ISI के पूर्व प्रमुख ने कहा: अफ़ग़ान तालिबान पर पाकिस्तान का कोई ‘असर नहीं’, पाकिस्तान के कहने पर कश्मीर में नहीं देंगे दखल

पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI के पूर्व प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) असद दुर्रानी ने कहा है कि अफ़ग़ान तालिबान पर पाकिस्तान का कोई ‘असर नहीं है’. तालिबान भारत समेत हर देश के साथ अपने हितों के आधार पर रिश्ते बनाएंगे.
दुर्रानी ने ये दावा भी किया कि अफ़ग़ान तालिबान पाकिस्तान के कहने पर ‘कश्मीर में दखल नहीं देंगे.’
दुर्रानी ने आईएसआई के मौजूदा प्रमुख लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद के काबुल के हालिया दौरे पर सवाल भी उठाए. उन्होंने कहा कि ये दौरा ‘मुनासिब नहीं’ था. इसे लेकर बेवजह अटकलों का बाज़ार गर्म हो गया.
अफ़ग़ानिस्तान में भारत के असर और तालिबान के साथ संभावित रिश्तों के सवाल पर दुर्रानी ने बीबीसी से कहा, “तालिबान दुनिया के किसी भी देश के साथ अपने हितों को ध्यान में रखते हुए संपर्क रखना चाहेंगे. चाहे वो देश भारत हो या फिर रूस.”
अफ़ग़ान तालिबान ने बीती 15 अगस्त को काबुल पर कब्ज़ा किया था और उसके बाद वो भारत से संपर्क साध चुके हैं.
बीते महीने के आखिर में भारत के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर बताया था कि क़तर में ‘भारत के राजदूत दीपक मित्तल ने तालिबान राजनीतिक ऑफ़िस के प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकज़ई से मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात के लिए तालिबान की ओर से गुज़ारिश की गई थी.’
हालांकि, उस मुलाक़ात के दौरान “बातचीत का फ़ोकस अफ़ग़ानिस्तान में फँसे भारतीयों की सुरक्षित और जल्दी वापसी पर था.”
अफ़ग़ानिस्तान की पूर्व सरकारों के साथ भारत के करीबी संबंध रहे. भारत ने साल 2001 के अमेरिकी हमले के बाद अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई और बड़ा निवेश किया लेकिन अब तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ रिश्तों के सवाल पर भारत ने अपना रुख साफ़ नहीं किया है.
दुर्रानी ने कहा, “ये कहना ठीक नहीं होगा कि अफ़ग़ानिस्तान से भारत बाहर निकल गया है. अभी का घटनाक्रम अस्थाई है.”
दुर्रानी ने कहा कि अगर भारत तालिबान से संपर्क करता है और कहता है कि उसे अफ़ग़ानिस्तान में निवेश करना है तो तालिबान उन्हें यकीनी तौर पर आने देंगे. ये एक वास्तविकता है.
भारत का असर
असद दुर्रानी ने कहा कि तालिबान चाहेंगे कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में निवेश करे. अफ़ग़ानिस्तान के लोगों और वहां के समाज पर भारत का बड़ा प्रभाव है. इस मामले में भारत बेहतर स्थिति में है.
भारत की अफ़ग़ानिस्तान से सीमा नहीं लगती है लेकिन वहां भारतीयों का असर दिखता है. भारत की फ़िल्में पसंद की जाती हैं.
भारत और तालिबान के संभावित रिश्तों पर पाकिस्तान के प्रभाव को लेकर दुर्रानी ने कहा, “भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच ऐतिहासिक रिश्ते रहे हैं. पाकिस्तान के इसमें हस्तक्षेप का कोई मतलब नहीं है.”
तालिबान पर पाकिस्तान के असर को लेकर उन्होंने कहा, “न तो पहले पाकिस्तान का उन पर कोई असर था और न ही अब है.”
कश्मीर पर क्या कहा?
दुर्रानी ने ये दावा भी किया कि तालिबान कश्मीर में पाकिस्तान का साथ नहीं देंगे. असद दुर्रानी ने दावा किया कि अफ़ग़ान तालिबान किसी से ‘निर्देश’ नहीं लेते हैं.
वो अपने हित की बात जानते हैं और वो किसी के कहने पर तुरंत कुछ भी मान लेने के लिए तैयार नहीं होंगे.
उन्होंने कहा, “तालिबान साझा हितों को लेकर पाकिस्तान से बात करते हैं लेकिन अगर कोई सोचता है कि वो कश्मीर के सशस्त्र मूवमेंट में पाकिस्तान की ओर से शामिल हो जाएंगे तो ऐसा कभी नहीं होगा.”
भारत से रिश्तों का आरोप
दुर्रानी साल 1990 और 1991 में आईएसआई के प्रमुख थे. इसके पहले उन्होंने पाकिस्तान में मिलेट्री इंटेलिजेंस की कमान संभाली थी.
दुर्रानी ने भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत के साथ मिलकर ‘स्पाई क्रॉनिकल्स’ नाम की किताब भी लिखी जिसे लेकर पाकिस्तान में खूब विवाद हुआ.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों ने दुर्रानी पर रॉ के साथ संबंध रखने का आरोप लगाया था. ये भी कहा गया कि उन्होंने किताब में पाकिस्तान की ‘राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों का ज़िक्र’ किया.
उन पर सरकारी अधिकारियों के लिए गोपनीयता से जुड़े ‘ऑफ़िशियल सीक्रेट एक्ट्स 1923’ के उल्लंघन का भी आरोप लगाया गया.
पाकिस्तान सरकार ने मई 2018 में उनका नाम एक्ज़िट कंट्रोल लिस्ट (ईसीएल) में शामिल कर दिया था और उनके देश बाहर जाने पर रोक लगा दी गई थी लेकिन इस साल मार्च में इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने उनका नाम ईसीएल से बाहर निकालने का आदेश दिया था.
आईएसआई प्रमुख हमीद की आलोचना
दुर्रानी ने आईएसआई प्रमुख लेफ़्टिनेट जनरल फ़ैज़ हमीद की उनके काबुल दौरे को लेकर आलोचना की.
दुर्रानी ने कहा, “डॉयरेक्टर जनरल के पास तमाम ऐसे तरीके थे जिनके ज़रिए वो गुपचुप तरीके से ऐसी मुलाक़ातें कर सकते थे.”
उन्होंने कहा कि इस इलाक़े में पाकिस्तान की भूमिका की अहमियत बताने के लिए दौरा किया जाना ठीक था लेकिन इससे जुड़ी बातों का बाहर आना ठीक नहीं रहा.
फ़ैज़ हमीद अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की अंतरिम सरकार के गठन के ठीक पहले 5 सितंबर को अचानक देश की राजधानी काबुल पहुंचे थे. उनके उस दौरे की तस्वीरें भी मीडिया में आईं थीं.
काबुल दौरे से जुड़ी तस्वीरों और वीडियो में लेफ़्टिनेंट जनरल फ़ैज़ हमीद होटल की लॉबी में चाय का प्याला थामे नज़र आए थे.
तब उन्होंने पत्रकारों से कहा था, “फिक्र मत कीजिए सब ठीक रहेगा.”
उसके बाद भारत समेत दुनिया भर के मीडिया में आईएसआई प्रमुख हमीद के काबुल दौरे को लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई गईं.
दुर्रानी ने इसकी आलोचना करते हुआ कहा है कि इस स्थिति से बचा जा सकता था.
आईएसआई प्रमुख के दौरे और उसके बाद जो कुछ हुआ, उसे लेकर दुर्रानी ने कहा कि फ़ैज़ हमीद के दौरे के वक़्त एक समूह ने पंजशीर में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर अफ़वाहें फैलाईं. इसे लेकर अटकलें लगाई जाने लगीं. अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका और भविष्य की रणनीति को लेकर भी अनुमान लगाए जाने लगे.
दुर्रानी ने कहा कि वो आईएसआई प्रमुख और तालिबान नेताओं की मीटिंग को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे लेकिन इतना ज़रूर कहेंगे कि अगर वो आईएसआई प्रमुख की जगह होते तो तालिबान के साथ सार्वजनिक मुलाक़ात अलग तरह से करते.
‘मुंह बंद रखें’
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता देने के सवाल पर दुर्रानी ने कहा कि पाकिस्तान का फ़ैसला अहम है लेकिन इसके लिए चीन, तुर्की, क़तर, रूस, ईरान और मध्य एशिया के देशों और सहयोगियों से चर्चा की जानी चाहिए. उन्होंने इस मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख की सराहना की.
इस मामले में मंत्रियों की ओर से दिए जाने वाले बयानों को ग़ैरज़रूरी बताते हुए दुर्रानी ने कहा, “वक़्त से पहले बयान देने का कोई मतलब नहीं है. इस पर मुंह बंद रखा जाना ही ज़्यादा मुनासिब है. ”
उन्होंने कहा कि ऐसे मसलों को कूटनीतिक स्तर पर ही तय करने दिया जाना चाहिए. अगर सरकार के कोई मंत्री या प्रवक्ता किसी निजी चैनल पर अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार को लेकर कोई ऐसा बयान देते हैं जो सरकार की विदेश नीति से अलग हो तो ये ठीक नहीं रहेगा.
टीटीपी से रिश्ते
तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के साथ अफ़ग़ान तालिबान के रिश्तों के सवाल पर दुर्रानी ने कहा कि वो कभी ‘उनके साथ रिश्ते नहीं तोड़ेंगे.’
टीटीपी पर पाकिस्तान में कई चरमपंथी हमले करने के आरोप हैं. पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार ने बीते महीने जानकारी दी थी कि उन्होंने इसे लेकर अफ़ग़ान तालिबान से संपर्क किया है और तालिबान ने भरोसा दिलाया है कि वो टीटीपी के चरमपंथियों को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन इस्तेमाल नहीं करने देंगे.
संयुक्त राष्ट्र की जुलाई में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के छह हज़ार से ज़्यादा प्रशिक्षित लड़ाके हैं.
अफ़ग़ानिस्तान की अमेरिका के समर्थन वाली पूर्व सरकार से अफ़ग़ान तालिबान के संघर्ष के दौरान टीटीपी ने उनका समर्थन और सहयोग किया.
दुर्रानी ने कहा कि टीटीपी के साथ अफ़ग़ान तालिबान के पुराने रिश्ते हैं. पाकिस्तान में सैन्य अभियान के बाद वो देश के बाहर गए तो उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में ‘पनाह’ मिली.
दुर्रानी ने कहा कि पाकिस्तान सरकार को टीटीपी से बात करनी चाहिए और उनको मुख्यधारा में लाने की कोशिश करनी चाहिए.
-एजेंसियां

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