बंगाली समाज की सांस्कृतिक विरासत है Durga puja

Durga puja का विवरण लगभग 16वीं ईसवी के दौरान बंगाल में मिलता है

Durga puja महोत्सव हिन्दू देवी माता दुर्गा की पूजा पर आधारित होता है जिन्हें उनके चार बच्चों कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ 10 भुजाओं वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। माँ भगवती दुर्गा को 10 भुजाओं के साथ सिंह पर सवार होकर महिसासुर का वध करते हुए दर्शाया जाता है और इसी रूप की पूजा पूरे भारत वर्ष के अलावा विदेशों तक में की जाती है। दुर्गा पूजा परिजनों से मिलने का और बंगाली समाज के लोगों की सांस्कृतिक विरासत को सराहने और उसे समझने का भी समय होता है।
दुर्गा पूजा का उत्सव अश्विन मास में मनाया जाता है। बांगला पंचांग के अनुसार यह सितंबर या अक्टूबर महीने में पड़ता है। दुर्गा पूजा के लिए चुनी गयी तिथियां उस समय पर आधारित होती हैं जब रामजी ने माता दुर्गा का आह्वान किया था, और इसके बाद श्रीराम ने युद्ध में रावण और उसके दुष्ट राक्षसों का अंत किया था।

इतिहास में पहली बार Durga puja का विवरण लगभग 16वीं ईसवी के दौरान बंगाल में मिलता है। इसके बाद से यह शारदीय नवरात्र में वार्षिक उत्सव के रूप में सारे विश्व में दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। 1911 में जब दिल्ली को ब्रिटिश शासन ने भारत की नयी राजधानी बनाया था तब हजारों बंगाली अधिकारी काम करने के लिए दिल्ली चले आये थे और इस प्रकार यह उत्सव कलकत्ता से दिल्ली में भी मनाया जाने लगा। इसी प्रकार, यह उत्सव मुम्बई और देश के अन्य शहरों में भी आरम्भ हो गया। जहाँ बंगालियों ने प्रस्थान किया वहां-वहां दुर्गा पूजा की स्थापना होती चली गई। आज विश्व के अन्य देशों में रहने वाले बंगालियों ने भी इस उत्सव को वहां भी मनाना शुरू कर दिया। जैसे अमेरिका, यूरोप, जापान, चीन, कनाडा, हांगकांग आदि देशों में बडे़ धूमधाम से दुर्गा पुजा का उत्सव मनाया जाता है। जहां-जहां बंगाली समाज के लोग एकत्रित होते गये दुर्गा पूजा के पंड़ाल सजते चले गये और दुर्गा की प्रतिमाओं की श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा होती चली आ रही है।

आज भी सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण Durga puja पश्चिम बंगाल में कलकत्ता की नगरपालिका में आयोजित की जाती है।
दुर्गा पूजा के उत्सव में भक्त 10 दिनों का उपवास, भोग प्रसाद का आनन्द लेते हैं और माता दुर्गा की विधि विधान से पूजा में शामिल होते है। हालाँकि उत्सव के अंतिम पांच दिन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जिन्हें मुख्य रूप से मनाया जाता है। जिसमें ‘षष्ठी‘ के दिन से दशमी तक को माना जाता है। कहा जाता है कि माता दुर्गा अपने चार बच्चों के साथ धरती पर आती हैं। यह केवल तभी होता है जब उनके आगमन को पुजारियों के द्वारा जाग्रत किया जाता है। नवरात्र की शुरूआत के दिन ही माता की प्रतिमाओं में आँखें बनाई जाती है। षष्ठी के दिन घट स्थापित किया जाता है और दुर्गा पूजा महोत्सव की शुरूआत हो जाती है ‘सप्तमी’ के दिन, माना जाता है कि जटिल अनुष्ठानों के साथ माता को आमंत्रित करने पर माता प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा के उपरान्त प्रवेश करती हैं। वारी-वारी से माँ दुर्गा और उनके साथ आये बच्चे कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमाओं में प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान किया जाता है। गणेश जी के साथ उनकी पत्नी केला को भी स्थापित करने की परम्परा निभाई जाती है। सप्तमी की पूजा के साथ-साथ चण्डी पाठ का भी पाठ निरन्तर किया जाता है। माँ भगवती के सभी रूपों का वर्णन किया जाता है।

अष्टमी और नवमी के मध्य का काल के (समय) को अतिमहत्वपूर्ण माना जाता है इसी समय में माता भगवती ने दोनों राक्षसों का वध कर इस संसार को दुष्टों के आतंक से मुक्त किया था
‘अष्टमी‘ के दिन, माना जाता है माता दुर्गा ने महिषासुर के दो राक्षसों (चंड और मुंड) का वध इस दिन किया था। माना जाता है जब अष्टमी और नवमी के मध्य का काल के (समय) को अतिमहत्वपूर्ण माना जाता है इसी समय में माता भगवती ने दोनों राक्षसों का वध कर इस संसार को दुष्टों के आतंक से मुक्त किया था। इस समय लगभग 52 मिनट में विशेष पूजा अर्चना और आरती का आयोजन किया जाता है भक्त नर-नारी उपवास रख कर इस पूजा को अवश्य देखते हैं और माँ दुर्गा का आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए पूरे वर्ष भर प्रतीक्षा करते हैं।
‘नवमी‘ के दिन महाआरती का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि इस दिन माता दुर्गा ने युद्ध में महिषासुर का वध किया था। लोग अपने नये-नये वस्त्र धारण करके पूजा पंडालों में आते हैं और तीनों दिन प्रसाद ग्रहण करते हैं। दुर्गा माँ को प्रत्येक दिन नियम से भोग प्रसाद चढ़ाया जाता है। माता और बहनें अष्टमी और नवमी के दिन अपनी श्रद्धानुसार फल, फूल, मिठाई, वस्त्र इत्यादि से अपने अपने गौत्र का उच्चारण करके अपने परिवार व अपने लिये विशेष पूजा करके माँ का आर्शीवाद प्राप्त करते हैं। अंत में हवन यज्ञ भी किया जाता है। देश, दुनिया और समाज तथा हर प्राणि के कल्याण के लिए माँ भगवती के समक्ष आहुति दी जाती हैं। तथा प्रार्थना की जाती है कि हे माँ इस जगत में सबका भला करना सबका कल्याण करना और सबको धन-धान्य से पूर्ण कर देना।
इस उत्सव के अंतिम दिन ‘दशमी‘ को दुर्गा माता की प्रतिमाओं की शोभायात्रा निकाली जाती है। चारों तरफ नाच-गाना होता है। प्रतिमाओं को विसर्जित करने के लिए नदियों या अन्य जलीय स्थानों पर ले जाया जाता है और जलाशयों में प्रतिमाओं का विर्सजन किया जाता है। इसके बाद भक्तगण दोस्तों और परिजनों से मिलने जाते हैं, बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं, मिठाइयों और स्वादिष्ट पकवानों का आनंद उठाते हैं, और पारंपरिक परिधान धारण करते हैं।
भारत के प्रत्येक प्रान्त में तथा जनपदों में दुर्गा पूजा से जुड़े समारोहों और गतिविधियों का आयोजन किया जाता है जिसमें अक्सर देशी विदेशी पर्यटक भी हिस्सा लेते हैं,
यह उत्सव कोलकाता, पश्चिम बंगाल का मुख्य उत्सव है। पश्चिम बंगाल में इस उत्सव के कारण कई दिनों की छुटिटयां घोषित हैं जिसके कारण पूरा पश्चिम बंगाल इस उत्सव में तन, मन, धन से जुट जाता है और हर कोई भरपूर आनन्द उठाता है। यहाँ आपको पूजा पंडालों में नृत्य, नाटक आदि के प्रदर्शन देखने को मिलेंगे, आजकल पूजा पंडालों में मुम्बई, दिल्ली के सिनेमा के कलाकारों को या अन्तराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकारों को बुलाकर भव्य आयोजनों के माध्यम से सांस्कृतिक छटा विखेरी जाती है। बंगाली व्यंजन और सड़कों पर जगह-जगह स्टॉल मिलेंगे जहाँ आप बंगाल की सांस्कृतिक चीजें खरीद सकते हैं। या व्यंजनों आनन्द ले सकते हैं। यहाँ माता दुर्गा के हजारों विशाल ‘पंडाल’ जगह-जगह देखने को मिलते हैं। आज दुर्गा पूजा पंडालों में और दुर्गा प्रतिमाओं तथा उनको वर्तमान परिस्थितियों व राजनैतिक परिदुश्यों के साथ- साथ आधुनिकता का समावेश देखने को मिलता है। निकट स्थित उत्तरी कोलकाता के कुमारटुली में, जहाँ दुर्गा माँ की ज्यादातर प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। उनमें से कई का निर्माण मिट्टी से किया जाता है, और दुर्गा पूजा के दौरान यहीं पर माता दुर्गा की प्रतिमाओं पर आँखों को अन्तिम समय में तैयार किया जाता है जो आकर्षण का केन्द्र होता है।

मथुरा में सर्वप्रथम दुर्गा पूजा का आयोजन वृन्दावन के राधावाग स्थित कात्यायनी मंदिर से शुरू होने का प्रमाण मिलता है

मथुरा में सर्वप्रथम केशवानन्द जी महाराज ने सर्वप्रथम मिटटी की मूर्ति बनवा कर इस स्थान पर दुर्गा देवी की पूजा की थी। यह स्थान सिद्ध स्थान कहलाता है तथा पुराणों में वर्णित स्थान है यहां सती भगवती देवी के केश गिरे थे। ऐसा कहा जाता है कि राधारानी और ब्रजांगनाओं ने स्वयं माँ दुर्गा की पूजा की थी। इस स्थान को पुनर्रूद्धार केशवानन्द जी महाराज ने किया था। जब कलकत्ता से अष्टधातु की मूर्ति बन कर वृन्दावन आ गयी और 1 फरवरी 1923 को विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा बंगाल के तथा भारत अन्य जगहों के विद्वान ब्राम्हणों पंडितों के द्वारा कराया गया। इसके वाद कात्यायनी मंदिर से माँ भगवती का आर्शीवाद लेकर वृन्दावन के धनी मानी लोगों ने फौजदार कुंज में मिटटी की प्रतिमा बनाकर पूजा शुरू की गयी। लगभग 1925 के आसपास वृन्दावन में दुर्गा पूजा की शुरूआत की गयी। आज वृन्दावन में छोटे बड़े मिलाकर 18 दुर्गा पूजा पंडाल सजाये जाते हैं।
मथुरा में भी दुर्गा पूजा लगभग 1930 के आसपास शुरू हो गयी थी इसके प्रमाण मिलते है की उस समय मथुरा के तत्कालीन तीन बंगाली प्रसिद्ध डाक्टरों डा0 नगेन्द्र नाथ चौधरी, डा0 हीरालाल गांगुली, और डा0 प्रमथ नाथ गोस्वामी ने दुर्गा पूजा का आयोजन लाल दरवाजा से किया था। आज मथुरा में दो स्थानों पर दुर्गा पूजा का आयोजन निरन्तर किया जा रहा है। एक लाल दरवाजा और दूसरी रेलवे ग्राउन्ड में दुर्गा पूजा विशाल रूप ले चुकीं हैं। अमर नाथ स्कूल के अलावा रिफाइनरी टाउनशिप में भी दुर्गापूजा के आयोजन होते हैं।
दिल्ली के चित्तरंजन पार्क में भी दिल्ली शहर का सबसे पुराना दुर्गा पूजा उत्सव आयोजित किया जाता है, जिसे अक्सर “छोटे कोलकाता” के रूप में जाना जाता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे पूरा बंगाल दिल्ली में आ गया हो।
मुम्बई में, सन् 1950 से बंगाल क्लब शिवाजी पार्क में दुर्गा पूजा आयोजित कर रहा है। इसके अलावा, लोखंडवाला गार्डन में एक अन्य दुर्गा पूजा आयोजित की जाती है जिसमें आमतौर पर बड़ी हस्तियां शामिल होती हैं। इनके अलावा भी सैकड़ों दुर्गा पूजा पंड़ाल बनते हैं।
Durga puja के त्योहार के दौरान बंगाली सभ्यता और संस्कृति के बारे में काफी नजदीक से देखा व कुछ-कुछ सीखा भी जा सकता है। यह उत्सव मन में उमंग, रंगारंग और लोगों में उत्साह और श्रृद्धा भक्ति से भरा होता है।

  •  सुनील शर्मा
    डीग हाउस, लाल दरवाजा, मथुरा

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