पूर्व राष्‍ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती 15 अक्‍टूबर पर विशेष

15 अक्तूबर भारत के अब तक के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती है. उनका जन्म 15 अक्तूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम शहर में हुआ था. उनकी 88वीं जयंती पर पढ़िए विशेष लेख-
अपनी सरकार के गिरने से पहले बीजेपी के तानों से तंग आ कर कि वो एक ‘कमज़ोर’ प्रधानमंत्री है, इंदर कुमार गुजराल ने तय किया कि वो भारतवासियों और दुनिया वालों को बताएंगे कि वो भारतीय सुरक्षा को कितनी ज़्यादा तरजीह देते हैं.
उन्होंने ‘मिसाइल मैन’ के नाम से मशहूर एपीजे अब्दुल कलाम को भारत रत्न से सम्मानित करने का फ़ैसला लिया. इससे पहले 1952 में सी वी रमण के छोड़कर किसी वैज्ञानिक को इस पुरस्कार के लायक नहीं समझा गया था.
1 मार्च 1998 को राष्ट्पति भवन में भारत रत्न के पुरस्कार वितरण समारोह में कलाम नर्वस थे और अपनी नीली धारी की टाई को बार बार छू कर देख रहे थे.
कलाम को इस तरह के औपचारिक मौकों से चिढ़ थी जहाँ उन्हें उस तरह के कपड़े पहनने पड़ते थे जिसमें वो अपनेआप को कभी सहज नहीं पाते थे. सूट पहनना उन्हें कभी रास नहीं आया. यहाँ तक कि वो चमड़े के जूतों की जगह हमेशा स्पोर्ट्स शू पहनना ही पसंद करते थे.
भारत रत्न का सम्मान गृहण करने के बाद उन्हें सबसे पहले बधाई देने वालों में से एक थे अटलबिहारी वाजपेई.
वाजपेई की कलाम से पहली मुलाकात अगस्त 1980 में हुई थी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने उन्हें और प्रोफ़ेसर सतीश धवन को एसएलवी 3 के सफलतापूर्ण प्रक्षेपण के बाद प्रमुख साँसदों से मिलने के लिए बुलवाया था.
कलाम को जब इस आमंत्रण की भनक मिली तो वो घबरा गए और धवन से बोले, सर मेरे पास न तो सूट है और न ही जूते. मेरे पास ले दे के मेरी चेर्पू है (चप्पल के लिए तमिल शब्द ). तब सतीश धवन ने मुस्कराते हुए उनसे कहा था, ‘कलाम तुम पहले से ही सफलता का सूट पहने हुए हो इसलिए हर हालत में वहाँ पहुंचो.’
वाजपेई ने दिया था कलाम को मंत्री बनने का न्योता
मशहूर पत्रकार राज चेंगप्पा अपनी किताब ‘वेपेंस ऑफ़ पीस’ में लिखते हैं, ‘उस बैठक में जब इंदिरा गाँधी ने कलाम का अटल बिहारी वाजपेई से परिचय कराया तो उन्होंने कलाम से हाथ मिलाने की बजाए उन्हें गले लगा लिया. ये देखते ही इंदिरा गाँधी शरारती ढंग से मुस्कराई और उन्होंने वाजपेई की चुटकी लेते हुए कहा, ‘अटलजी लेकिन कलाम मुसलमान हैं.’ तब वाजपेई ने जवाब दिया, ‘जी हाँ लेकिन वो भारतीय पहले हैं और एक महान वैज्ञानिक हैं.’
18 दिन बाद जब वाजपेई दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने कलाम को अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का न्योता दिया. अगर कलाम इसके लिए राज़ी हो जाते तो वाजपेई को न सिर्फ़ एक काबिल मंत्री मिलता बल्कि पूरे भारत के मुसलमानों को ये संदेश जाता कि उनकी बीजेपी की सरकार में अनदेखी नहीं की जाएगी.
कलाम ने इस प्रस्ताव पर पूरे एक दिन विचार किया. अगले दिन उन्होंने वाजपेई से मिल कर बहुत विनम्रतापूर्वक इस पद को अस्वीकार कर दिया. उन्होंने कहा कि ‘रक्षा शोध और परमाणु परीक्षण कार्यक्रम अपने अंतिम चरण में पहुंच रहा है. वो अपनी वर्तमान ज़िम्मेदारियों को निभा कर देश की बेहतर सेवा कर सकते हैं.’
