पूर्व NSA ने कहा, ये वक्‍त भारत के लिए चुनौतियां के साथ मौके भी लाया है

नई दिल्‍ली। भारत के सामने एक नई चुनौती है चीन की। दुनियाभर में आ रहे बदलावों के बीच भारत और चीन के रिश्‍ते भी बदल चुके हैं। 2012 के बाद से दोनों देशों के बीच दूरियां और तनाव बढ़ा है। पूर्व राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार NSA शिवशंकर मेनन लिखते हैं कि दुनिया अब दो गुटों वाली नहीं रही, न ही शीत युद्ध जैसे हालात हैं, न किसी एक देश का जोर चलता है, न ही यह पूरी तरह से बहुध्रुवीय है। वह लिखते हैं कि अमेरिका और चीन जैसी दो महाशक्तियां आपस में भिड़ रही हैं। उनके मुताबिक फिलहाल ऐसा वक्‍त है जो भारत के लिए चुनौतियां भी लेकर आया है और मौके भी। वह भारत की चीन नीति को ‘रीसेट’ करने की वकालत करते हैं। उन्‍होंने चीन की चुनौती से कैसे निपटा जाए, इस बारे में अपने सुझाव भी दिए हैं।
चीन पर निर्भरता कम करे भारत
मेनन लिखते हैं कि भारत को सबसे पहले खुद को मजबूत करने पर ध्‍यान देना चाहिए। उनके मुताबिक पिछले साल शुरू किए गए सैन्‍य सुधार इस दिशा में अच्‍छी शुरुआत साबित होंगे। चीन-पाकिस्‍तान के मिलकर काम करने के खतरे और चीन की वैश्विक रणनीति में पाकिस्‍तान की बढ़ती मौजूदगी के मद्देनजर सेना को दो मोर्चों पर जंग के लिए तैयार रहना चाहिए। मेनन के अनुसार सेना के तीनों अंगों की ताकतों का ध्‍यान रखते हुए हमें उन्‍हें और सुदृढ़ बनाना होगा। वह कहते हैं कि हमें विदेश मामलों को लेकर जिस तरह से आगे बढ़ना चाहते हैं, उससे घरेलू स्‍तर की नीतियों को अलग नहीं किया जा सकता। वह महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर निर्भरता कम करने का सुझाव रखते हैं।
खतरा सिर पर है, तैयारी पुख्‍ता रहे
चीन की हालत अभी ऐसी नहीं कि वह एशिया का नेतृत्‍व कर सके। मेनन यह बात मानते हैं मगर कहते हैं कि भारत के पड़ोस में उसकी भूमिका पड़ेगी। उन्‍होंने पहले से ही आने वाले खतरों से निपटने के कदम उठाने का सुझाव दिया। मेनन के अनुसार चीन के अभी जैसे तेवर हैं, उस स्थिति में एशिया की सुरक्षा और आर्थिक स्थिति पर उसका दबदबा भारत के हित में नहीं। वह कहते हैं कि जब तक चीन के व्‍यवहार में बदलाव नहीं आता, तब तक भारत और चीन के तनाव को मैनेज किया जा सकता है, सुलझाया नहीं जा सकता।
एशिया में पावर बैलेंस बनाए भारत
पूर्व NSA का सुझाव है कि एशिया के भीतर भारत अपने उन मित्रों को साथ ले जो दुनिया के संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं, चीन से जुड़ी भारतीय चिंताओं को समझते हैं और उसे बदलने या निपटने में मदद कर सकते हैं। अमेरिका, जापान और अन्‍य मित्र देश हिंद-प्रशांत के खो चुके समुद्री संतुलन को बहाल करने में मदद कर सकते हैं। मेनन के अनुसार, भारत का खुद को मजबूत करना या फिर एशिया की राजनीति को बैलेंस करना आसान नहीं होगा मगर ऐसा किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक इसके लिए हमारी विदेशी आर्थिक नीतियों के हमारे राजनीतिक और आर्थिक कार्यों से मेल खाने की जरूरत होगी।
मेनन के मुताबिक चीन से मिल रही प्रमुख चुनौती महाद्वीपीय स्‍तर की है। इसके लिए क्‍वाड या हिंद-प्रशांत रणनीति से परे जाकर तैयारी करनी होगी। उन्‍होंने सलाह दी कि भारत को ईरान, रूस और तुर्की जैसी एशियाई ताकतों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। हालांकि उन्‍होंने चेताते हुए यह भी कहा कि चीन को लेकर जुनून के चलते हमें हमारी राष्‍ट्रीय रणनीति के प्रमुख लक्ष्‍य- भारत के बदलाव, से भटकना नहीं चाहिए।
सिर्फ भारत ही चीन को छोड़ सकता है पीछे
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में एनएसए रहे मेनन के अनुसार अगर चीन इसी तरह का रुख बनाए रखता है तो इस दशक में उससे हमारा सामना एक ताकतवर पड़ोसी की तरह होगा। उन्‍होंने कहा कि भारत के पास चीन से बातचीत और प्रतिद्वंदिता के मिश्रण के अलावा कोई विकल्‍प नहीं है। उन्‍होंने उम्‍मीद जताते हुए कहा कि अगर कोई देश चीन की बराबरी या उसे पीछे छोड़ सकता है तो वह भारत है। चीन की चुनौती का असली जवाब भारत को एक मजबूत, समृद्ध और शांतिपूर्ण देश में बदलकर होगा।
-एजेंसियां

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