मुंशी प्रेमचंद के गांव का हर नागरिक देना चाहता है ‘मोदी’ को वोट

वाराणसी। पुलवामा हमले के कुछ दिनों बाद पूरा लमही गांव ही मोमबत्‍ती जुलूस में उमड़ पड़ा था। महिला, पुरुष, छोटे, बड़े, अगड़े, पिछड़े सभी ‘पाकिस्‍तान मुर्दाबाद’, ‘नरेंद्र मोदी जिंदाबाद’ और ‘वंदे मातरम’ के नारे लगा रहे थे। उन्‍होंने पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान का पुतला भी जलाया। पूर्वी यूपी का लमही गांव कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्‍मस्‍थान होने की वजह से मशहूर है।
पुलवामा हमले का सबसे ज्‍यादा असर उत्‍तर प्रदेश पर पड़ा। 23 फरवरी को हुए आतंकवादी हमले में शहीद हुए 40 जवानों में से 12 यूपी से ही थे। इनमें से एक थे अवधेश कुमार यादव जो चंदौली जिले के थे। लमही भी चंदौली जिले में आता है जबकि चार अन्‍य शहीद पास के  देवरिया, महाराजगंज, वाराणसी और प्रयागराज जिलों से थे।
प्रदर्शनों के जरिए जनता ने अपना गुस्‍सा बाहर निकाला। पूर्व प्रधान संतोष सिंह पटेल कहते हैं, ‘पहला प्रदर्शन दो घंटों से ज्‍यादा समय के लिए चला, इसमें 2000 से ज्‍यादा लोगों ने हिस्‍सा लिया। पड़ोसी गांवों के लोग भी इसमें शामिल हुए। हमने तीन और पाकिस्‍तान विरोधी जुलूस निकाले।’
पुलवामा हमले ने जनता का मूड बदला
इस तरह के विरोध प्रदर्शन, जिनमें सभी जाति के लोग शामिल थे, इस बात के प्रतीक हैं कि पुलवामा हमले ने जनता के मूड को किस तरह प्रभावित किया है। संतोष का कहना है, ‘उस दिन तक जिन लोगों ने बीजेपी को वोट किया था वे भी असमंजस में थे लेकिन उस दिन के बाद सब-कुछ बदल गया। लोग भले ही स्‍थानीय सासंद महेंद्र नाथ पांडेय से नाखुश हों लेकिन वे वापस बीजेपी के पाले में लौट गए हैं।’ संतोष की बीवी मीरा देवी मौजूदा प्रधान हैं। संतोष का मानना है कि बालाकोट एयरस्‍ट्राइक से ज्‍यादा लोगों पर पुलवामा हमले का असर हुआ है।
सुरेश चंद्र दुबे प्रेमचंद मेमोरियल और लाइब्रेरी की देखभाल करते हैं। वह पूरे मामले को दार्शनिक और कुछ आलोचनात्‍मक अंदाज में बयान करते हैं, ‘आज देश की राजनीति में लोगों को इस बात की ज्‍यादा चिंता है कि मेरी कुर्सी को कितना खतरा है, बजाय इसके कि मेरे देश को कितना खतरा है। लेकिन ऐसा अभी से नहीं दशकों से है। प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में भी यही दिखाया है।’ इस कहानी में प्रेमचंद ने शतरंज के दीवाने दो नवाबों की कहानी दिखाई है जो 1856 में अवध पर हुए ब्रिटिश कब्‍जे से बेपरवाह दिखाई देते हैं।
प्रेमचंद भी न पहचान पाते अपना गांव
लमही गांव में एक पंचायत भवन, एक पोस्‍ट ऑफिस, एक प्राइमरी स्‍कूल और एक प्राइमरी हेल्‍थ सेंटर है। इसके अलावा गांव में तीन जूलरी की दुकानें, इतने ही ब्‍यूटी पार्लर और ड्राई क्‍लीनर्स मिल जाएंगे।
हालात यह है कि प्रेमचंद आज अपना गांव देखते तो उन्‍हें अपना ही गांव पहचानने में दिक्‍कत होती। उनके नाम पर एक सड़क, एक गार्डन, एक तालाब और एक गेट है। इस गांव में प्रेमचंद पर एक शोध संस्‍थान भी है। लेकिन यहां न कोई स्‍टाफ है और न ही कोई शोधकर्ता। दुबे कहते हैं, ‘इस गांव को कई मायनों में प्रेमचंद के नाम से फायदा हुआ है लेकिन विडंबना यह है कि जो एकमात्र चीज उनके लेखन से जुड़ी है वहीं काम नहीं करती।’
लमही में 60 प्रतिशत पटेल हैं
लमही चंदौली विधानसभा सीट का हिस्‍सा है। इस गांव के 2,260 वोटरों में 60 प्रतिशत पटेल हैं। इनमें से अधिकतर ने बीजेपी के महेंद्र पांडे को वोट दिया था क्‍योंकि अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल एनडीए का हिस्‍सा हैं।
संतोष पटेल और सुरेश चंद्र दुबे के विपरीत लमही गांव के पड़ोसी ऐढ़े गांव के युवा दलितों के लिए पुलवामा के मायने कुछ और हैं। संदीप कुमार के पिता एक सिपाही है, वह कहते हैं, ‘हम लोग विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे क्‍योंकि हम चाहते थे कि इसके जिम्‍मेदार लोगों को सजा हो। हम अर्द्धसैनिक बलों के लिए बेहतर पेंशन भी चाहते हैं।
कुछ और दलितों ने भी रैली में हिस्‍सा लिया लेकिन वे कहते हैं कि बीएसपी-एसपी गठबंधन को ही वोट देंगे। राधिका देवी मायावती को वोट देने की बात कहती हैं। उनका कहना है, ‘मायावती ने लखनऊ में स्‍मारक बनाया है और हमारी शान बढ़ाई है। मैं हमेशा उन्‍हीं को वोट करूंगी।’
-एजेंसियां

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