Silver screen की चार परियां- पेशेंस कूपर, फातिमा बेगम, जुबैदा और सीतादेवी

आज भारतीय Silver screen में एक तरफ जहां पुरुषों का दबदबा हैं. वहीं महिलाएं भी उनको बराबरी की टक्कर दे रहीं हैं

Silver screen के उस दौर की अदाकाराओं में पेशेंस कूपर का नाम शुमार है। जो अपनी अदाकारी की वजह से आज भी लोगों के दिलों में स्मरणीय है। पेशंस कूपर एक भारत में जन्मी पाकिस्तानी फिल्म अभिनेत्री थी। कलकत्ता के एक एंग्लो-इंडियन, कूपर ने मूक और साउंड दोनों फिल्मों में एक सफल कैरियर बनाया। वह बॉलीवुड के शुरूआती सुपरस्टार में से एक थीं। पेशंस कूपर का जन्म 1905 कोलकाता में हुआ था। पेशंस कूपर आजादी के बाद पाकिस्तान चली गई थी। कराची में 1993 में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी उस दौर की फिल्मों में भारती बालक, जयदेव, रानी, सहित अनेक फिल्में हिट थी।

फातिमा बेगम
आज भारतीय Silver screen में एक तरफ जहां पुरुषों का दबदबा हैं. वहीं महिलाएं भी उनको बराबरी की टक्कर दे रहीं हैं, फिर चाहे वो अभिनय के मामले में हो या बॉलीवुड से जुड़े अन्य कामों जैसे निर्देशन, स्क्रिप्ट राईटर, आदि हो मगर, एक वक़्त ऐसा था, जब सिनेमा जगत में अभिनेत्रियों के अलावा महिलाओं का अन्य कार्यों में भागीदारी न के बराबर थी. ऐसे में इस धारणा को फातिमा बेगम ने तोड़ा. उन्होंने भारतीय सिनेमा को अपना बहुमूल्य योगदान दिया. उन्होंने फिल्मों में अभिनय के अलावा निर्देशक और राईटर के तौर पर भी अपना दमखम दिखाया. उस दौरान उन्होंने Silver screen के कई बड़े नामों के साथ काम किया था. उनके प्रवेश के बाद अन्य महिलाओं के लिए भी फिल्म उद्योग के रास्ते आसानी से खुल गए. आज फातिमा बेगम को भारतीय सिनेमा जगत की पहली महिला निदेशक के तौर पर याद किया जाता है। फातिमा बेगम चलचित्र जगत की पहली महिला निदेशक थी। स्वयं के प्रोडक्शन हाउस के फातिमा फिल्म्स के बैनर तले फातिमा बेगम ने 1926 में बुलबुल-ए-पेरिस्तान का निर्देशन किया। 1926 में, उसने फातिमा फिल्म्स की स्थापना की, जिसे बाद में 1928 में विक्टोरिया-फातिमा फिल्म्स के नाम से जाना जाने लगा। इस फिल्म में विदेशी तकनीक में इस्तेमाल होने वाले स्पेशल इफेक्ट का प्रयोग किया गया था. यह एक बड़ी बजट की मूवी थी. आकड़ों की माने तो इस फिल्म को बनाने में कई लाख रुपए खर्च हो गए थे।
फातिमा बेगम ने ं अदाकारी के साथ निर्देशक के रूप में भी कई सुपर हिट फिल्में दी। उनका जन्म 1892 और मृत्यु 1983 में हुई। फातिमा बेगम का जन्म भारत में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। मानना था कि फातिमा बेगम का नवाब सिदी इब्राहिम मोहम्मद यकुत खान तृतीय से विवाह हुआ था। हालांकि, नवाब और फातिमा बाई के बीच होने वाली शादी या अनुबंध का, या नवाब की तरफ से उसके किसी भी बच्चे को अपना मानने का कोई रिकॉर्ड नहीं है, यह मुस्लिम परिवार कानून में कानूनी पितृत्व के लिए एक शर्त है। वह मूक सुपरस्टार जुबैदा, सुल्ताना और शहजादी की मां थी। वह हुमायूं धनराजगीर और दुबेरेश्वर धनराजगीर, और जुबेदा और हैदराबाद के महाराजा नरसिंहुर धनराजगीर के बेटे और बेटी और सुल्ताना और कराची के एक प्रमुख व्यापारी सेठ रजाक की बेटी जामिला रजाक की दादी भी थी।
उसने उर्दू मंच पर अपना कैरियर शुरू किया बाद में वह फिल्मों में चली गई और अरदीशर ईरानी की मूक फिल्म वीर अभिमन्यु (1922) में शुरूआत की। पुरुषों के लिए नाटकों और फिल्मों में महिलाओं की भूमिका खेलना आम बात थी, इसलिए वह उस दौर की सुपरस्टार बन गई। फातिमा बेगम का रंग गोरा था और गूढ़ मेक-अप करती थी जो कि स्क्रीन पर सेपिया / काले और सफेद छवियों को जंचते थे।
वह फंतासी सिनेमा के लिए एक अग्रणी बन गई, जहां उन्होंने शुरूआती विशेष प्रभावों के लिए नकली फोटोग्राफी का इस्तेमाल किया। वह कोहिनूर स्टूडियोज और इंपीरियल स्टूडियोज में एक अभिनेत्री थी, जबकि फातिमा फिल्म्स पर अपनी फिल्मों में लेखन, निर्देशन, प्रोडक्शन और अभिनय सभी करती थी।
1983 में इक्यानबे वर्ष की परिपक्व उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। फातिमा बेगम ने अपनी आखिरी फिल्म दुनिया क्या कहेगीह्ण में काम किया. इसके बाद उन्होंने अपनी मर्जी से भारतीय सिनेमा जगत को अलविदा कह दिया। अपने 16 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने आर्देशिर ईरानी और नानू भाई जैसे मशहूर फिल्म निमार्ताओं के साथ भी काम किया था।
उनकी विरासत उनकी बेटी जुबेदा ने आगे बढ़ाई, जिसे एक मूक फिल्म स्टार के अलावा, भारत की पहली टॉकी, आलम आरा में काम किया।

जुबैदा
फिल्म आलमआरा के साथ इस फिल्म की अदाकारा जुबैदा बेगम का नाम आज भी दिलों में अपना स्थान बनाए है। जुबैदा बेगम देश की पहली महिला निदेशक सुल्ताना बेगम की बेटी थी। प्रसिद्ध कलाकार मा.विट्ठल के साथ जुबैदा की आलमआरा (1931) पहली भारतीय टॉकी फिल्म थी। जुबैदा उस दौर की अदाकारा थी जब नारी का परदे की दुनिया में प्रवेश हेय था।
ब्रिटिशकाल की बाम्बे प्रेसीडेंसी के सूरत शहर में सन 1911 में जन्मी जुबैदा ने परदे की दुनिया से 1922 से 1949 तक नाता रखा था। आजाद भारत के बाम्बे शहर महाराष्ट्र राज्य में उनकी 76-77 वर्ष की अवस्था में सन 1988 में उनका निधन हो गया था। जुबैदा का ताल्लुक शाही परिवार से था।
जुबेदा केवल 12 वर्ष की थी जब उसने कोहिनूर में पदार्पण किया था। 1920 के दशक के दौरान उन्होंने सुल्ताना के साथ स्क्रीन पर कई बार अभिनय किया, जो तब तक भारतीय सिनेमा की सबसे अग्रणी महिलाओं में से एक बन गई थीं। 1924 में कल्याण खजीना की दो बहनों को अभिनीत करने वाली फिल्मों में से एक थी। उन्होंने जुबैदा की पहली ब्लॉकबस्टर में स्क्रीन भी साझा की थी, वीर अभिमन्यु ने दो साल पहले रिलीज की, जिसमें उनकी माँ, फातिमा बेगम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
1925 में जुबेदा की नौ रिलीज हुईं, उनमें काला चोर, देवदासी और देश का दुश्मन। एक साल बाद उसने अपनी माँ की फिल्म, बुलबुल-ए-पारिस्तान में अभिनय किया। 1927 उनके लिए लैला मजनू, नानंद भौजाई और नवल गांधी के बलिदान के साथ यादगार रही जो इस समय बहुत सफल फिल्में थीं। रवींद्रनाथ टैगोर की ‘बालिदान’ के आधार पर, बाद में सुलोचना देवी, मास्टर विट्ठल और जल खंबट्टा ने भी अभिनय किया। इसने बंगाल के कुछ काली मंदिरों में पशु बलि की सदियों पुरानी प्रथा की निंदा की। भारतीय सिनेमेटोग्राफ समिति के सदस्यों को इस उत्कृष्ट और वास्तव में भारतीय फिल्म द्वारा पहना गया था। इसके यूरोपीय सदस्यों ने सिफारिश की कि इसे स्क्रीनिंग के लिए विदेश भेजा जाए।
30 और शुरूआती 40 के दशक में उन्होंने कई सफल पौराणिक फिल्मों में अभिनय किया, जिसमें सुभद्रा, उत्तरा और द्रौपदी जैसे किरदार निभाए। 1934 में उन्होंने नानूभाई वकील के साथ महालक्ष्मी मूवीटोन की स्थापना की और गुल-ए-सोनोबार और रसिक-ए-लैला में बॉक्स-आॅफिस पर एक साथ काम किया। वह 1949 तक साल में एक या दो फिल्मों में दिखाई देती रहीं। निर्धोश अबला उनकी आखिरी फिल्म थी। जुबेदा की प्रमुख फिल्में इस प्रकार हैं- कोहिनूर (1923) कल्याण खजीना (1924) काला चोर (1925) देवदासी (1925) देश का दुश्मन (1925) बुलबुल-ए-परिस्तान (1926) बालिदान (1927) आलम आरा (1931) वीर अभिमन्यु (1931) मेरी जान (1931)जरीना (1932) गुल-ए-सोनोबार (1934) रसिक-ए-लैला (1934) देवदास (1937) निर्धोश अबला (1949)

