Sanskriti यूनिवर्सिटी और पुनर्वास केन्द्र बना रहे निःशक्तों को सशक्त

मथुरा। प्रकृति के सामने कहीं न कहीं हम सभी निःशक्त हैं। आज के समय में निःशक्त बच्चों को निःशक्त मानने की बजाय उन्हें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया जाना जरूरी है। निःशक्त बच्चों को उनके जीवन यापन एवं समाज के योग्य बनाना सिर्फ सरकार का ही काम नहीं है बल्कि इस दिशा में समाज के समन्वित प्रयास की भी जरूरत है। यह कहना है Sanskriti यूनिवर्सिटी के उप-कुलाधिपति राजेश
गुप्ता का।

श्री गुप्ता का कहना है कि बच्चे किसी भी देश और समाज की पहचान होते हैं। इनकी मजबूती से ही राष्ट्र की मजबूती जुड़ी हुई है। हम कहते जरूर हैं कि बच्चे देश का भविष्य हैं लेकिन उनके भविष्य को लेकर उतना संजीदा नहीं हैं जितना हमें होना चाहिए। निःशक्तों की बात की जाए तो हमारे देश की स्थिति काफी चिन्ताजनक है। हम देश को विश्व की महाशक्ति बनाने की बात तो करते हैं लेकिन निःशक्तों को लेकर समाज का नजरिया सोचनीय है। यह ठीक वैसा ही है जैसे हम युद्ध जीतने की बात करें और हथियारों की ओर से आंखें मूंदे बैठे रहें।

विकलांग एवं पुनर्वास केन्द्र दिल्ली के अध्यक्ष मुकेश गुप्ता का कहना है कि हमारा देश आर्थिक समृद्धि की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है लेकिन निःशक्त बच्चों के हालात संतोषजनक नहीं कहे जा सकते। निःशक्तों की भलाई के लिए ठोस योजना बनाने के साथ उस पर कड़ाई से अमल भी जरूरी है। श्री गुप्ता का कहना है कि जब देश में बाल मृत्यु दर कम करने, बाल सुधार और कुपोषण से मुक्ति के उपायों जैसे तमाम प्रयास किये जा रहे हों, ऐसे में सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित निःशक्त बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी ठोस उपाय करने की जरूरत है।

निःशक्तों को लेकर हमारे समाज का नजरिया कुछ भी हो, sanskriti यूनिवर्सिटी और विकलांग एवं पुनर्वास केन्द्र दिल्ली के संयुक्त प्रयासों से फिलहाल सौ से अधिक निःशक्त बच्चों को मुफ्त तालीम दी जा रही है। संस्कृति यूनिवर्सिटी का उद्देश्य दिव्यांगों को न केवल समाज की मुख्यधारा में एक नई पहचान देना है बल्कि उन्हें स्वावलम्बी बनाना भी है। संस्कृति विश्वविद्यालय के शांतिपूर्ण वातावरण में अलसुबह निःशक्त बच्चों की न केवल किलकारियां गूंजती हैं बल्कि उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के भी प्रयास किए जा रहे हैं। संस्था द्वारा निःशक्त छात्र-छात्राओं को शिक्षा-दीक्षा में पारंगत करने के लिए न केवल सुरम्य वातावरण मुहैया कराया गया है बल्कि प्राचार्य संतोष मौर्य की देखरेख में राहुल कुमार, जाकिर हुसैन, बृजेश शर्मा, अपूर्वा देसाई, प्रवीण जयसिंह, आशीष उपाध्याय, अदिति और चंचल कोशिश इन बच्चों के कौशल विकास पर सतत नजर रख रहे हैं। संस्था द्वारा बच्चों को लाने ले जाने की व्यवस्था तो निःशुल्क है ही उन्हें ड्रेस तथा कापी-किताबें भी मुफ्त में उपलब्ध कराई जाती हैं। यहां बच्चे साक्षरता का पाठ पढ़ने के साथ ही मोमबत्ती, अगरबत्ती, मोती की माला, दीपक निर्माण आदि कार्य भी करते रहते हैं।

शिक्षिका अपूर्वा देसाई बताती हैं कि यहां छात्र-छात्राओं को खेल, डांस, सांकेतिक भाषा, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी आदि में भी दक्ष किया जाता है। फिलवक्त यहां अलीगढ़, पलवल, हाथरस, मथुरा आदि के 100 से अधिक निःशक्त बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं। यहां जनपद मथुरा के नरी, सेमरी, छाता, बरौली, करौली, अकबरपुर, कोसीकलां, पैगामपुर, भदावल, लाडपुर, चैनपुरा, नगला देवी, नगला बिरजा, पिलौरा, बिलौठी, खायरा, रनवारी, दुताना, अजीजपुर आदि गांवों के निःशक्त बच्चे भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यहां छात्र-छात्राओं को प्ले ग्रुप से वोकेशनल स्तर तक तालीम प्रदान की जाती है। यहां बी.एड. और डी.एड. स्पेशल की कक्षाएं भी संचालित हैं, जिनमें मथुरा जनपद ही नहीं देश के दूसरे राज्यों के छात्र-छात्राएं भी लाभान्वित हो रहे हैं।

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