न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से जुड़ी बीमारी है मिर्गी

मिर्गी न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर यानी तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारी है जिसमें रोगी को बार-बार दौरे पड़ते है। इस बीमारी का समय पर इलाज न होने से समस्या गंभीर हो जाती है। यह बीमारी 10 वर्ष से 60 वर्ष तक के किसी भी व्यक्ति को हो सकती है। हालांकि जानकारी के अभाव में 75 से 80 फीसदी लोग इलाज से वंचित रह जाते हैं। दूषित जल और खान-पान के साथ ही आधुनिक जीवनशैली, काम का दबाव और तनाव से भी मिर्गी का खतरा बढ़ रहा है। दुनियाभर में 5 करोड़ और भारत में 1 करोड़ लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं।
वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रोहित गुप्ता ने बताया कि 2-3 साल तक दवा खाने से मिर्गी ठीक हो जाती है। सिर्फ 20-30 फीसदी लोगों को ही पूरी जिंदगी दवा खानी पड़ती है। करीब 10-20 फीसदी लोगों को ही ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है।
केजीएमयू के बाल रोग विभाग के डॉ. सिद्धार्थ कुंवर ने बताया कि छह माह से पांच वर्ष की उम्र के बच्चों में बुखार के साथ दौरे पड़ सकते हैं। यदि दौरे में अकड़न पूरे शरीर में होती है और यह 15 मिनट से कम है तो इसे सिम्पल फेब्राइल सीजर कहा जाता है। यदि यह शरीर के एक ही भाग में होती है और आधे घंटे से ज्यादा रहती है तो इसको कॉम्प्लेक्स फेब्राइल सीजर कहा जाता है। चार फीसदी बच्चों में यह बीमारी उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी हो सकती है। इसके इलाज में मिर्गी की दवाओं का लंबे समय तक प्रयोग नहीं किया जाता है। सिर्फ शरीर की स्पंजिंग और बुखार कम करने के लिए दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है।
हो सकती है मानसिक समस्या
मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. आदर्श त्रिपाठी ने बताया कि तीन में से एक मिर्गी के मरीज में इससे मानसिक समस्या भी पैदा हो सकती है। इसमें मानसिक अवसाद और घबराहट आम बात है। मरीज के सामाजिक जीवन पर इसका बुरा असर पड़ता है। मानसिक अवसाद 30 से 35 फीसदी मरीजों में पाया जाता है।
खुद से न लें दवा
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. समीर गुप्ता ने कहा कि मिर्गी को मिथ से नहीं इलाज से ठीक किया जा सकता है। मरीज को डॉक्टर की बताई दवाएं ही देनी चाहिए। खुद दवा शुरू कर देने से उसके साइड इफेक्ट हो सकते हैं और मरीज की जान पर बन सकती है। सर्वोदय हॉस्पिटल की न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. रितु झा ने कहा कि मिर्गी मस्तिष्क से संबंधित विकार है। इससे डरने या इसे अभिशाप समझने की आवश्यकता नहीं है। इसका पूरा इलाज संभव है।
यह है कारण
मिर्गी मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले कई कारणों से होती है। ये कभी-कभी अनुवांशिक या अधिगृहित या दोनों हो सकते हैं। 60-75 प्रतिशत मिर्गी मामलों में कारण अज्ञात होता है। शेष 25-40 प्रतिशत लोगों में जन्म के समय चोट या ऑक्सिजन की कमी, गर्भावस्था में मस्तिष्क को क्षति, मस्तिष्क आघात, ब्रेन टयूमर अथवा संक्रमण (मैनिंजाइटिस, एड्स आदि) से यह हो सकती है।
दौरा पड़ने पर इन बातों का रखें ध्यान
– दौरा पड़ने पर रोगी को चप्पल जूता न सुंघाएं
– दौरा पड़ने पर पानी न पिलाएं
– बेल्ट, टाई आदि दौरे के वक्त ढीला कर दें
– दवा आदि भी न दें
– रोगी को करवट के बल लिटा दें
– साफ-सफाई रखें
– मरीज को खुली हवा में रखें और भीड़ न लगाएं
– सिर के नीचे मुलायम कपड़ा रखें
-एजेंसी