दो महीने बाद पोखरण में परमाणु विस्फोट के बाद ये स्पष्ट हो गया कि कलाम ने वो पद क्यों स्वीकार नहीं किया था.
वाजपेई ने ही कलाम को चुना राष्ट्रपति पद के लिए
10 जून 2002 को एपीजे अब्दुल कलाम को अन्ना विश्वविद्यलय के कुलपति डाक्टर कलानिधि का संदेश मिला कि प्रधानमंत्री कार्यालय उनसे संपर्क स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. इसलिए आप तुरंत कुलपति के दफ़्तर चले आइए ताकि प्रधानमंत्री से आपकी बात हो सके. जैसे ही उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय से कनेक्ट किया गया, वाजपेई फ़ोन पर आए और बोले, ‘कलाम साहब देश को राष्ट्पति के रूप में आप की ज़रूरत है.’ कलाम ने वाजपेई को धन्यवाद दिया और कहा कि इस पेशकश पर विचार करने के लिए मुझे एक घंटे का समय चाहिए. वाजपेई ने कहा, ‘आप समय ज़रूर ले लीजिए लेकिन मुझे आपसे हाँ चाहिए… ना नहीं.’
शाम तक एनडीए के संयोजक जॉर्ज फ़र्नान्डीज, संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन, आँध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन आयोजित कर कलाम की उम्मीदवारी का ऐलान कर दिया. जब डाक्टर कलाम दिल्ली पहुंचे तो हवाई अड्डे पर रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नान्डीज ने उनका स्वागत किया.
कलाम ने एशियाड विलेज में डीआरडीओ गेस्ट हाउज़ में रहना पसंद किया. 18 जून 2002 को कलाम ने अटलबिहारी वाजपेई और उनके मंत्रिमंडल सहयोगियों का उपस्थिति में अपना नामाँकन पत्र दाखिल किया. पर्चा भरते समय वाजपेई ने उनके साथ मज़ाक किया कि ‘आप भी मेरी तरह कुँवारे हैं’ तो कलाम ने ठहाकों के बीच जवाब दिया, ‘प्रधानमंत्री महोदय… मैं न सिर्फ़ कुंवारा हूँ बल्कि ब्रह्मचारी भी हूँ.’
कलाम के नाम से सूट बनने की कहानी
कलाम के राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे बड़ी समस्या ये आई कि वो पहनेगें क्या ? बरसों से नीली कमीज़ और स्पोर्ट्स शू पहन रहे कलाम राष्ट्रपति के रूप में तो वो सब पहन नहीं सकते थे. राष्ट्पति भवन का एक दर्ज़ी था जिसने पिछले कई राष्ट्रपतियों के सूट सिले थे. एक दिन आ कर उसने डाक्टर कलाम की भी नाप ले डाली.
कलाम के जीवनीकार और सहयोगी अरुण तिवारी अपनी किताब ‘एपीजे अब्दुल कलाम अ लाइफ़’ में लिखते हैं, ‘कुछ दिनों बाद दर्ज़ी कलाम के लिए चार नए बंदगले के सूट सिल कर ले आया. कुछ ही मिनटों में हमेशा लापरवाही से कपड़े पहनने वाले कलाम की काया ही बदल गई. लेकिन कलाम इससे खुद ख़ुश नहीं थे. उन्होंने मुझसे कहा, ‘मैं तो इसमें साँस ही नहीं ले सकता. क्या इसके कट में कोई परिवर्तन किया जा सकता है ?’
परेशान दर्ज़ी सोचते रहे कि क्या किया जाए. कलाम ने खुद ही सलाह दी कि इसे आप गर्दन के पास से थोड़ा काट दीजिए. इसके बाद से कलाम के इस कट के सूट को ‘कलाम सूट’ कहा जाने लगा.
नए राष्ट्रपति को टाई पहनने से भी नफ़रत थी. बंद गले के सूट की तरह टाई से भी उनका दम घुटता था. एक बार मैंने उन्हें अपनी टाई से अपना चश्मा साफ़ करते हुए देखा. मैंने उनसे कहा कि आपको ऐसा नहीं करना चाहिए. उनका जवाब था, टाई पूरी तरह से उद्देश्यहीन वस्त्र है. कम से कम मैं इसका कुछ तो इस्तेमाल कर रहा हूँ.’
नियम से सुबह की नमाज़ पढ़ते थे कलाम
बहुत व्यस्त राष्ट्रपति होने के बावजूद कलाम अपने लिए कुछ समय निकाल ही लेते थे. उनको रुद्र वीणा बजाने का बहुत शौक था.
डाक्टर कलाम के प्रेस सचिव रहे एस एम ख़ाँ ने मुझे बताया था, ‘वो वॉक करना भी पसंद करते थे, वो भी सुबह दस बजे या दोपहर चार बजे. वो अपना नाश्ता सुबह साढ़े दस बजे लेते थे. इसलिए उनके लंच में देरी हो जाती थी. उनका लंच दोपहर साढ़े चार बजे होता था और डिनर अक्सर रात 12 बजे के बाद. डाक्टर कलाम धार्मिक मुसलमान थे और हर दिन सुबह यानि फ़ज्र की नमाज़ पढ़ा करते थे. मैंने अक्सर उन्हें कुरान और गीता पढ़ते हुए भी देखा था. वो स्वामी थिरुवल्लुवर के उपदेशों की किताब ‘थिरुक्कुरल’ तमिल में पढ़ा करते थे. वो पक्के शाकाहारी थे और शराब से उनका दूर दूर का वास्ता नहीं था. पूरे देश में निर्देश भेज दिए गए थे कि वो जहाँ भी ठहरें, उन्हें सादा शाकाहारी खाना ही परोसा जाए. उनको महामहिम या ‘हिज़ एक्सलेंसी’ कहलाना भी कतई पसंद नहीं था.’
लेकिन कुछ हल्कों में ये शिकायत अक्सर सुनी गई कि केसरिया खेमे के प्रति उनका ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ था. उस खेमे से ये संदेश देने की भी कोशिश की गई कि भारत के हर मुसलमान को उनकी तरह ही होना चाहिए और जो इस मापदंड पर खरा नहीं उतरता उसके आचरण को सवालों के घेरे में लाया जा सकता है.
कलाम द्वारा बीजेपी की समान नागरिक संहिता की माँग का समर्थन करने पर भी कुछ भौंहें उठीं.
वामपंथियों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग को कलाम का सत्य साईं बाबा से मिलने पुट्टपार्थी जाना भी अखरा. उनकी शिकायत थी कि वैज्ञानिक सोच की वकालत करने वाला शख़्स ऐसा कर लोगों के सामने ग़लत उदाहरण पेश कर रहा है.
अपने परिवार को राष्ट्रपति भवन में ठहराने के लिए कलाम ने काटा साढ़े तीन लाख का चेक
डाक्टर कलाम को अपने बड़े भाई एपीजे मुत्थू मराइकयार से बहुत प्यार था लेकिन उन्होंने कभी उन्हें अपने साथ राष्ट्रपति भवन में रहने के लिए नहीं कहा.
उनके भाई का पोता ग़ुलाम मोइनुद्दीन उस समय दिल्ली में काम कर रहा था जब कलाम भारत के राष्ट्रपति थे लेकिन वो तब भी मुनिरका में किराए के एक कमरे में रहा करता था.
मई 2006 में कलाम ने अपने परिवार के करीब 52 लोगों को दिल्ली आमंत्रित किया. ये लोग आठ दिन तक राष्ट्रपति भवन में रुके.
कलाम के सचिव रहे पीएम नायर ने मुझे बताया था, ‘कलाम ने उनके राष्ट्रपति भवन में रुकने का किराया अपनी जेब से दिया. यहाँ तक कि एक प्याली चाय तक का भी हिसाब रखा गया. वो लोग एक बस में अजमेर शरीफ़ भी गए जिसका किराया कलाम ने भरा. उनके जाने के बाद कलाम ने अपने अकाउंट से तीन लाख बावन हज़ार रुपयों का चेक काट कर राष्ट्रपति भवन कार्यालय को भेजा.’
दिसंबर 2005 में उनके बड़े भाई एपीजे मुत्थू मराइकयार, उनकी बेटी नाज़िमा और उनका पोता ग़ुलाम हज करने मक्का गए. जब सऊदी अरब में भारत के राजदूत को इस बारे में पता चला तो उन्होंने राष्ट्रपति को फ़ोन कर परिवार को हर तरह की मदद देने की पेशकश की.
कलाम का जवाब था, ‘मेरा आपसे यही अनुरोध है कि मेरे 90 साल के भाई को बिना किसी सरकारी व्यवस्था के एक आम तीर्थयात्री की तरह हज करने दें.’
इफ़्तार का पैसा दिया अनाथालय को
नायर ने मुझे एक और दिलचस्प किस्सा सुनाया. ‘एक बार नवंबर 2002 में कलाम ने मुझे बुला कर पूछा, ‘ये बताइए कि हम इफ़्तार भोज का आयोजन क्यों करें?
वैसे भी यहाँ आमंत्रित लोग खाते पीते लोग होते हैं. आप इफ़्तार पर कितना खर्च करते हैं.’ राष्ट्रपति भवन के आतिथ्य विभाग को फ़ोन लगाया गया. उन्होंने बताया कि इफ़्तार भोज में मोटे तौर पर ढाई लाख रुपए का ख़र्च आता है. कलाम ने कहा, ‘हम ये पैसा अनाथालय को क्यों नहीं दे सकते?
आप अनाथालयों को चुनिए और ये सुनिश्चित करिए कि ये पैसा बरबाद न जाए.’
राष्ट्रपति भवन की ओर से इफ़्तार के लिए निर्धारित राशि से आटे, दाल, कंबलों और स्वेटरों का इंतेज़ाम किया गया और उसे 28 अनाथालयों के बच्चों में बाँटा गया. लेकिन बात यहीँ ख़त्म नहीं हो गई. कलाम ने मुझे फिर बुलाया और जब कमरे में वो और मैं अकेले थे, उन्होंने कहा, ‘ये सामान तो आपने सरकार के पैसे से ख़रिदवाया है. इसमें मेरा योगदान तो कुछ भी नहीं है. मैं आपको एक लाख रुपए का चेक दे रहा हूँ. उसका भी उसी तरह इस्तेमाल करिए जैसे आपने इफ़्तार के लिए निर्धारित पैसे का किया है. लेकिन किसी को ये मत बताइए कि ये पैसे मैंने दिए हैं.”
ग़ैर राजनीतिक राष्ट्रपति
कलाम शायद भारत के पहले ग़ैर राजनीतिक राष्ट्पति थे. उनके समकक्ष अगर किसी को रखा जा सकता है तो वो थे डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन. लेकिन राधाकृष्णन भी पूरी तरह से ग़ैर राजनीतिक नहीं थे और सोवियत संघ में भारत के राजदूत रह चुके थे.
कलाम की राजनीतिक अनुभवहीनता तब उजागर हुई जब उन्होंने 22 मई की आधी रात को बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने का अनुमोदन कर दिया, वो भी उस समय जब वो रूस की यात्रा पर थे.
बिहार विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी के बहुमत न मिलने पर राज्यपाल बूटा सिंह ने बिना सभी विकल्पों को तलाशे बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश कर दी.
केंद्रीय मंत्रिमंडल न एक बैठक के बाद उसे तुरंत राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए फ़ैक्स से मास्को भेज दिया. कलाम ने इस सिफ़ारिश पर रात डेढ़ बजे बिना किसी हील हुज्जत के दस्तख़त कर दिए लेकिन पाँच महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को ग़ैरसंवैधानिक करार दे दिया जिसकी वजह से यूपीए सरकार और खुद कलाम की बहुत किरकिरी हुई.
कलाम ने खुद अपनी किताब ‘अ जर्नी थ्रू द चैलेंजेज़’ में ज़िक्र किया कि वो सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से इतना आहत हुए थे कि उन्होंने इस मुद्दे पर इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया था लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें ये कह कर ऐसा न करने के लिए मनाया कि इससे देश में बवंडर हो जाएगा.
मोर का ट्यूमर निकलवाया
लेकिन इसके बावजूद डाक्टर कलाम का मानवीय पक्ष बहुत मज़बूत था. एक बार वो जाड़े के दौरान राष्ट्रपति भवन के गार्डेन में टहल रहे थे. उन्होंने देखा कि सुरक्षा गार्ड के केबिन में हीटिंग की कोई व्यवस्था नहीं है और कड़ाके की ठंड में सुरक्षा गार्ड की कंपकपी छूट रही है. उन्होंने तुरंत संबंधित अधिकारियों को बुलाया और उनसे गार्ड के केबिन में जाड़े के दौरान हीटर और गर्मी के दौरान पंखा लगवाने की व्यवस्था करवाई.
