लिए ठीक ब्लड टेस्ट की तरह थोड़े-थोड़े सैंपल लेकर जांच की जा सकती है, लेकिन यह काम भी कोई आम आदमी नहीं कर सकता। इसके लिए किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर की सर्विस लेनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, तैयार मकान के कॉलम को किसी जगह से छीलकर सरिये की मोटाई और संख्या का पता लगाया जा सकता है। इसके लिए खास मशीन भी आती है, जो एक्स-रे की तरह कॉलम को नुकसान पहुंचाए बिना सरिये की स्थिति बता देती है। इसी तरह प्लिंथ (फ्लोर) लेवल पर कंक्रीट की थिकनेस और एरिया देखकर उसका मिलान मिट्टी की बियरिंग कैपेसिटी से कर सकते हैं। अगर कोई कमी पाई जाती है और लगता है कि मकान भूकंप नहीं सह सकता तो अतिरिक्त कॉलम खड़े करके उसे मजबूत बनाया जा सकता है। वैसे कंस्ट्रक्शन मटीरियल की जांच भी कुछ राहत दे सकती है।
मटेरियल की जांच
जमीन की मिट्टी ठीक होना ही बिल्डिंग की सुरक्षा के लिए काफी नहीं है, जरूरी है कि बिल्डिंग को तैयार करने में क्वॉलिटी मटेरियल भी लगाया गया हो। इस मटेरियल में कंक्रीट, सीमेंट, ईंट, सरिया आदि शामिल होता है। मटेरियल के ठीक होने या नहीं होने के संबंध में ज्यादातर संतुष्टि केवल डेवलपर के ट्रैक रिकॉर्ड और उसकी साख को देखकर ही की जाती है। फिर भी कुछ हद तक सावधानी बरती जा सकती है।
बिल्डिंग मटेरियल टेस्टिंग
–किसी प्रोफेशनल एजेंसी से भी बिल्डिंग मटेरियल की टेस्टिंग कराई जा सकती है।
–ये एजेंसियां पूरी बिल्डिंग या आपकी इच्छानुसार किसी खास हिस्से के मटेरियल की टेस्टिंग करेंगी।
–अलग-अलग तरह की जांच के लिए अलग-अलग फीस ली जाती है।
–जांच के बाद 10-15 दिनों में रिपोर्ट मिल जाती है।
प्रोफेशनल सर्टिफिकेट
–आरसीसी फ्रेमवर्क के तहत आने वाली चीजों की जांच किसी प्रोफेशनल से कराई जा सकती है।
–इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत पिलर, नींव, स्लैब्स आदि आते हैं।
–प्रोफेशनल के रूप में स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सटिर्फिकेट लिया जा सकता है।
साइट विजिट
–अंडर कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टी में फ्लैट बुक कराया है तो साइट विजिट जरूर करें।
–वहां मौजूद एक्सपर्ट/प्रोजेक्ट इंचार्ज से मटीरियल की जानकारी लें।
–आम आदमी को भी मौके पर रखे सामान को देखकर क्वॉलिटी का अंदाजा हो जाता है।
थर्ड पार्टी क्वॉलिटी चेक
–इस प्रक्रिया के अंतर्गत बिल्डर मिट्टी समेत सभी मटेरियल की क्वॉलिटी चेक कराता है।
–यह जांच प्राइवेट एजेंसियां निर्धारित मानकों के आधार पर करती हैं, जिन्हें मानना बिल्डर के लिए जरूरी होता है।
–सभी चीजों की जांच के बाद सर्टिफिकेट दिए जाते हैं, जिन्हें एक बार जरूर देख लेना चाहिए।
मल्टी स्टोरी फ्लैट
मल्टी स्टोरी फ्लैट भूकंपरोधी हैं या नहीं, यह जांच करने के ज्यादा मौके आपके पास नहीं होते। इसके लिए बिल्डर पर भरोसा कर लेना ही आमतौर पर उपलब्ध विकल्प होता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार किसी भी फ्लैट में इंडिविजुअल रूप से यह नहीं जांचा जा सकता कि वह भूकंपरोधी है या नहीं? इसके लिए पूरी बिल्डिंग की ही टेस्टिंग की जाती है। हां, डेवलपर से बिल्डिंग और फ्लैट का स्ट्रक्चरल डिजाइन मांगकर उसे किसी एक्सपर्ट से चेक कराया जा सकता है।
