भ्रष्‍टों द्वारा भ्रष्‍टाचारियों के लिए ”भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था” का चुनाव…निकाय चुनाव

भ्रष्‍टों द्वारा भ्रष्‍टाचारियों के लिए ”भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था” का चुनाव है निकाय चुनाव। हो सकता है कि आपको निकाय चुनावों की यह परिभाषा नागवार गुजरे किंतु सच्‍चाई यही है।
गौर कीजिए: नगर निकाय के लिए निर्वाचित किसी भी पदाधिकारी को न कोई वेतन मिलता है और न भत्ता।
नगर पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम के लिए निर्वाचित किसी मेंबर, चेयरमैन अथवा मेयर को किसी प्रकार के वेतन-भत्ते नहीं दिए जाते और न ही पदमुक्‍त होने के बाद कोई पेंशन आदि दिए जाने का प्रावधान है।
कुछ मामलों में भत्ता दिए जाने की व्‍यवस्‍था है भी तो वह इतनी आंशिक है कि उसे स्‍वीकार करना निर्वाचित पदाधिकारी अपनी तौहीन समझते हैं लिहाजा कोई पदाधिकारी उसे लेता ही नहीं है।
दूसरी ओर निर्वाचन आयोग ने इन चुनावों में नगर निकाय प्रत्‍याशियों की चुनाव खर्च सीमा बढ़ाकर दोगुनी कर दी है।
80 वार्ड से अधिक वाले नगर निगमों में मेयर के प्रत्‍याशी इस बार चुनाव प्रचार पर 25 लाख रुपए तक खर्च कर सकेंगे जबकि पहले यह सीमा 12 लाख 50 हजार थी। 80 से कम वार्ड वाले मेयर पद के प्रत्‍याशी भी 20 लाख रुपए खर्च कर सकते हैं।
इसी प्रकार नगर निगमों के पार्षद प्रत्‍याशी 2 लाख रुपए तक अपने चुनाव प्रचार पर खर्च कर पाएंगे। पहले यह सीमा 1 लाख रुपए थी।
41 से 55 वार्ड तक की नगर पालिकाओं के अध्‍यक्ष पद हेतु चुनाव लड़ने वाले प्रत्‍याशियों को 8 लाख रुपए खर्च करने का अधिकार होगा। यह सीमा अब तक 4 लाख रुपए थी।
25 से 40 वार्ड तक की नगर पालिका के प्रत्‍याशियों के लिए यह सीमा 6 लाख रुपए तय की गई है। 2006 के नगर निकाय चुनावों तक यह 3 लाख रुपए थी। इस स्‍तर तक की नगर पालिकाओं के सदस्‍य प्रत्‍याशी 1 लाख पचास हजार रुपए खर्च कर सकेंगे। पहले यह सीमा मात्र 40 हजार रुपए थी।
नगर पंचायत के अध्‍यक्ष पद हेतु चुनाव लड़ने वाले प्रत्‍याशी भी डेढ़ लाख रुपए खर्च कर सकेंगे। पहले यह सीमा 1 लाख रुपए थी। नगर पंचायत के सदस्‍य प्रत्‍याशी 30 हजार रुपए खर्च करने के अधिकारी होंगे। पहले इन्‍हें 20 हजार रुपए तक खर्च करने का अधिकार था।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि लाखों रुपए खर्च करके कोई व्‍यक्‍ति आखिर क्‍यों मेयर, चेयरमैन अथवा मेंबर बनना चाहता है। और यदि वह जीत भी जाता है तो अपने चुनाव पर हुए इस खर्च की भरपाई कहां से करेगा। वह क्षेत्र का विकास करेगा या अपने चुनाव पर हुए खर्च की भरपाई भ्रष्‍ट तरीकों से करने पर ध्‍यान केंद्रित करेगा ?
इस सवाल से पहले भी एक और सवाल यह खड़ा होता है कि नोटबंदी के बाद उत्पन्‍न हुई स्‍थितियों के तहत क्‍या इन प्रत्‍याशियों से नॉमीनेशन फाइल करते वक्‍त यह पूछा जाएगा कि वह चुनाव के लिए लाखों रुपए खर्च कहां से कर रहे हैं, क्‍या वो नियमित आयकर रिटर्न दाखिल करते रहे हैं, क्‍या उनकी निजी आमदनी इतनी है, और यदि है तो क्‍या वह उस पर टैक्‍स अदा करते रहे हैं ?
क्‍या वह अपनी आमदनी से बिना किसी लाभ की उम्‍मीद के चुनाव पर होने वाला खर्च वहन कर सकते हैं ?
चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार पर खर्च की राशि तो बढ़ाकर दोगुना कर दी किंतु क्‍या नॉमीनेशन प्रपत्र में भी ऐसे कोई बदलाव किए गए हैं कि प्रत्‍याशियों से उनकी चल-अचल संपत्ति के साथ-साथ यह भी जानकारी ली जा सके कि उनकी आमदनी के स्‍त्रोत क्‍या हैं और क्‍या उन स्‍त्रोतों से उसके परिवार का भरण-पोषण समाज सेवा करते हुए होता रहेगा?
यदि ऐसी कोई व्‍यवस्‍था नहीं की गई है तो स्‍पष्‍ट है कि नगर निकाय चुनावों में निर्वाचित होने वाला हर पदाधिकारी सिर्फ और सिर्फ भ्रष्‍टाचार ही करेगा और विकास के नाम पर आने वाली धनराशि का बंदरबांट करके जनता की आंखों में धूल झोंकता रहेगा।
चूंकि सब जानते और समझते हुए भी हम इस व्‍यवस्‍था के लिए मतदान करेंगे इसलिए भ्रष्‍टाचार के सूत्रधार हम ही होंगे और फिर हमें यह कहने का कोई अधिकार नहीं रह जाता कि हमारा निर्वाचित प्रतिनिधि क्षेत्र का विकास न करके अपना विकास करने में लगा है।
बेशक निर्वाचन की यह व्‍यवस्‍था बहुत पहले से चली आ रही है और हम इस व्‍यवस्‍था के तहत ही मतदान करते रहे हैं किंतु इसका मतलब यह नहीं कि हमेशा ही ऐसी व्‍यवस्‍था के हिस्‍से बने रहें।
हम नोटबंदी पर सवाल खड़े कर सकते हैं, हम जीएसटी पर जागरूकता दिखा सकते हैं, हम आलू-टमाटर-प्‍याज के भावों को लेकर सड़क पर उतर सकते हैं किंतु यह नहीं पूछते कि जिस पद के लिए न कोई वेतन-भत्ता है और न पेंशन, उस पद को पाने के लिए क्‍यों कोई लाखों रुपए खर्च कर कर रहा है।
यमुना एक्‍शन प्‍लान के तहत सैकड़ों करोड़ रुपया यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने पर डकार लिया गया किंतु यमुना दिन-प्रतिदिन मैली होती गई। सन् 1998 से लेकर अब तक यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए आई रकम ने अनेक नगर पिताओं की संपत्ति में अप्रत्‍याशित वृद्धि दर्ज करा दी लेकिन यमुना गंदा नाला बनकर रह गई।
यमुना किनारे बसे हुए शहरों की नगर पालिकाओं के पदाधिकारी, अधिकारी और कर्मचारी देखते-देखते क्‍या से क्‍या हो गए लेकिन किसी ने उनसे कभी यह नहीं पूछा कि चुनाव लड़ने से पहले और चुनाव जीतने के बाद आए इस बड़े बदलाव का स्‍त्रोत क्‍या है ?
सांसद और विधायक आदि के लिए आज एकबार को यह कहा जा सकता है कि उन्‍हें एक ओर जहां अच्‍छा-खासा वेतन-भत्ता मिलता है वहीं दूसरी ओर पेंशन का भी प्रावधान है जिससे उनकी स्‍थाई व्‍यवस्‍था हो जाती है। इसके अलावा उन्‍हें विकास के लिए सांसद और विधायक निधि भी मिलती है जिसमें से अधिकांश जन प्रतिनिधि अपना भी जुगाड़ करते रहे हैं परंतु नगर निकाय पदाधिकारियों को ऐसी कोई निधि नहीं मिलती जिससे वह अपना जुगाड़ कर लें।
फिर ऐसा क्‍या है कि बिना लाभ के पद वाले इन चुनावों को लड़ने के लिए हर पार्टी के पास सैकड़ों की संख्‍या में आवेदन आ रहे हैं और अपनी हैसियत से अधिक खर्च करके भी लोग चुनाव लड़ने को तैयार हैं।
संभवत: यह कोई यक्ष प्रश्‍न नहीं है। हर कोई जानता है कि लाभ का पद न होते हुए भी हर व्‍यक्‍ति इस पर काबिज होकर उस अप्रत्‍यक्ष लाभ का भागीदार बनना चाहता है जिसकी कोई लिमिट नहीं है और परिस्‍थितियों के हिसाब से वह करोड़ों तो क्‍या अरबों तक की रकम में हिस्‍सेदार बनवा सकता है।
आश्‍चर्यजनक है कि जिस मेयर अथवा पालिकाध्‍यक्ष को अपनी गाड़ी के डीजल तक का खर्च नगर आयुक्‍त अथवा अधिशाषी अधिकारी की कलम से मिलता हो, जिसके पास अपने लिए बहुत सीमित अधिकार हों, जिसे कांटोंभरा ताज माना जाता हो, उस पद पर चुनाव लड़ने के लिए इतने लोग लाइन लगाकर खड़े किसलिए रहते हैं?
सिफारिशें कराते हैं, धौंस जमाते हैं, दावेदारी करते हैं, पैसा बहाते हैं और जरूरत पड़ने पर पार्टी से बगावत की धमकी भी देते हैं, आखिर क्‍यों ?
इसीलिए न कि इस सबके बावजूद कहीं न कहीं नगर निकायों में आमदनी के वो स्‍त्रोत अब भी बने हुए हैं जिनसे चुनाव पर होने वाले सारे प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष खर्चों की भरपाई चक्रवर्ती ब्‍याज के साथ की जा सकती है और चुनाव के लिए किया जाने वाला निवेश कभी घाटे का सौदा साबित नहीं होता।
यही कारण है कि नगर निकाय चुनावों को भ्रष्‍टों द्वारा भ्रष्‍टाचारियों के लिए ”भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था” का चुनाव कहा जाता है क्‍योंकि आज के दौर में ऐसा कोई समाज सेवी देखने को नहीं मिलता जो घर फूंककर तमाशा देखने का माद्दा रखता हो।
कड़वा सच तो यही है कि वह लाखों या हजारों रुपए खर्च करके करोड़ों तथा लाखों रुपए कमाने निकला है, और इसलिए उससे शहर के विकास अथवा जनसेवा की अपेक्षा करना खुद को धोखे में रखने के अलावा कुछ नहीं है।
फिलहाल यह मानकर संतुष्‍ट हुआ जा सकता है कि हमारे पास कोई विकल्‍प नहीं है किंतु इस तरह तो विकल्‍प कभी मिलेंगे भी नहीं। विकल्‍प तभी मिलेंगे जब हम पूर्व घोषित इस भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था का पूरी तरह बहिष्‍कार करें और शासकों को बाध्‍य करें कि वह विकल्‍प सामने लाएं।
जो व्‍यवस्‍था ही भ्रष्‍टाचार की जननी है, उस व्‍यवस्‍था से भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त करने या विकास की उम्‍मीद पालने का क्‍या मतलब।
निश्‍चित ही हम एक उस दिन के लिए बेताज बादशाह होंगे जिस दिन हमें मतदान करना होगा, किंतु उसके बाद क्‍या ?
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी