क्‍या उत्तर कोरिया का पर्दाफ़ाश करती है ख़ुफ़िया कैमरे से बनी ये फ़िल्म?

एक नई डॉक्यूमेंट्री में दावा किया गया है कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने के लिए उत्तर कोरिया क्या-क्या तरीक़ीबें अपना रहा है.
इसमें उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग-उन के प्रशासन के अधिकारियों के साथ फर्ज़ी रक्षा समझौते किए जाने की बात दिखाई गई है.
डॉक्यूमेंट्री के किरदार भी कम अजीब नहीं हैं. एक किरदार डेनमार्क का एक बेरोज़गार शेफ़ है जो कम्युनिस्ट तानाशाही की ओर आकर्षित है.
दूसरा किरदार स्पेन का एक रईस व्यक्ति है, और तीसरा किरदार है उत्तर कोरिया का एक प्रचारक जिसे सेना की वर्दी पहनने का शौक़ है.
इसके अलावा डॉक्यूमेंट्री में एक किरदार फ्रांस का एक पूर्व सैनिक है जो कोकीन की तस्करी का दोषी पाया जा चुका है. इसे फ़िल्म में एक रहस्यपूर्ण व्यक्ति के तौर पर दिखाया गया है.
लेकिन क्या ये सब सच हो सकता है?
संयुक्त राष्ट्र के एक पूर्व अधिकारी का कहना है कि वो इस फ़िल्म को विश्वसनीय मानते हैं.
‘द मोल’ नाम की ये फ़िल्म डेनमार्क मूल के फ़िल्म निर्माता मेड्स ब्रगर ने बनाई है. उनका दावा है कि उन्होंने उत्तर कोरिया के अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों के उल्लंघन का पर्दाफ़ाश करने के लिए तीन साल लंबा और बेहद जटिल स्टिंग ऑपरेशन किया.
बेरोज़गार शेफ़ अलरिच लार्सन निर्माता मेड्स ब्रगर की मदद से स्पेन से चलने वाले उत्तर कोरिया के समर्थक समूह कोरियन फ्रेंडशिप एसोसिएशन यानी केएफ़ए से जुड़ जाते हैं. लार्सन ने इस समूह में अपना क़द बढ़ाया और आख़िरकार उत्तर कोरिया के अधिकारियों का भरोसा हासिल कर लिया.
केएफ़ए की सदस्यता लार्सन को इस समूह के संस्थापक और अध्यक्ष रईस एलेखांद्रो चाओ डे बेनोस के क़रीब ले आई. वो स्पेन के एक रईस हैं और दुनियाभर में उन्हें ‘उत्तर कोरिया का चौकीदार’ माना जाता है.
इस फ़िल्म के कई दृश्यों में बेनोस उत्तर कोरिया की सेना की वर्दी पहने भी दिखे हैं. डॉक्यूमेंट्री में वो कई बार उत्तर कोरियाई प्रशासन में अपनी पकड़ और पहुंच के बारे में भी डींगें हाँकते दिखते हैं.
इस फ़िल्म के एक किरदार पूर्व फ्रांसीसी सैनिक और कोकीन की तस्करी के दोषी पाए जा चुके लातार्शे क्वॉरट्रप हैं जिन्होंने एक अंतर्राष्ट्रीय आर्म्स डीलर का किरदार निभाया है.
दस साल में बनी है ये फ़िल्म?
मेड्स ब्रगर का दावा है कि उन्होंने इस फ़िल्म पर दस साल ख़र्च किए हैं.
अब बीबीसी और स्कैंडिनेवियाई देशों के कई प्रसारक भी साझा तौर पर इस फ़िल्म के सह-निर्माता बन गए हैं.
ब्रगर स्वंय इस फ़िल्म में स्वीकार करते हैं, “ये फ़िल्म मज़ाकिया है, भोंडी है और कई जगह विश्वसनीय नहीं है. मैं ऐसा फ़िल्मकार हूँ जो सनसनी पैदा करता है.”