क्या है स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग
स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग सिविल इंजीनियरिंग का एक हिस्सा है। इसके अंतर्गत किसी बिल्डिंग, ब्रिज, डैम या किसी अन्य निर्माण का स्ट्रक्चर और कंस्ट्रक्शन का कार्य आता है। बिल्डिंग के स्ट्रक्चर को डिजाइन करते समय बिल्डिंग कैसे खड़ी होगी और इस पर कितना लोड आयेगा, इसका आंकलन सबसे पहले किया जाता है। बिल्डिंग कितने लोगों के लिए तैयार की जा रही है, यह बिल्डिंग कॉमर्शियल होगी या रेजीडेंशियल, जमीन किस तरह की है, मिट्टी की क्षमता कितनी है, उस स्थान पर भूकंप, बाढ़ व अन्य प्राकृतिक आपदाओं का कितना डर है आदि बातों को ध्यान में रखकर बिल्डिंग का डिजाइन तैयार किया जाता है। यह सारा कार्य स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग के अंतर्गत आता है। इसके अंतर्गत कॉलम, बीम, फ्लोर, स्लैब आदि की मोटाई जैसे मुद्दों पर भी गंभीर रूप से ध्यान दिया जाता है। स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड और इंडियन बिल्डिंग कोड के मानकों का ध्यान रखा जाता है, जिससे मकान या बिल्डिंग सालों-साल सुरक्षित रहते हैं।
स्ट्रक्चरल इंजीनियर और सावधानियां
–घर या बिल्डिंग बनवाने से पहले ही नहीं, फ्लैट खरीदते वक्त भी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सलाह लें।
–यह सलाह ड्रॉइंग डिटेल बनवाने तक ही सीमित न रहे। उस डिटेल पर पूरी तरह अमल भी करें।
–घर बनवाते वक्त/साइट पर स्ट्रक्चरल इंजीनियर से यह चेक करवाते रहें कि निर्माण सही हो रहा है या नहीं?
–आर्किटेक्ट और स्ट्रक्चरल इंजीनियर का आपसी मेल-जोल होना भी बहुत जरूरी है।
–अगर खुद घर बनवा रहे हैं तो कंस्ट्रक्शन पर आने वाली कुल लागत का अनुमान लगाना आसान हो जाता है।
गौरतलब है कि समय के अभाव और रेडीमेड के चलन ने मकानों का निर्माण खुद कराने की परंपरा को लगभग समाप्‍त सा कर दिया है। अधिकांश लोग निजी बिल्‍डर या डेवलेपमेंट अथॉरिटी द्वारा निर्मित कॉलोनियों में मकान खरीदने को प्राथमिकता देते हैं। निजी बिल्‍डर को अपनी कॉलोनी का डेवलेपमेंट अथॉरिटी से अप्रूवल लेने के लिए न सिर्फ सभी जरूरी कानूनी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं बल्‍कि इसके लिए भारी-भरकम रकम भी देनी पड़ती है।
क्‍या कहते हैं बिल्‍डर
इस बारे में बिल्‍डर्स का कहना है कि यदि वह किसी प्रोजेक्‍ट का नियमानुसार अप्रूवल लेना चाहें तो कभी प्रोजेक्‍ट खड़ा ही नहीं कर सकते। फिर भूकंपरोधी इमारत बनाने के मामले में तो अप्रूवल के बाद भी गुणवत्‍ता को चेक करने का प्रावधान शामिल है।
उनका कहना है कि किसी इमारत को भूकंपरोधी बनाने के लिए सबसे अहम और बेसिक चीज सॉइल टेस्टिंग रिपोर्ट की बात करें तो उसी पर कोई खरा नहीं उतरेगा।
शायद ही कोई बिल्‍डर हो जिसने अप्रूवल से पूर्व डेवलेपमेंट अथॉरिटी को नियमानुसार सॉइल टेस्टिंग रिपोर्ट दी हो जबकि अप्रूवल सबको दे दिया जाता है क्‍योंकि वहां अप्रूवल के लिए सॉइल टेस्टिंग रिपोर्ट की नहीं, कदम-कदम पर मोटे सुविधा शुल्‍क की दरकार होती है।
बिल्‍डर्स के कथन की पुष्‍टि इस बात से भी होती है कि अनेक प्रयास करने के बावजूद आज तक विकास प्राधिकरण का कोई अधिकारी इस मामले में मुंह खोलने को तैयार नहीं हुआ।
रही बात निर्माण कार्य शुरू हो जाने के बाद प्राधिकरण के अधिकारियों तथा तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा चेक करने की, तो उसका सवाल ही पैदा नहीं होता। पैदा होती है तो केवल हर सुविधा देने की कीमत जिसे वह इमारत के निर्माण की गति बढ़ने के साथ वसूलते रहते हैं।
विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद मथुरा और उसके उपनगर वृंदावन में बेहिसाब बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो चुकी हैं और तमाम ऐसी ही बिल्‍डिंग्‍स निर्माणाधीन हैं। इनमें 9 से लेकर 14 मंजिला इमारत तक शामिल हैं।
इन बहुमंजिला इमारतों को बनाने की इजाजत किस स्‍तर से और किस तरह दी गई है, यह जानकारी देने वाला भी कोई नहीं। अलबत्‍ता यह बात जरूर कही जा रही है कि मथुरा में 4 मंजिल से अधिक ऊंची इमारत को बनाने की परमीशन देने का अधिकार स्‍थानीय अधिकारियों के पास नहीं है।
निर्माणाधीन इन तमाम हाइट्स में से कई तो भर्त की जमीन पर खड़ी की जा रही हैं यानि जहां ये बन रही हैं, वह जगह पहले गड्ढे के रूप में थी जिसे बाद में मिट्टी भरवाकर समतल किया गया है जबकि इस तरह की जगह पर मल्‍टी स्‍टोरी बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। सामान्‍य मकान बनाने से पहले भी भर्त करने की एक जटिल प्रक्रिया अपनाने के बाद ऐसी जगह के लिए परमीशन दी जाती है।
इन हालातों में ब्रज वसुंधरा पर जगह-जगह बन रहीं मौत की ये हाइट्स जमीन के अंदर होने वाली जरा सी हलचल से कैसे ताश के पत्‍तों की तरह ढह जायेंगी, इसका अंदाज लगाना बहुत कठिन नहीं है है। तब इन ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं और उनमें रहने वालों का हाल क्‍या होगा, इसका भी अंदाज बखूबी लगाया जा सकता है… लेकिन अभी तो सब उसी तरह आंखें बंद किये बैठे हैं जैसे बिल्‍ली द्वारा देख लिए जाने पर भी कबूतर इस झूठी उम्‍मीद में अपनी आंखें बंद कर लेता है कि उसके ऐसा कर लेने से शायद मौत टल जायेगी।
कबूतर फिर भी बेवश होता है लेकिन यहां तो सब-कुछ जानते हुए लोग मौत को खुला निमंत्रण दे रहे हैं जो एक प्रकार से आत्‍महत्‍या का प्रयास ही है। भ्रष्‍टाचार की रेत और गारे पर टिकी इन तमाम हाइट्स को मौत की हाइट्स में तब्‍दील होते उतनी भी देर नहीं लगेगी जितनी कि पलक झपकने में लगती है लेकिन फिलहाल तो तरक्‍की का पैमाना बन चुकी इन हाइट्स की बुनियाद में झांकने का वक्‍त किसी के पास नहीं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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