कभी चंद्रगुप्त मौर्य भी यहां से हाथी घोड़ा ख़रीदा करते थे

कभी चंद्रगुप्त मौर्य भी यहां से हाथी घोड़ा ख़रीदा करते थे. बाद के दौर में मुगलों और अंग्रेज़ी शासन ने भी इसे बढ़ावा दिया और यहां एक इंग्लिश बाज़ार भी शुरू कराया, जिसमें यूरोप से आने वाले व्यापारी ठहरा करते थे. लेकिन अब ये रौनक ख़त्म सी हो गई है.
हम बात कर रहे हैं बिहार के विश्व प्रसिद्ध हरिहर क्षेत्र में सोनपुर मेला की. इस साल यह मेला 21 नवम्बर से शुरू होकर 32 दिनों तक चलेगा.
हर तरफ़ रंगीन एलईडी लाइटों से सजी दुकानों की क़तारें, बड़े-बड़े सरकारी और ग़ैर-सरकारी होर्डिंग्स लगे काउंटर, खाने-पीने, गाने बजाने और मनोरंजन के पुख्ता इंतज़ाम और लोगों की अच्छी खासी भीड़.
लेकिन पशुओं की ख़रीद बिक्री के लिए बनाए गए टेंटों में अब वो बात नजर नहीं आती. कभी देश और दुनिया के कोने-कोने से आए पशु इस मेले का मुख्य आकर्षण हुआ करते थे.
करीब बीस वर्षों से मेले में आ रहे गाय-भैंस व्यापारी रंजीत राय कहते हैं, “एक समय यहां पचास हज़ार तक मवेशी आया करते थे. देश के अधिकतर हिस्सों से सैंकड़ों पशु व्यापारी और खरीदार आया करते थे, लेकिन पिछले दो सालों में धंधा पूरी तरह चौपट हो गया.”
रंजीत आगे रहते हैं, “खास तौर से पिछले कुछ सालों में कड़े सरकारी नियम और नोटबंदी के कारण हालात बुरे हो गए हैं. असम और बंगाल से आने वाले मुस्लिम पशु खरीदारों ने तो आना ही बंद ही कर दिया है, साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों से आने वाले स्थानीय खरीदारों ने भी ट्रांस्पोर्टेशन के दौरान गोरक्षा दलों की चेकिंग और पशु छीन लिए जाने के डर से आना बंद कर दिया.”
एक अन्य पशु व्यापारी झीमी लाल कहते हैं, “पहले हमें सरकार से भी काफ़ी सहूलियतें मिलती थीं जैसे-खाना बनाने के लिए केरोसिन, लकड़ी वगैरह. मेले के दौरान भी मुख्यमंत्री एवं अन्य मंत्री निरीक्षण करने आ जाया करते थे लेकिन अब हालात बदल गए हैं.”
सारण के ज़िला अधिकारी हरिहर प्रसाद का कहना है कि ‘व्यापार में आई इस गिरावट की वजह तकनीक का विकास और लोगों के जीवन शैली में आया बदलाव है. साथ ही वाइल्ड लाइफ़ से संबंधित क़ानूनी बाध्यताओं की वजह से भी अन्य राज्यों से पशु मेले में नहीं आ पा रहे हैं.’
उनके अनुसार, “ट्रैक्टर आ जाने की वजह से बैलों की उपयोगिता समाप्त हो गई है. हालांकि सरकार इस मेले को पूरा सहयोग दे रही है, उप-मुख्यमंत्री भी मेले की देख रेख करने आते हैं.”
सोनपुर के पशु चिकित्सा प्रभारी डा. दीपक कुमार कहते हैं, “पिछले साल की तुलना में इस वर्ष हालात बेहतर हो सकते हैं, वर्ष 2016 में नोटबंदी की वजह से पशु मेला काफ़ी प्रभावित हुआ था.”
2016 के विभागीय आंकड़े बताते हैं कि उस दौरान केवल 45 गायों और 10 भैंसों की बिक्री हुई थी. हालांकि उससे पीछे के आंकड़ों में भी कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखता.
पेशे से वकील स्थानीय निवासी रवि भूषण का कहना है, “परंपरा रही है कि मेले का उद्घाटन राज्य के मुख्यमंत्री किया करते थे और इसका समापन राज्यपाल के हाथों होता था लेकिन नीतीश कुमार के आने के बाद यह परंपरा क़रीब-क़रीब ख़त्म हो गई.”
पशु मेले में पशु नदारद
स्थानीय पत्रकार शंकर सिंह कहते हैं, “अब स्थापित परम्पराएं भी टूट रही हैं जैसे पशु दौड़, पुलिस महानिदेशक द्वारा बहादुरी पुरस्कार वितरण समारोह वगैरह. अब तो मेले में पशु कम और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्टाल ज़्यादा हैं. जहां से एसयूवी, कार और बाइक ख़रीदे जा सकते हैं.”
शंकर सिंह आगे कहते हैं, “पहले मेले में वैसी चीज़ें मिलती थीं जो आम दिनों के दौरान बाज़ारों में उपलब्ध नहीं होती थीं लेकिन अब मेले का स्वरूप ही बदल गया है. मेले में कार और बाइक बेचे जाते हैं, जिन्हें आम दिनों में कहीं से भी ख़रीदा जा सकता है.”
पर्यटक सूचना केंद्र में अधिकारी एसके वर्मा का कहना है, “मेले में अब पहले वाली बात नहीं रही, हाथी, घोड़ा, गाय, बैल और भैंस जो कभी इस मेले का मुख्य आकर्षण हुआ करते थे अब नहीं के बराबर नज़र आते हैं, इस साल से पक्षियों के ख़रीद बिक्री पर भी रोक लगा दी गई है.”
-BBC

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