लेकिन 2014-2019 के बीच उत्तर कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के पैनल में शामिल रहे ह्यू ग्रिफ़िथ्स इस फ़िल्म को ‘काफ़ी विश्वसनीय’ मानते हैं.
ग्रिफ़िथ्स कहते हैं, “ये चेयरमैन किम जोंग-उन पर अब तक का सबसे भद्दा मज़ाक है. ये फ़िल्म भले ही शौकिया तौर पर बनाई गई लगे लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि इसमें विदेशी मुद्रा हासिल करने की नीयत नहीं दिखाई गई है.”
वो कहते हैं, फ़िल्म में कई ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें हम पहले से ही जानते हैं.
हथियार बेचते, प्रतिबंधों का उल्लंघन करते देखना अभूतपूर्व
उत्तर कोरिया अपनी परमाणु महत्वाकांक्षाओं की वजह से साल 2006 के बाद से अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहा है.
साल 2010 के बाद से विशेषज्ञों के पैनल ने उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों के विकास पर नज़र रखी है और इससे जुड़े दस्तावेज़ तैयार किए हैं.
लेकिन इस फ़िल्म में उत्तर कोरिया के अधिकारियों को हथियार बेचते हुए और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का उल्लंघन करने की कोशिश करते हुए देखना अभूतपूर्व है.
फ़िल्म के एक अहम दृश्य में पूर्व शेफ़ उलरिच लार्सन मिस्टर जेम्स बने जिन लतार्शे को उत्तर कोरिया की एक आर्म्स फैक्ट्री के प्रतिनिधियों के साथ कोरियाई सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी में समझौता करते हुए दिखते हैं. ये मुलाक़ात प्योंगयोंग के एक भड़कीले रेस्त्रां के बेसमेंट में हुई थी.
फ़िल्म में दिखाए गए सभी कोरियाई लोगों की पहचान पुख्ता नहीं की गई है. लातार्शे कहते हैं कि एक बार जब कोरियाई अधिकारियों ने उनसे सवाल-जवाब किया तो उन्हें एक हथियार कंपनी का नाम ईजाद करना पड़ा.
ये अपने आप में दिलचस्प है कि फ़िल्म बनाने वाली टीम ने इस बारे में पहले से विचार नहीं किया था.
जिस दस्तावेज़ पर दस्तख़त किया गया उस पर किम रियोंग चोल के हस्ताक्षर हैं. वो नारेए ट्रेडिंग ऑर्गेनाइज़ेशन के अध्यक्ष हैं. कोरियाई प्रायद्वीप को स्थानीय भाषा में नारेए ही कहा जाता है.
अंडरग्राउंड फ़ैक्ट्री में हथियार बनाने की योजना
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों के पैनल की 28 अगस्त को प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरिया नारेए ट्रेडिंग कार्पोरेशन नाम की एक कंपनी प्रतिबंधों का उल्लंघन करके डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ कोरिया यानी डीपीआरके के लिए राजस्व जुटाने के काम में लगी है.
ग्रिफ़िथ्स कहते हैं कि ये भी हैरतअंगेज़ ही है कि कोरियाई अधिकारी एक ऐसे व्यक्ति के साथ सौदा करने के लिए तैयार थे जिसके बारे में वो पहले से बहुत कुछ नहीं जानते हैं.
वो कहते हैं, “इसका स्पष्ट मतलब ये है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध काम कर रहे हैं और उत्तर कोरियाई अपने हथियार बेचने के लिए बेचैन हैं.”
2017 में कंपाला में हुई एक बैठक में मिस्टर डैनी (जिन्हें उत्तर कोरियाई आर्म्स डीलर बताया गया है) लातार्शे से कहते हैं कि क्या वो उत्तर कोरिया के हथियारों को सीरिया पहुंचा पाएंगे? ग्रिफ़िथ्स कहते हैं कि ये सवाल दर्शाता है कि उत्तर कोरिया अपने दम पर ये काम नहीं कर पा रहा है.
मिस्टर जेम्स युगांडा में उन्हीं उत्तर कोरियाई अधिकारियों के साथ दिख रहे हैं जिनके साथ वो प्योंगयांग में हैं. यहां वो लेक विक्टोरिया में एक द्वीप के सौदे पर चर्चा करने आए हैं.
युगांडा के अधिकारियों को बताया जाता है कि ये एक लग्ज़री रिज़ॉर्ट बनाने के लिए है जबकि मिस्टर जेम्स और उत्तर कोरियाई अधिकारी यहां एक अंडरग्राउंड फ़ैक्ट्री बनाकर हथियार बनाने की योजना बना रहे हैं.
युगांडा में उत्तर कोरियाई आर्म्स डीलर खुले घूम सकते थे?
ये बात हैरतअंगेज़ लग सकती है लेकिन उत्तर कोरिया ऐसा पहले भी कर चुका है. उत्तर कोरिया ने नामीबिया की एक बंद पड़ी तांबे की खदान में हथियारों की फ़ैक्ट्री बना दी थी. यहां वो मूर्तियां और स्मारक बनाने के बहाने आया था.
संयुक्त राष्ट्र के पैनल ने साल 2015 से 2018 के बीच नामीबिया में कोरिया माइनिंग डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (कोमिड) के कामों की जांच की थी. नामीबिया पर संयुक्त राष्ट्र के दबाव में ही इस बात का जवाब है कि इस बार कोरियाई अधिकारियों ने युगांडा को क्यों चुना.
ग्रिफ़िथ्स बताते हैं कि नामीबिया में कोरिया के प्रोजेक्ट बंद हो गए थे. वो कहते हैं, 2018 में युगांडा ही एक ऐसा देश था जहां उत्तर कोरिया के आर्म्स डीलर खुले घूम सकते थे.
इस फ़िल्म में उत्तर कोरियाई दूतावासों के अधिकारियों को संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों का उल्लंघन करते हुए भी दिखाया गया है.
युगांडा की योजना से जुड़ा लिफाफा
स्टॉकहोम में उत्तर कोरिया के दूतावास में फ़िल्माए गए एक सीन में उलरिच लार्सन मिस्टर री नाम के एक राजनयिक से युगांडा की योजना के बारे में एक लिफ़ाफ़ा प्राप्त करते हुए दिखाए गए हैं.
इस डॉक्यूमेंट्री के अधिकतर हिस्सों की तरह ही ये सीन भी ख़ुफ़िया कैमरे पर ही फ़िल्माया गया है.
मिस्टर री कहते हैं, “अगर कुछ ग़लत होता है तो इसमें दूतावास की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी.”
ग्रिफ़िथ्स कहते हैं कि ये दृश्य भी कोरिया के काम करने के तरीके पर ही रोशनी डालता है.
वो कहते हैं, “प्रतिबंधों के उल्लंघन के जिन मामलों की संयुक्त राष्ट्र ने जांच की थी उनमें से अधिकतर में उत्तर कोरियाई दूतावास के कर्मचारियों या पासपोर्टधारकों का ही हाथ पाया गया था.”
सौदे अंजाम तक नहीं पहुंचते
फ़िल्म में जो सौदे होते हुए दिखाए गए हैं वो अपने अंजाम तक नहीं पहुंचते हैं.
अंत में पार्टनर पैसा मांगने लगते हैं और ब्रगर मिस्टर जेम्स को ग़ायब कर देते हैं.
फ़िल्म निर्माताओं का कहना है कि उन्होंने जुटाए गए सबूतों को स्टॉकहोम में कोरिया के दूतावास को दिखाया है लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है.
वहीं मिस्टर बेनोस का कहना है कि वो तो नाटक कर रहे थे. उन्होंने कहा है कि फ़िल्म पक्षपातपूर्ण है.
-BBC

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *