क्‍या आपके बच्‍चे को भी है खाना खाते हुए वीडियो गेम्स खेलने की लत

दो साल के देवक का वजन लगभग 12.5 किलो था। न्यूट्रिशनिस्ट के अनुसार यह दो साल के हेल्दी बच्चे का वजन होता है। लेकिन पिछले 2 महीने में देवक के वजन में तेजी से कमी आई है। जब उसके गिरते वजन और सेहत को देखते हुए पैरंट्स ने डॉक्टर से संपर्क किया तो डॉक्टर का पहला सवाल था, ‘क्या बच्चे को खाना खाते हुए मोबाइल पर वीडियो देखने या गेम्स खेलने की आदत है।’ देवक की मां ने इसका जवाब हां में दिया। देवक ऐसा अकेला बच्चा नहीं है जिसे खाना खाते हुए मोबाइल पर वीडियो देखने या गेम्स खेलने की लत लग गई है। इन दिनों कई बच्चों में वजन घटने, मोटापा बढ़ने, कुपोषण जैसी सामान्य सी लगने वाली समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। इसके अलावा खाना खाते हुए फोन देखने और गेम्स खेलने की लत की वजह से अटेंशन डेफिसिट डिसॉर्डर, हाइपरऐक्टिविटी और स्लीप डिसॉर्डर जैसी बीमारियां भी बच्चों को घेर रही हैं।
स्क्रीन एडिक्शन से भूख समझ नहीं आती
आमतौर पर जब बच्चे खाना नहीं खाते हैं, तो उन्हें मोबाइल दिखाकर ही खाना खिलाया जाता है। लेकिन बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि इस ‘स्क्रीन एडिक्शन’ की वजह से बच्चों में भूख लगने की प्रवृत्ति कम होती जा रही है। बाल रोग चिकित्सक डॉ. चेतन गिनिगेरी कहते हैं, ‘जब बच्चे मोबाइल फोन पर फोकस करते हैं, तो उनके अंदर से खाने की इच्छा ही जन्म नहीं लेती। इससे वह खुद को संतुष्ट महसूस करते हैं। इस वजह से वे या तो कम खाते हैं और या फिर कुछ ज्यादा ही खा लेते हैं। इनका असर कुपोषण और मोटापा दोनों ही तरह से सामने आता है।’ वहीं दूसरी ओर, जो बच्चे खाने के इच्छुक हैं, लेकिन मोबाइल में लगा होने की वजह से बता नहीं पाते कि कब उनका पेट भर गया है, तो पैरंट्स उन्हें ज्यादा भी खिला देते हैं। डॉ. गिनिगेरी कहते हैं, ‘स्क्रीन अडिक्शन बच्चे में भूख और संतुष्टि को समझने की क्षमता खत्म कर देते हैं। जिस वजह से बच्चों को तमाम परेशानियां होती हैं।’
विकास करने वाले हॉर्मोन्स पर प्रभाव
एक अन्य मामले में, डॉक्टर्स के सामने एक ऐसा केस आया जिसमें सात साल के बच्चे को रात के वक्त चिड़चिड़ाहट होने लगी थी। पैरंट्स से सवाल-जवाब करने के बाद डॉक्टर्स ने महसूस किया कि बच्चा काफी देर रात तक जगता है और सुबह देर तक सोता है। बच्चे को सोने जाने के लिए देर रात तक कार्टून दिखाने की आदत डाली गई थी। डॉक्टर गिनिगेरी इसे काउंटर प्रॉडक्टिव की संज्ञा देते हैं। वह कहते हैं, ‘सभी इलैक्ट्रॉनिक उपकरणों से एक ब्लू लाइट निकलती है जो नेचुरल स्लीप हॉर्मोन मेलाटोनिन पर दबाव डालती है। इंसानी विकास के ज्यादातर हॉर्मोन्स रात को ज्यादा ऐक्टिव रहते हैं। लेकिन जब बच्चा कम सोएगा रात में, तो उसका पूरी तरह विकास नहीं हो पाएगा। कम सोने की वजह से भी उनमें चिड़चिड़ाहट आ जाती है।’
विकसित नहीं हो पातीं पांचों इंद्रियां
स्क्रीन एडिक्शन के साइड इफेक्ट के बारे में बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गिनिगेरी का कहना है, ‘बच्चों को अब काफी छोटी उम्र से ही इलैक्ट्रॉनिक गैजेट्स और डिजिटल मीडिया से रूबरू करवा दिया जाता है। जिंदगी के पहले पांच साल पांचों इंद्रियों को विकसित करने की जरूरत होती है जिसमें देखना, सुनना, महसूस करना, सूंघना और स्वाद लेना शामिल है। लेकिन इलैक्ट्रॉनिक गैजेट्स और मोबाइल बच्चों की देखने और सुनने वाली इंद्रियों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसका उनके जीवन पर शॉर्ट टाइम और लॉन्ग टाइम दोनों तरह का इफेक्ट पड़ता है।’ इसके शॉर्ट टर्म इफेक्ट्स में सोने के वक्त में कमी होना और चिड़चिड़ापन आना शामिल है। वहीं लॉन्ग टर्म इफेक्ट में बच्चों में व्यवहार से जुड़ी समस्याएं पैदा होती हैं, फोकस करने में दिक्कत आती है, स्कूल परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है और अटेंशन डेफिसिट की समस्या पैदा होती है।