सीतादेवी
उस दौर की अदाकाराओं में विदेशी बालाओं का बोलबाला था और इसीलिए उस दौर की रैनी स्मिथ को भारतीय Silver screen पर सीता देवी के रूप में पेश कियागया। सीता देवी उर्फ रैनी स्मिथ ने अपनी शुरूआत द लाइट आफ एशिया फिल्म से 1925 में की थी। उनकी तीन सबसे सफल फिल्में थीं: द लाइट आॅफ एशिया, शिराज और प्रपंच पाश। इन तीनों फिल्मों को बवेरियन कंपनी एमेल्का के साथ जर्मन फिल्म निर्देशक फ्रांज ओस्टेन और भारतीय अभिनेता-निमार्ता हिमांशु राय के सहयोग से बनाया गया था। यह अद्वितीय त्रयी तीन अलग-अलग धर्मों से जुड़े थे और भारतीय इतिहास / पौराणिक कथाओं की तीन अलग-अलग कहानियों पर आधारित थे: द लाइट आॅफ एशिया बुद्ध के जीवन पर आधारित था, शिराज ताजमहल और प्रपंच पश के निर्माण पर आधारित था सीता देवी इन तीनों फिल्मों में अग्रणी अभिनेत्री थीं, हालांकि शिराज में भूमिका ‘दूसरी महिला’ की थी।
उनकी तीन अन्य सफल फिल्में, दुर्गेश नंदिनी, कपल कुंडला और कृष्णकरन विल बंकिम चंद्र चटर्जी के लोकप्रिय उपन्यासों पर आधारित थीं। कई लोगों का मानना था कि रेनी स्मिथ और उनकी बहन पर्सी स्मिथ वैकल्पिक रूप से ‘सीता देवी’ के रूप में दिखाई दीं।

  • अनिल शर्मा

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