टिकट बंटवारे के खेल में भाजपा के दिग्‍गजों पर उठ रही हैं उंगलियां, वार्ड 64 की रिक्‍त सीट बनी खासी चर्चा का विषय

मथुरा। निकाय चुनावों के लिए टिकटों के बंटवारे को लेकर यूं तो सभी प्रमुख पार्टियों में असंतुष्‍टों की अच्‍छी-खासी संख्‍या है किंतु भाजपा में हुआ टिकट बंटवारे का खेल, उसका खेल बिगाड़ भी सकता है।
बताया जाता है कि कृष्‍ण की नगरी में भाजपा के पदाधिकारियों ने टिकटों के बंटवारे में बड़ा खेल किया है और इस वजह से पार्टी के अंदर न सिर्फ असंतुष्‍ट एवं बागियों की बड़ी फौज खड़ी हो गई है बल्‍कि कई तो निर्दलीय की हैसियत से चुनाव लड़ने उतर पड़े हैं।
टिकटों के बंटवारे में भाजपा द्वारा किए गए खेल का सबसे बड़ा उदाहरण वार्ड संख्‍या 64 को बताया जा रहा है। इस वार्ड से भाजपा ने जिस व्‍यक्‍ति को पार्षद पद का उम्‍मीदवार बनाया था, वह ऐन वक्‍त पर पर्चा दाखिल करने ही नहीं पहुंचा और ऐसा करने के पीछे खुद का बीपी हाई होना बता दिया।
उधर पार्टी के सूत्रों का कहना है कि उसका ऐन वक्‍त पर बीपी हाई होना पहले से तय था क्योंकि उसी वार्ड से खड़े हुए एक बाहुबली पुत्र को भाजपा अंदरखाने समर्थन करने का वायदा कर चुकी थी।
सूत्रों के मुताबिक इस बाहुबली से भाजपा के प्रदेश स्‍तरीय उन नेताओं के निकट संबंध हैं जिनकी टिकटों के बंटवारे में खूब चली है।
भाजपा के सूत्रों की इस बात में इसलिए भी दम मालूम पड़ता है क्‍योंकि विधानसभा चुनावों के दौरान शहरी सीट पर चुनाव लड़े श्रीकांत शर्मा इन बाहुबलियों के घर तक गए थे जबकि इनके ऊपर समाजवादी पार्टी का ठप्पा लगा है।
तब श्रीकांत शर्मा का इनका यहां जाकर ढोक देना, पार्टी ही नहीं शहर में भी खासी चर्चा का विषय बना था।
चूंकि श्रीकांत शर्मा अब एक ओर जहां ऊर्जा मंत्री के पद पर काबिज हैं वहीं दूसरी ओर प्रदेश सरकार के प्रवक्‍ता का पद भी संभाले हुए हैं लिहाजा इस मामले में उनकी भूमिका को लेकर पार्टीजनों का सवाल उठाना लाजिमी है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि हमेशा से समाजवादी रहे बाहुबलियों का पुत्र समाजवादी पार्टी की जगह कांग्रेस की टिकट पर चुनाव मैदान में है और कांग्रेस ने जिसे इस वार्ड से अपना उम्‍मीदवार घोषित किया था, उसने भी उनके सामने समर्पण करके पार्टी से उन्‍हें टिकट दिलाने में सहयोग किया।
भाजपा के सूत्रों की मानें तो जिस वक्‍त वार्ड 64 का उनका पार्षद उम्‍मीदवार बीपी हाई होने के कारण पर्चा दाखिल करने में असमर्थता की बात कह रहा था, उस समय वह बाहुबलियों के घर बैठा था और इस पूरे खेल में भाजपा के ही कुछ लोग शामिल थे।
ऐसा ही दूसरा मामला वार्ड नंबर 68 को लेकर हुआ जहां भाजपा ने अपनी लिस्‍ट में पार्टी के स्‍थानीय पदाधिकारी चिंताहरण चतुर्वेदी का नाम घोषित किया था किंतु चिंताहरण चतुर्वेदी ने बाद में अपनी असमर्थता जताकर चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यह खड़ा होता है कि क्‍या पार्टी ने चिंताहरण चतुर्वेदी को आवेदन किए बिना उम्‍मीदवार घोषित कर दिया था या चिंताहरण चतुर्वेदी ने कुछ खास कारणों से अपने कदम खींच लिए।
यहां से पार्टी ने फिर आनन-फानन में दीपू चौबे के नाम की घोषणा तो कर दी लेकिन बताया जाता है कि उसका मुकाबला निर्दलीय अनुराग चतुर्वेदी और वरिष्‍ठ कांग्रेसी नेता महेश पाठक के भतीजे कांग्रेस उम्‍मीदवार से है जिस कारण मुकाबला काफी कड़ा होने की संभावना है।
वार्ड 59 में तो भाजपा ने जैसे बिना लड़े ही हार मान ली है क्‍योंकि यहां कई प्रमुख दावेदारों को दरकिनार कर ऐसे व्‍यक्‍ति को उम्‍मीदवार बनाया है जो बाहरी होने के साथ-साथ क्षेत्र के लोगों को जानता तक नहीं।
यही नहीं, भाजपा की बढ़त वाले इस क्षेत्र में पूरा का पूरा मोहल्‍ला घाटी बहालराय, वोटर लिस्‍ट से गायब है और भाजपा को निश्‍चित ही इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
