खौफनाक नकाब लगाकर देश को डराने वालों का डर!

हिंदी साहित्य के पुरोधा महावीरप्रसाद द्विवेदी का पत्रकारिता के क्षेत्र में भी बहुत बड़ा योगदान है। हिंदी पत्रकारिता जगत में नींव के पत्थर ‘आज’ व ‘ प्रताप’ जैसे अखबारों के संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर व गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्रेरणा पाकर पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया था।
आचार्य द्विवेदी से गणेश शंकर विद्यार्थी किस कदर प्रभावित थे, इसका अंदाज उनके द्वारा कानपुर में स्‍थापित किए गए अखबार ‘प्रताप’ के प्रथम पृष्‍ठ पर छापी जाने वाली कविता की दो शुरूआती लाइनों से मिलता है।
आचार्य द्विवेदी की यह कविता थी-
‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।’
आचार्य द्विवेदी यदि आज जिंदा होते तो उनके ऊपर दक्षिणपंथी विचारधारा को पोषित करने का आरोप लगाया जा चुका होता। हो सकता है कि आचार्य द्विवेदी को “छद्म राष्‍ट्रवादी” और यहां तक कि “मोदी भक्‍त” की उपमा भी दे दी जाती क्‍योंकि उनकी कविता ”राष्‍ट्रभक्‍ति” के लिए प्रेरित करती है।
2014 में प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्‍द्र दामोदरदास मोदी का चुनाव एक वर्ग विशेष के लिए इतना बड़ा सदमा था जिससे वह हर हाल में उबरना चाहते हैं। फिर चाहे उसके लिए किसी भी हद तक गिरना पड़े।
याद कीजिए कांग्रेस के कद्दावर नेता और उस समय घोषित रूप से गांधी परिवार की नाक के बाल मणिशंकर अय्यर का वह वक्‍तव्‍य जिसमें उन्‍होंने एक प्रकार का ऐलान करते हुए कहा था कि एक चाय बेचने वाला कभी भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। हां, चुनाव बाद यदि वह चाहे तो कांग्रेस मुख्‍यालय के बाहर चाय बेच सकता है।
ऐसे में जब एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन गया तो सदमा लगना स्‍वाभाविक था।
यही कारण रहा कि 2014 से पहले पूरे दस साल तक पाकिस्‍तान के साथ बातचीत की ”वकालत” करने वाले कांग्रेसियों ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में तमाम देशों के साथ पाकिस्‍तान को भी निमंत्रण देने का विरोध किया।
दरअसल, यह तो शुरूआत थी। इसके बाद लगातार ऐसे-ऐसे मुद्दे उठाए जाते रहे जिनका आम जनता से दूर-दूर तक कोई वास्‍ता नहीं था। यहां तक कि नेशनल हेराल्‍ड केस में कोर्ट के आदेश को भी राजनीतिक विद्वेष बताकर कई दिनों तक संसद की कार्यवाही बाधित की गई।
इसके बाद ललित मोदी प्रकरण, विजय माल्‍या, सर्जीकल स्‍ट्राइक से लेकर आपराधिक घटनाओं तक के लिए मोदी को निशाना बनाया गया।
कभी सम्‍मान वापसी अभियान चलाया गया तो कभी जेएनयू के छुटभैये छात्र नेताओं का सहारा लिया गया। कभी हार्दिक की आड़ लेकर पटेल आंदोलन को हवा दिलाई गई तो कभी जिग्‍नेश मेवाणी और अल्‍पेश ठाकोर को मोहरा बनाया गया।
इस दौरान नोटबंदी और जीएसटी पर हंगामा खड़ा किया गया और देशभर में मोदी को खलनायक साबित करने का अथक प्रयास किया गया।
अब जबकि किसी भी तरह सदमे से उबरने में सफलता नहीं मिली तो पहले कुछ कथित ईसाई धर्मगुरुओं से चिठ्ठियां लिखवा दीं, और फिर एक लंबे अरसे से हाशिए पर पड़ी अरुंधति राय का इंटरव्‍यू ले आए।
अरुंधति राय ने एक सवाल के जवाब में कहा मोदी सरकार में जो चीज़ें घटित हो रही हैं वो डराने वाली हैं। उन्‍होंने यह नहीं बताया कि वह खुद कितनी डरी हुई हैं।
अरुंधति राय से पहले भी उंगलियों पर गिने जाने लायक कुछ लोगों ने कहा कि देश में डर का माहौल है।
अभिनेता आमिर खान ने इस माहौल का बयान करने के लिए अपनी बेगम को बलि का बकरा बनाया। हालांकि बाद में वह अपनी बेगम के डर का कारण बता पाने में असमर्थ रहे और मीडिया के सिर ठीकरा फोड़कर दबी जुबान में ”सॉरी” बोल दिया।
अरुंधति ने कहा, ”अगर भारत में आज के हालात देखें तो मुस्लिम समुदाय को अलग-थलग किया जा रहा है। सड़कों पर लोगों को घेर कर मार दिया जा रहा है। मुसलमानों को आर्थिक गतिविधियों से अलग किया जा रहा है। मांस के कारोबार, चमड़े के काम और हथकरघा उद्योग सब पर हमले किए गए हैं।” अरुंधति के अनुसार ”भारत में हिंसा की वारदातें डराने वाली हैं।
बेहतर होता कि अरुंधति यह सब बोलने से पहले कभी बांगलादेश की निष्‍कासित लेखिका तस्‍लीमा नसरीन से यह पूछ लेतीं कि उन्‍हें मोदीराज में डर क्‍यों नहीं लग रहा। वो तो अरुंधति की हमपेशा होने के साथ-साथ मुस्‍लिम भी हैं, और महिला भी।
आपराधिक वारदातें किसी के प्रति हों और कहीं भी हों, उनकी निंदा की जानी चाहिए किंतु उनका इस्‍तेमाल अपनी घटिया मानसिकता को पोषित करने तथा देश में जबरन भय का वातावरण तैयार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
अरुंधति जैसी महिला को तो यह सब बोलने का इसलिए भी कोई अधिकार नहीं है क्‍योंकि वह तो कश्‍मीर को भारत से अलग करने की हिमायत कर ही चुकी हैं।
न्‍यायालय द्वारा सबक सिखाए जाने के बाद भी उनका अनर्गल प्रलाप करना यह साबित करता है कि वह आदतन देशद्रोही हैं और देश को किसी न किसी माध्‍यम से बदनाम करना उनकी मुहिम का हिस्‍सा है।
सच तो यह है कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर देश की संवैधानिक संस्‍थाओं, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍थाओं, सेना व सुरक्षाबलों सहित मोदी सरकार और यहां तक कि न्‍यायपालिकाओं के निर्णयों पर सवाल उठाकर देश को बदनाम करने का बाकायदा एजेंडा चलाया जा रहा है।
इसी एजेंडे के तहत कथित डरे हुए लोग मोदी को पानी पी-पीकर कोसते हैं और प्रधानमंत्री के प्रति अभद्र भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं।
कैसा है आखिर ये डर, और कैसे हैं ये डरे हुए लोग जो खुद मुस्‍कुराते हुए टीवी चैनलों पर आते हैं, मीडिया को इंटरव्‍यू देते हैं, इंटरव्‍यू में देश के प्रधानमंत्री को नीच बताते हैं और सेना के खून की दलाली करने वाला कहते हैं।
क्‍या कोई डरा हुआ आदमी देश के प्रधानमंत्री को मंच पर चढ़कर खुलेआम गालियां दे सकता है। क्‍या किसी डरी हुई कौम का कोई नुमाइंदा (अकबरुद्दीन औवेसी) 15 मिनट मिलने पर सार्वजनिक रूप से देश के बहुसंख्‍यकों को नेस्‍तनाबूद करने की धमकी दे सकता है।
यह कैसा डर है भाई, जो सबको डराता है सिवाय उनके जो देश में डर का माहौल होने की बात करते हैं और राष्‍ट्रीय टीवी चैनल्‍स पर देश के प्रधानमंत्री को खुलेआम गरियाते हैं।
चेहरे पर नकाब चढ़ाकर जोर-जोर से चीखने-चिल्‍लाने वाले जब कहते हैं कि देश में भय का वातावरण है तो उनका षडयंत्र हर किसी को समझ में आता है।
समझ में आता है कि क्‍यों कुछ दल लामबंद होकर मतपत्रों के जरिए मतदान करने की बात करते हैं। क्‍यों वो उस युग में लौट जाना चाहते हैं जब ”बूथ कैप्‍चरिंग” आम बात हुआ करती थी।
खूब समझ में आता है कि आधी-आधी रात को दोषसिद्ध आतंकवादी के लिए सुप्रीम कोर्ट खुलवाने वाले तत्‍व ही पांच न्‍यायाधीशों की व्‍यक्‍तिगत प्रॉब्‍लम को समूची न्‍यायव्‍यवस्‍था पर खतरा बताने का दुष्‍प्रचार करते हैं।
क्‍यों सेना की सर्जीकल स्‍ट्राइक पर संदेह उत्‍पन्‍न किया जाता है और क्‍यों बार-बार निर्वाचन आयोग पर उंगली उठाई जाती है।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के ये कैसे हिमायती हैं जो एक पूर्व राष्‍ट्रपति द्वारा आरएसएस का निमंत्रण स्‍वीकार कर लेने पर सिर्फ इसलिए छाती पीटने लगते हैं कि कभी वह कांग्रेस के हिस्‍से हुआ करते थे।
क्‍या इनमें से कोई बता सकता है कि पूर्व राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी के लिए अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के मायने उन्‍होंने अलग गढ़ रखे हैं और अपने लिए अलग।
सच तो यह है कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के हक का जितना दुरुपयोग मोदी सरकार के रहते हो रहा है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का हक किसी को खुलेआम गाली देने, निराधार आरोपित करने अथवा देश में एक सुनियोजित साजिश के तहत भय का वातावरण बनाने के लिए नहीं मिला है। अपनी बात शालीनता के साथ कहने के लिए मिला है।
इस सबके बावजूद अरुंधति राय या उनके जैसे दूसरे लोगों को, संस्‍थाओं को अथवा वर्ग विशेष को यह लगता है कि मोदी सरकार में डर का माहौल है तो देशवासी होने के नाते पहले वह यह बताएं कि इस कथित डर को दूर करने के लिए उन्‍होंने क्‍या किया या वो क्‍या कर रहे हैं।
भारत ही क्‍या दुनिया के किसी भी देश में वहां के नागरिकों को कोई अधिकार सिर्फ इसलिए प्राप्‍त नहीं होता कि वह उस अधिकार का निजी हित में तो भरपूर इस्‍तेमाल करे किंतु जनता के बीच उसका जितना संभव हो दुरुपयोग करता रहे। वो भी इसलिए क्‍योंकि कुछ तत्‍व मोदी विरोधी बकवास को भी लपकने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं।
करोड़ों रुपए कमाकर सभी सुख-सुविधाओं से लैस ये डराने वाले लोग जब देश में डर का माहौल होने की बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई रावण एकबार फिर लक्ष्‍मण रेखा लांघकर देश के सतीत्‍व का हरण करने की कोशिश कर रहा है।
इन रावणों को समय रहते यह समझ लेना चाहिए कि लक्ष्‍मण रेखा लांघना हर युग में आत्‍मघाती साबित हुआ है। फिर वह युग मोदी का ही क्‍यों न हो।
लोकतंत्र में सरकार को कठघरे के अंदर खड़ा करने का हक सबको है किंतु देश को बदनाम करने का हक किसी को नहीं।
महावीरप्रसाद द्विवेदी के अनुसार ऐसा करने वाले नर के रूप में पशु और मुर्दे के समान हैं। शायद अब ऐसे मुर्दों को उनकी उचित जगह दिखाने का समय आ गया है क्‍योंकि उनसे निज गौरव व निज देश पर अभिमान करने की उम्‍मीद लगाना व्‍यर्थ है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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