English हिन्दी की बड़ी बहन है !!!

English हिन्दी की बड़ी बहन है। ये बात आपको मेरी व्यथा-कथा सुनने के बाद महसूस होगी। पहले कहते थे कि राजा केवल अपने देश में पूजा जाता है, लेकिन विद्वान सर्वत्र पूजा जाता है। मगर अब विद्वान नहीं अंग्रेजीदां सर्वत्र पूजा जाता है। आज भले ही हिन्दी का रोना रोया जा रहा है, लेकिन आंतरिक स्थिति यह है कि रोने वाले भी माडर्न सोसायटी का ही हिस्सा बने हुए हैं। कल्चर, सोसायटी सबकुछ इनका माडर्न है।

हम खुद हिन्दी वाले होने के बावजूद अंग्रेजी का मुजरा करने पर मजबूर हैं क्योंकि देवभाषा संस्कृत से निकली हिन्दी को हिन्दी राष्ट्र में ही फटेहाल आम भारतीय जैसा दर्जा प्राप्त है जो किसी नेता के आने पर ताली बजाकर (50-100 रुपए लेकर) खुश हो लेता है। हिन्दी को भी सालभर में दो-चार बार मंचों से समाज के हाईप्रोफाइल लोग खुश कर देते हैं। भाषणबाजी और नारेबाजी से तो ऐसा जोश भर जाता है कि बस अभी पलभर में हिन्दी केवल राष्ट्र की ही नहीं विश्व की भाषा बन जाएगी। लेकिन सारे के सारे ख्वाब बेनूर हो जाते हैं, जब मम्मी बेबी से बोलती है-ओ माई गॉड पोट्टी कर दिया बेबी। हिन्दी से कोई जाति दुश्मनी नहीं है। गुड, बेटर, बेस्ट के आगे की अंग्रेजी भी हम नहीं जानते। स्लेट पर सबसे पहले ग गणेश का लिखना सीखा और आज तक हिन्दी में ही लिखते-पढ़ते आ रहे हैं, फिर भी अब अंग्रेजी की स्तुति करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि बरसों तक हिन्दी-हिन्दी करते रहे , मगर…अगर उस दौर में ही समय की नब्ज पहचान कर अंग्रेजी-अंग्रेजी करना शुरू कर देते तो आज हम मतदान करने वाले आम भारतीय ना होकर हाईसोसायटी का एकाध हिस्सा होते।
अंग्रेज गए और अंग्रेजी के बीज बो गए। इन बीजों ने भी फलने-फूलने में कोई कसर नहीं छोड़ी स्थिति यह कि आज मंगू मजदूर का बेटा भी कान्वेंट में पढ़ रहा है।

आज अगर आप धोती-कुरताधारी हैं तो आप गंवार श्रेणी के हैं, मगर अप-टू-डेट हैं तो हर कोई कोर्निश करने की या आपसे हैंडसेक की जुगत में लगेगा। अगर आपने हिन्दी में निवेदन किया है तो चप्पलें घिसते रहो, और एप्लीकेशन दी है तो चार घंटे में ही आपका काम हो जाएगा। अगर आप किसी हिन्दी अखबार के पत्र सम्पादक में मोहल्ले की गंदगी या अन्य समस्या का पूरा बखान भी लिखेंगे तो लिखते रहो। लेकिन अंग्रेजी अखबार में आपकी चार लाइन भी छप गई तो पार्षद क्या टप्पा से लेकर संभाग स्तर तक प्रशासनिक वाकी-टाकी, मोबाइल, फोन घनघनाने लगेंगे। पंचायत से लेकर नगर निगम, कलेक्ट्रेट वगैरह-वगैरह सब तुम्हारे मोहल्ले में हाजिर हो जाएंगे। अंग्रेजी अखबार में छपने का यही मजा और असर है। वैसे भी हिन्दी के अखबार की रद्दी से ज्यादा भाव अंग्रेजी अखबार की रद्दी के मिलते हैं। अंग्रेजी के मामले में आप भले ही जीरो हो, लेकिन आपके घर में अंग्रेजी अखबार का आना आपकी मोहल्ले में शान बढ़ाता है। पत्नी अड़ोस-पड़ोस में अंग्रेजी अखबार का बखान करती है। उसकी बातों में हिन्गलिस की बरसात होती है।

साउथ इंडिया के लोगों को सर्विस में पहले प्राथमिकता इसीलिए मिलती है कि उन्हें अंग्रेजी में विद्वता हासिल होती है। प्राइवेट कंपनियों आदि के मालिक भी अगर गधा अंग्रेजी में टाकिंग करता है तो उसे हाईपोस्ट पर रख लेते हैं।

कलेक्ट्रेट, पंचायत, नगर पालिका…किसी निकाय में आपको काम है और आपने हिन्दी में वार्तालाप शुरू किया तो चपरासी भी आपको अपने से निचले दर्जे का समझेगा। वहीं आपने फर्राटेदार तोता ब्रांड टांय-टांय अंग्रेजी झाड़ना शुरू की तो बेचारा सहमकर फटाफट साहब के पास आपको ले जाएगा। आपको भी अपनी जिंदगी में हिन्दी के कड़वे अनुभव हुए होंगे। बस इसीलिए झकमार कर मान लीजिए की अंग्रेजी हिन्दी की बड़ी बहन है। क्योंकि जब तक भारत में लोकतंत्र है, हिन्दी बेचारी अबला नारी सी सिर झुकाए कोने में रहेगी और अंग्रेजी बड़ी बहन बनकर टाप जिन्स में लोगों के दिमाग पर डांस करेगी।

अनिल शर्मा

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