शि‍क्षित लेकिन काफी रूढ़ि‍वादी था फैज़ अहमद फैज़ का परिवार

नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान आईआईटी कानपुर में फैज़ अहमद फैज़ की उर्दू नज्म ‘हम देखेंगे’ पढ़े जाने पर बवाल मच गया था।
पाकिस्तान के मशहूर शायर की इस नज्म को आईआईटी कानपुर की एक फैकल्टी मणींद्र अग्रवाल ने हिंदू विरोधी बता दिया।
दरअसल, इस नज्म में एक पंक्ति है- बस नाम रहेगा अल्लाह का। इसी पंक्ति के आधार पर नज्म को हिंदू विरोधी बताया गया।
इसके बाद खबर आई कि आईआईटी कानपुर ने एक समिति बनाई है जो यह पता करेगी कि क्या फैज़ की यह नज्म वाकई हिंदू विरोधी है। हालांकि, आईआईटी कानपुर ने तुरंत इस खबर का खंडन करते हुए कहा कि समिति तो बनाई गई है, लेकिन वह फैज की नज्म पर कोई विचार नहीं करेगी।
ऐसे वक्त में जब पाकिस्तान के फैज, भारत में सुर्खियां बटोर रहे हैं, उन्हें जानना जरूरी महसूस होता है।
शिक्षित परिवार में हुआ जन्म
उर्दू अदब के बड़े फ़नकार फैज़ अहमद फैज़ का जन्म 13 फरवरी 1911 को लाहौर के पास पंजाब के नरोवल जिला स्थित काला कादर (अब फैज नगर) के एक तताली जाट परिवार में हुआ था। उनका परिवार काफी शीक्षित लेकिन धार्मिक मामलों में काफी रूढ़ीवादी था। उनके घर पर लेखकों, कवियों का जमावड़ा लगा रहता था। उनके पिता सुल्तान मुहम्मद खान बैरिस्टर थे जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के लिए काम किया।
हमेशा वामपंथ से रहे प्रेरित
फैज ने बचपन में एक मस्जिद में अरबी, फारसी और उर्दू जुबानों में इस्लामी शिक्षा लेने के बाद लैंग्वेजेज एंड फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की, फिर अरबी भाषाओं में बीए ऑनर्स कर अंग्रेजी भाषा में एमए की डिग्री ली। कॉलेज के दिनों में ही वह एम एन रॉय और मुजफ्फर अहमद जैसे नेताओं से प्रभावित होकर कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली। आजादी के वक्त भारत का बंटवारा हुआ तो फैज पाकिस्तान के पक्के राष्ट्रवादी नागरिक के तौर पर लोगों से कहने लगे, ‘अपने-अपने दिलों को पाकिजा करो ताकि तुम अपने देश की रक्षा कर सको।’ उन्होंने बंटवारे के वर्ष 1947 में ही कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान की स्थापना की और वहां वामपंथ का एक मशहूर चेहरा बन गए। उन्होंने रूस से अपने संबंध बढ़ाए जहां से उन्हें उच्च श्रेणी का पुरस्कार भी मिला।
जेल में लेखनी से उगलते रहे आग
पाकिस्तान के बड़े अखबार पाकिस्तान टाइम्स के संपादक के तौर पर उन्होंने समाजवाद और वामपंथ का खूब प्रचार-प्रसार किया। 1951 में उन्हें तत्कालीन मेजर जनरल अकबर खान की तख्ता पलट की कोशिशों में शामिल रहने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। फैज़ कहां चुप बैठने वाले थे। उन्होंने जेल में भी अपनी इंकलाबी नज्मों और शायरी का सफर जारी रखा। प्रशासन को यह खटका तो जेल में रहने के दौरान लेखनी पर ही पाबंदी लगवा दी। 4 साल बाद जब फैज़ अहमद फैज़ जेल से छूटे तो उन्होंने अपनी उसी लेखनी को रफ्तार दी और उसमें पीड़ित वर्ग की आवाज को भी शामिल कर लिया। साल 1955 वह लंदन चले गए, लेकिन 1958 में फिर पाकिस्तान आ गए। हालांकि, उन्हें यहां दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर वामपंथी विचारों और रूसी सरकार के एजेंडे का प्रचार करने का आरोप लगा था लेकिन जुल्फिकार अली भुट्टो ने उनकी मदद की और वो 1960 में मॉस्को चले गए। वहां से वह फैज फिर से लंदन चले गए।
बांग्लादेशियों के नरसंहार का किया विरोध
1964 में वह पाकिस्तान वापस आए और कराची में बस गए। 1965 में जुल्फीकार अली भुट्टो जब अयूब खान सरकार में विदेश मंत्री बने तो उन्होंने फैज को सूचना प्रसारण मंत्रालय में बड़ी जिम्मेदारी दी। 1971 में जब पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हो गया तो फैज देशभक्ति गीतों के जरिए तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान में पाकिस्तानी नरसंहार का विरोध किया। 1972 में जुल्फीकार अली भुट्टो प्रधानमंत्री बने तो फैज को सरकार में शामिल कर लिया।
1979 में लिखा था- हम देखेंगे
1977 में आर्मी जनरल जिया उल हक ने भुट्टो सरकार का तख्तापलट किया तो फैज ने इसका मुखर विरोध किया। उन्होंने 1979 में जिया उल हक के सैनिक शासन के विरोध में यह नज्म लिखी थी। भुट्टो को फांसी दिए जाने की खबर से आहत होकर उन्होंने उसी वर्ष लेबनान में शरण ले ली लेकिन 1982 में लेबनान में युद्ध छिड़ने के कारण पाकिस्तान लौटे। 1984 में उनका लाहौर में निधन हो गया। निधन से ठीक पहले उन्हें बताया गया था कि उन्हें साहित्य के नोबेल प्राइज के लिए नॉमिनेट किया गया।
जब इकबाल बानो ने गाया ‘हम देखेंगे’
फैज अहमद फैज की जिस नज्म ‘हम देखेंगे’ पर विवाद हो रहा है, दरअसल उसे जिया की तानाशाही के खिलाफ लिखा गया था। हकीकत तो यह थी कि फैज की क्रांतिकारी नज्मों और कविताओं से जिया को डर लगने लगा था। उसने फैज की नज्मों पर पाबंदी लगा रखी थी, लेकिन पाकिस्तान की महान गायिका इकबाल बानो ने भी जिया की पाबंदियों की धज्जियां उड़ाने का फैसला कर लिया था। 13 फरवरी 1986 को लाहौर के अलहमरा आर्ट कौंसिल में एक प्रोग्राम का आयोजन किया गया। उस प्रोग्राम में इकबाल बानो ने ‘हम देखेंगे’ नज्म को गाया। किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि जिया की पाबंदी के बगैर बड़ी संख्या में लोग इकबाल बानो को सुनने उमड़ पड़ेंगे।
इकबाल बानो ने फैज की नज्म गाना शुरू किया…
हम देखेंगे…
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिस का वादा है
जो लौह-ए-अज़ल में लिख्खा है

जब जुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गिरां
रूई की तरह उड़ जाएंगे
हम महकूमों के पांव-तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी

और अहल-ए-हकम के सर-ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएंगे
हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख़्त गिराए जाएंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ाएब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा अनल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

जब इकबाल बानो ‘सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे’ वाली लाइन गाने लगीं तो तालियों और नारों की आवाज थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कार्यक्रम की अपार सफलता से घबराई सैन्य तानाशाह जिया की हुकूमत ने आयोजकों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। आयोजकों के घर पर छापे मारे गए और इकबाल बानो के नज्मों की रेकॉर्डिंग को जब्त करके तबाह कर दिया गया।
-एजेंसियां

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