एक लर्निंग डिसऑर्डर है डिस्‍लेक्सिया, कैसे होती है इसकी पहचान?

डिस्‍लेक्सिया एक लर्निंग डिसऑर्डर है। इससे ग्रस्‍त बच्‍चे सामान्‍य बच्‍चों से पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं लेकिन सही पहचान और मैनेजमेंट से ये बच्‍चे कामयाबी की ऊंचाइयां छू सकते हैं।
बच्‍चों की परवरिश करके उन्‍हें एक बेहतर नागरिक बनाना एक बड़ी जिम्‍मेदारी है। यह जिम्‍मेदारी तब और चुनौतीपूर्ण हो जाती है जब बच्‍चों को कुछ अनोखी समस्‍याओं से जूझना हो। डिस्‍लेक्सिया एक ऐसी ही चुनौती है। यह एक किस्‍म की लर्निंग डिसऑर्डर है और इससे ग्रस्‍त बच्‍चे को दूसरे बच्‍चों की तरह भाषा या चिन्‍हों को पढ़ने, समझने और याद करने में दिक्‍कत होती है और वे परीक्षाओं में बाकी बच्‍चों से पिछड़ जाते हैं। ऐसे बच्‍चों का जीवन एक व्‍यस्‍क के रूप में और कठिन हो जाता है। इसके बावजूद कड़ी मेहनत लगन, सही समय पर जागरुकता और समाज के सहयोग से ऐसे बच्‍चे तमाम ऊंचाइयों को छू रहे हैं। बॉलिवुड स्‍टार अभिषेक बच्‍चन को भी 9 बरस की उम्र में पता चला कि उन्‍हें डिस्‍लेक्सिया है।
डिस्‍लेक्सिया है क्‍या, इसकी पहचान कैसे होती है और इसका इलाज या मैनेजमेंट कैसे किया जाए हमने इस पर बात की स्‍पेशल बच्‍चों के लखनऊ स्थित स्‍कूल आशा ज्‍योति की प्रिंसपल स्‍वाति शर्मा से। स्‍वाति स्‍पेशल एजुकेशन में बीएड हैं, ऑटिज्‍म स्‍पेक्‍ट्रम डिस्‍ऑर्डर में डिप्‍लोमा है और लर्निंग डिसऑर्डर की मास्‍टर ट्रेनर हैं।
डिस्‍लेक्सिया क्‍या है
डिस्‍लेक्सिया एक किस्‍म का लर्निंग डिसऑर्डर है। आंकड़े बताते हैं कि लगभग 10 प्रतिशत बच्‍चों में लर्निंग डिसऑर्डर यानि सीखने में समस्‍या होती है। अगर किसी क्‍लास में 30 बच्‍चे हैं तो मुमकिन है कि तीन बच्‍चों में यह समस्‍या हो। इसे हिंदी में अधिगम अक्षमता भी कहते हैं।
लर्निंग डिसऑर्डर मुख्‍यत: तीन तरह का होता है। डिस्‍लेक्सिया, डिस्‍ग्राफिया और डिस्‍कैलकुलिया। डिस्‍लेक्सिया में बच्‍चे को शब्‍दों को पढ़ने में दिक्‍कत होती है। डिस्‍ग्राफिया में बच्‍चा ठीक से लिख नहीं पाता और डिस्‍कैलकुलिया में उसे गणित में दिक्‍कत आती है।
डिस्‍लेक्सिया के कारण
डिस्‍लेक्सिया एक तंत्रिका तंत्र से जुड़ी आनुवंशिक बीमारी या न्‍यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इसलिए इसके लक्षण शरीर में नहीं दिखाई देते। बच्‍चों में भी इसके लक्षण तब समझ में आते हैं जब वे स्‍कूल जाना शुरू करते हैं क्‍योंकि जब वे भाषा या नई चीजें सीखने की कोशिश करते हैं तब दिक्‍कत आती है।
पर इसके अलावा इन बच्‍चों का आईक्‍यू या बौद्धिक क्षमता औसत या औसत से ज्‍यादा भी हो सकती है। मतलब यह मानसिक रोग नहीं है। ऐसे बच्‍चे तमाम मॉर्डर्न गैजट का बड़ी कुशलता से इस्‍तेमाल कर सकते हैं। पेंटिंग, म्‍यूजिक वगैरह में महारत हासिल कर सकते हैं।
इसकी पहचान
जब ऐसे बच्‍चे स्‍कूल में पढ़ना शुरू करते हैं तो बाकी बच्‍चों की तुलना में उनका प्रदर्शन काफी कम रहता है। वे नए शब्‍द नहीं सीख पाते। इसकी पहचान का सबसे अच्‍छा तरीका है एग्‍जाम में मिलने वाले कम नंबर। अगर बच्‍चे की नजर ठीक है, वह चीजों को समझ रहा है, पढ़ने की कोशिश कर रहा है फिर भी नंबर कम आ रहे हैं तो लर्निंग डिसऑर्डर की जांच करनी चाहिए। इसकी सबसे पहले पहचान स्‍कूल में पढ़ाने वाली टीचर करती है। इसलिए उनका जागरुक होना जरूरी है।
बच्‍चों पर असर
जानकारी के अभाव में टीचर व बच्‍चे के पैरंट्स को लगता है कि बच्‍चा आलस या शरारत की वजह से जानबूझकर गल‍तियां कर रहा है। ऐसे में बच्‍चे पर पड़ने वाला दबाव उसके आत्‍मविश्‍वास को कम कर देता है। ऐसे हालात में बच्‍चा वे काम भी नहीं कर पाता जो उसे ज्‍यादा बेहतर तरह से आते हैं।
क्‍या है इलाज
इसका इलाज नहीं किया जा सकता लेकिन सफलतापूर्वक मैनेजमेंट जरूर किया जा सकता है। अगर सही समय पर पता इसका पता चल जाए तो बच्‍चे को वे काम करने के लिए प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए जिनमें वह निपुण है, जैसे पेंटिंग, म्‍यूजिक, गेम्‍स वगैरह। ऐसे बच्‍चे सामान्‍य जीवन बिताते हैं ऐसे बहुत से बच्‍चे हैं जो डिस्‍लेक्सिया होने के बाद भी अच्‍छे जॉब कर रहे हैं।
बेहतर कदम
शिक्षा प्रणाली में इससे जुड़े बदलाव जरूरी हैं जैसे महाराष्‍ट्र और आंध्र प्रदेश बोर्ड ने दसवीं तक गणित, विज्ञान जैसे तार्किक विषय जो जरूरी थे उन्‍हें ऑप्‍शनल कर दिया है। बच्‍चा इनकी जगह अपनी रुचि के विषय ले सकता है।
जिन बच्‍चों को लिखने में दिक्‍कत है उनके लिए ऐसे स्‍पेशल की बोर्ड आ गए हैं जो उन्‍हें लिखने में मदद करते हैं। सीबीएसई बोर्ड में ऐसे बच्‍चों की देखभाल के लिए शैडो टीचर्स का प्रावधान है क्‍योंकि सामान्‍य टीचर बाकी बच्‍चों के साथ इन पर पूरा ध्‍यान नहीं दे पाते।
भारत सरकार ने दिव्‍यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 में भी लर्निंग डिसएबिलिटी को शामिल किया गया है। इससे इन बच्‍चों को वे सहूलियतें मिलने लगी हैं जो दिव्‍यांगों को मिलती थीं।
-एजेंसियां

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