एसएम ख़ाँ ने एक किस्सा और सुनाया, ‘एक बार मुग़ल गार्डेन में टहलने के दौरान उन्होंने देखा कि एक मोर अपना मुंह नहीं खोल पा रहा है. उन्होंने तुरंत राष्ट्रपति भवन के वेटरनरी डाक्टर सुधीर कुमार को बुला कर मोर की स्वास्थ्य जाँच करने के लिए कहा. जाँच करने पर पता चला कि मोर के मुँह में ट्यूमर है जिसकी वजह से वो न तो अपना मुँह खोल पा रहा और न ही बंद कर पा रहा है. वो कुछ भी खा नहीं पा रहा था और बहुत तकलीफ़ में था. कलाम के कहने पर डाक्टर कुमार ने उस मोर की आपात सर्जरी की और उसका ट्यूमर निकाल दिया. उस मोर को कुछ दिनों तक आईसीयू में रखा गया और पूरी तरह ठीक हो जाने के बाद मुग़ल गार्डेन में छोड़ दिया गया.’
तंज़ानिया के बच्चों की मुफ़्त हार्ट सर्जरी
15 अक्तूबर, 2005 को अपने 74वे जन्मदिन के दिन कलाम हैदराबाद में थे.
उनके दिन की शुरुआत हुई हर्दय रोग से पीड़ित तन्ज़ानिया के कुछ बच्चों से मुलाकात के साथ जिनका हैदराबाद के केयर अस्पताल में ऑप्रेशन किया गया था. उन्होंने हर बच्चे के सिर पर हाथ फेरा और उन्हें टॉफ़ी का एक एक डिब्बा दिया, जिन्हें वो दिल्ली से लाए थे. बाहर बैठे आंध्र प्रदेश के राज्यपाल सुशील कुमार शिंदे, मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी और तेलगु देशम के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू इंतेज़ार कर रहे थे. उनकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि इन बच्चों को उनके ऊपर तरजीह क्यों दी जा रही है ?
अरुण तिवारी एपीजे कलाम की जीवनी में लिखते हैं, ‘हुआ ये कि सितंबर 2000 में तन्ज़ानिया की यात्रा के दौरान कलाम को पता चला कि वहाँ जन्मजात दिल की बीमारी से पीड़ित बच्चे बिना किसी इलाज के मर रहे हैं. वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि किसी भी तरह इन बच्चों और उनकी माओं को दारेस्सलाम से हैदराबाद लाने की मुफ़्त व्यवस्था करो. उन्होंने मुझसे, वी तुलसीदास से बात करने के लिए कहा जो उस समय एयर इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक थे. वो इस काम में मदद करने के लिए राज़ी हो गए. फिर केयर अस्पताल के प्रमुख डाक्टर सोमा राजू और वहाँ के प्रमुख हार्ट सर्जन डाक्टर गोपीचंद मन्नाम भी इनका मुफ़्त इलाज करने के लिए तैयार हो गए. भारत में तंज़ानिया की उच्चायुक्त इवा न्ज़ारो इन बच्चों की पहचान के लिए दारेस्सलाम गईं. 24 बच्चों और उनकी माओं को दारेस्सलाम से हैदराबाद लाया गया. केयर फ़ाउंडेशन ने पचास लोगों के ठहरने और खाने की मुफ़्त व्यवस्था की. ये सब लोग हैदराबाद में एक महीने रुक कर इलाज कराने के बाद सकुशल तंज़ानिया लौटे.’
कलाम की सैम मानेक शॉ से मुलाकात
जब कलाम का कार्यकाल ख़त्म होने लगा तो उन्होंने 1971 की लड़ाई के हीरो फ़ील्डमार्शल सैम मानेक शॉ से मिलने की इच्छा प्रकट की.
वो फ़रवरी 2007 में उनसे मिलने ऊटी भी गए. उनसे मिलने के बाद कलाम को अंदाज़ा हो गया कि मानेक शॉ को फ़ील्डमार्शल जैसी पदवी तो दे दी गई है लेकिन उसके साथ मिलने वाले भत्ते और सुविधाएं नहीं दी गई हैं.
दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने इस दिशा में कुछ करने का फ़ैसला किया. फ़ील्ड मार्शल मानेक शॉ के साथ-साथ मार्शल अर्जन सिंह को भी सारे बकाया भत्तों का भुगतान कराया गया उस दिन से जिस दिन से उन्हें ये पद दिया गया था.
-BBC

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