वृंदावन में हिंदूवादी नेता सौरभ गौड़ की पत्‍नी ब्रजबाला गौड़ को पार्टी ने टिकट न देकर समर्पित कार्यकताओं में रोष पैदा करने का काम किया, जिसके परिणाम स्‍वरूप सौरभ गौड़ की पत्‍नी अब निर्दलीय प्रत्‍याशी की हैसियत से चुनाव लड़ रही हैं।
वृंदावन के ही दूसरे समर्पित कार्यकर्ता रूपकिशोर शर्मा को भी भाजपा ने इस लायक नहीं समझा जबकि वह कई दशकों से पार्टी के साथ जुड़े थे। अब उन्‍होंने भी निर्दलीय प्रत्‍याशी के तौर पर पार्टी को चुनौती दी है।
ऐसे एक-दो नहीं अनेक उदाहरण हैं जिनके कारण भाजपा के टिकट बंटवारे में खेल किए जाने की बातें कही जा रही हैं।
कुछ लोग तो दबी जुबान से पैसे का लेनदेन होने जैसे गंभीर आरोप तक लगा रहे हैं किंतु उनके आरोपों की पुष्‍टि फिलहाल किसी स्‍तर से हो नहीं पा रही। चुनावों के बाद हो सकता है कि पार्टीजन खुलकर सामने आएं और सबूत भी पेश करें।
इधर मेयर पद के उम्‍मीदवार मुकेश आर्यबंधु को लेकर भी भाजपा में बहुत अधिक जोश नजर नहीं आ रहा, जबकि संभावित उम्‍मीदवारों की लिस्‍ट में से उन्‍हें ही सर्वाधिक उपयुक्‍त माना जा रहा है।
मुकेश आर्यबंधु के प्रति पार्टीजनों में उत्‍साह व जोश की कमी इसलिए भी साफ दिखाई देती है क्‍योंकि प्रचार के दौरान उनके साथ पार्टी का कोई बड़ा पदाधिकारी नहीं होता। वह अकेले अपने कुछ सजातीय बंधुओं को लेकर चुनाव प्रचार करते नजर आते हैं जो जनता के बीच चर्चा का कारण बना हुआ है।
मथुरा में निकाय चुनावों के लिए मतदान 26 नवंबर को होना है। इस तरह कुल 10 दिन शेष हैं जबकि क्षेत्र काफी बड़ा है। कहा जा रहा है कि भाजपा प्रत्‍याशियों के लिए यहां मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ तथा सांसद हेमा मालिनी की सभाएं होनी हैं लेकिन समय का अभाव इसमें आड़े आ सकता है। हेमा मालिनी के पास तो पहले से ही समय का अभाव है और योगी आदित्‍यनाथ को पूरा सूबा देखना है।
बेशक ये निकाय चुनाव हर पार्टी के लिए प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न बने हुए हैं किंतु भाजपा के लिए इसमें जीत-हार के मायने कुछ और हैं।
ऐसे में यदि भाजपा यहां पूर्ण बहुमत के साथ काबिज नहीं होती तो इसका प्रभाव एक ओर जहां विकास कार्यों पर पड़ेगा वहीं दूसरी ओर पार्टी की प्रतिष्‍ठा को भी धक्‍का लगेगा।
मथुरा की जनता पहले ही यमुना की बदहाली और शहर की नारकीय स्‍थिति को लेकर आक्रोशित है। यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर तो कई संगठनों से जल्‍द ही आंदोलन किए जाने का बिगुल तक बजा रखा है।
शहर के हालात उसकी गरिमा के अनुकूल बनाने के लिए जरूरी है कि नगर निगम के मेयर को पूर्ण बहुमत प्राप्‍त हो।
जहां तक सवाल कांग्रेस, सपा, बसपा तथा रालोद का है तो रालोद ने मेयर पद पर अपना कोई उम्‍मीदवार ही खड़ा नहीं किया और न किसी को समर्थन देने का ऐलान किया है।
समाजवादी पार्टी का अब तक का रिकॉर्ड बताता है कि उसे इन चुनावों में भी कोई उल्‍लेखनीय उपलब्‍धि शायद ही हासिल हो। कांग्रेस बमुश्‍किल मेयर पद का प्रत्‍याशी ढूंढ पाई है, हालांकि उसके प्रत्‍याशी में दम की कोई कमी नहीं है और उसके पार्षद प्रत्‍याशी भी मुकाबले में कमजोर दिखाई नहीं देते।
रालोद जरूर ऐसे चुनाव लड़ रही है जैसे मन न होते हुए मैदान में उतर पड़ी हो।
अब देखना यह है कि इन चुनावों का ऊंट किस करवट बैठता है किंतु फिर भी सत्ताधारी दल होते हुए भाजपा में टिकट बंटवारे को लेकर हुआ खेल सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ है और इस खेल में बड़े-बड़ों की संलिप्‍तता का बखान भी किया जा रहा है।
यदि पार्टी स्‍तर से ही लगाए जा रहे आरोपों में कोई दम है तो तय मानिए कि भाजपा की आगे की राह इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी में निश्‍चित ही कांटों भरी होगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी