Eid का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम, रस्म-ए-दुनिया भी है…

ईद के त्यौहार पर लोग गले मिलते हैं, अपने सारे शिकवे मिटाते हैं और ख़ुशियां बांटते हैं। इस मौके पर अगर महबूबा का दीदार भी हो जाए तो इस दिन की चांदनी दुगुनी हो जाती है, ईद से जुड़े तमाम एहसासों को शायरों ने ऐसे ही कलमबन्द किया है। पेश हैं ईद के त्यौहार पर कुछ चुनिंदा अशआर

माह-ए-नौ देखने तुम छत पे न जाना हरगिज़
शहर में ईद की तारीख़ बदल जाएगी
– जलील निज़ामी

आज यारों को मुबारक हो कि सुब्ह-ए-ईद है
राग है मय है चमन है दिलरुबा है दीद है
– आबरू शाह मुबारक

ऐ हवा तू ही उसे ईद-मुबारक कहियो
और कहियो कि कोई याद किया करता है
– त्रिपुरारि

देखा हिलाल-ए-ईद तो आया तेरा ख़याल
वो आसमाँ का चाँद है तू मेरा चाँद है
– अज्ञात

है ईद मय-कदे को चलो देखता है कौन
शहद ओ शकर पे टूट पड़े रोज़ा-दार आज
– सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

ईद आई तुम न आए क्या मज़ा है ईद का
ईद ही तो नाम है इक दूसरे की दीद का
– अज्ञात

ईद का चाँद जो देखा तो तमन्ना लिपटी
उन से तक़रीब-ए-मुलाक़ात का रिश्ता निकला
– रहमत क़रनी

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम
रस्म-ए-दुनिया भी है मौक़ा भी है दस्तूर भी है
– क़मर बदायुनी

ईद के बाद वो मिलने के लिए आए हैं
ईद का चाँद नज़र आने लगा ईद के बाद
– अज्ञात

कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती
हम को अगर मयस्सर जानाँ की दीद होती
– ग़ुलाम भीक नैरंग

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