फिजिकल ऐक्टिविटी बनाती है हेल्दी अडल्ट
इस स्क्रीन अडिक्शन के साथ बच्चों के आउटडोर खेल पर भी निगेटिव प्रभाव पड़ता है। डॉक्टर्स का यह भी कहना है कि बच्चे के विकास के लिए फिजिकल ऐक्टिविटी और बाहर खेलना बहुत जरूरी है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. उमाकांत अडिगा कहते हैं, ‘जिंदगी के पहले कुछ सालों में बच्चों के दिमाग का विकास हो रहा होता है। फिजिकल एक्टिविटी और बाहर खेलने के दौरान दिमाग के विकास की गति और सीमा बढ़ जाती है। बाहर खेलने के दौरान बच्चों के न्यूरल नेटवर्क को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और फिर यह बच्चों को हेल्दी वयस्क बनने में मदद करते हैं। जिन बच्चों को बचपन में ही गैजेट्स की आदत पड़ जाती है, वह विकास की इन प्रक्रियाओं में पिछड़ जाते हैं। जिस वजह से बच्चों को हाइपरऐक्टिविटी और अटेंशन डेफिसिट जैसी बीमारियां होती हैं।’
कितनी देर बच्चों को दें मोबाइल?
इलैक्ट्रॉनिक गैजेट्स की लत की वजह से बच्चों में सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेने की प्रवृत्ति भी कम हो जाती है। एनआईसीयू विशेषज्ञ और डॉ. गुरुराज बिरादर कहते हैं, ‘डिजिटल मीडिया की वजह से बच्चे पूरी तरह सामाजिक नहीं हो पाते और इस वजह से उनमें बचपन में बोलने की प्रक्रिया भी देर से शुरू होती है। इन बच्चों को बड़े होने के बाद कम्यूनिकेशन स्किल्स से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।’ इलैक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स के टाइम को लेकर चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. शरिल हेज कहते हैं, ‘पांच साल से छोटे बच्चों को एक घंटे ही मोबाइल देना चाहिए। अगर बच्चे पांच साल से बड़े हैं, तो उन्हें ज्यादा से ज्यादा दो घंटे फोन देना चाहिए। गैजेट्स ज्यादा इस्तेमाल करने वाले बच्चों को काउंसलिंग और सामान्य लाइफ की ओर लाने की कोशिश करनी चाहिए।’
बिहेवियर से जुड़ी परेशानियां बढ़ती हैं
डॉक्टर वैष्णवी चंद्रमोहन कहती हैं, ‘कई रिसर्च में यह बात साबित हुई है कि खाते हुए बच्चों का मोबाइल फोन इस्तेमाल करना उनमें मोटापा, नखरे और बिहेवियर से जुड़ी परेशानियों को बढ़ावा देती है। मोबाइल फोन का ज्यादा इस्तेमाल उनमें एकाग्रता और विकास को बाधित करता है, जिससे कि बच्चों में हाइपरऐक्टिव बिहेवियर, डिप्रेशन और खुदकुशी करने की प्रवृत्ति बढ़ती है।’
कैसे करें बच्चों को मोबाइल से दूर
– मोबाइल और टीवी देखने का समय तय करें और सख्ती से लागू करें।
– खाते हुए और सोने से पहले बच्चों को मोबाइल फोन कतई न दें। इस समय बच्चों से बातचीत करें।
– बच्चों के लिए जो नियम तय करें, उन्हें खुद भी फॉलो करें।
– बच्चों को स्टोरी टेलिंग, बोर्ड गेम्स, आउटडोर एक्टिविटी जैसे अन्य कामों में व्यस्त करें।
– बच्चों को मनाने, खाना खिलाने या कोई लालच देने के लिए कभी मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें।
-एजेंसियां

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