उपाधि नहीं, समाजोत्थान के लिए करें शोधः डा. अविनंदन मुखर्जी

ऐसा लिखें जिसे जनसाधारण समझ सकेः कुलपति डा. राणा सिंह

मथुरा। किसी भी तरह का शोध एक-दो दिन में पूरा नहीं हो सकता, यह तो सतत चलने वाली प्रक्रिया है। शोध प्रकाशन की मंशा पीएचडी उपाधि हासिल करने की बजाय समाजोत्थान के लिए होनी चाहिए। जो समाज को अपने कार्यों से कुछ नया आयाम देता है, उसी का नाम होता है। आज गुणवत्तापूर्ण शोध-पत्र समाज में महती भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं उक्त उद्गार शुक्रवार को संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित पब्लिसिंग स्ट्रैटजीज, रिसर्च क्वालिटी एण्ड इमपैक्ट, इनसाइट्स फ्राम ए जरनल एडीटर कार्यक्रम में लेविस कालेज आफ बिजनेस, मार्शल यूनिवर्सिटी, अमेरिका के डीन डा. अविनंदन मुखर्जी ने प्राध्यापकों को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता डा. मुखर्जी ने कहा कि वास्तविक जीवन में शोध कार्य की प्रासंगिकता एवं गुणवत्ता अत्यन्त महत्वपूर्ण है। प्रत्येकविश्वविद्यालय के मुख्यतः चार  उद्देश्य होते हैं। ज्ञान का हस्तान्तरण, ज्ञान की उत्पत्ति, ज्ञान से समृद्ध समाज का निर्माण और ज्ञान का संरक्षण।डा. मुखर्जी ने कहा कि शोध को सैद्धांतिक एवं अनुप्रयुक्त के विभिन्न खांचों में नहीं बांटा जा सकता है। एक शोधार्थी को विषय के सैद्धान्तिक एवं अनुप्रयुक्त दोनों पहलुओं की जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण शोध-पत्रों के प्रकाशन में भाषा एवं व्याकरण की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ज्ञान मानव विकास का हमराही है। इसी ज्ञान का व्यवस्थित और सुस्पष्ट रूप शोध-पत्रों में दिखना चाहिए।

डा. मुखर्जी ने कहा कि मानव सभ्यता की अविराम यात्रा के समय से ही वैज्ञानिक शोध हमारे वर्तमान और भावी जीवन के निर्धारक बनते आ रहे हैं। अनेक शाखा-प्रशाखाओं में विस्तृत विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे जीवन को सुगम बनाने में महती भूमिका निभा रहे हैं। इस क्षेत्र में होने वाले नित नए शोध और आविष्कारों का लाभ तभी लिया जा सकता है, जब विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से जुड़ा साहित्य हिन्दी सहित सभी जनभाषाओं में सुलभ हो। किसी शोध का सही लाभ आमजन को तभी मिल सकता है, जब इससे जुड़े तथ्य और सूचनाएं आम व्यक्ति की भाषा में उपलब्ध हों।

इस अवसर पर कुलपति संस्कृति विश्वविद्यालय, डा. राणा सिंह ने कहा कि आज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पर लगातार शोध-पत्र प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन इनमें गुणवत्ता का नितांत अभाव है। विभिन्न जरनलों में प्रकाशित शोधों में स्तरीय सामग्री विरले ही मिलती है। देखा जाए तो विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक लेखन कम ही हुआ है और संदर्भ ग्रंथ भी नगण्य हैं। लोकप्रिय विज्ञान के लिए लिखा तो बहुत कुछ गया है, लेकिन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से सम्बद्ध सरल-सुबोध साहित्य, जो जनसाधारण की समझ में आ सके, ऐसे लेखन की न्यूनता है। इतना ही नहीं विषय विशेषज्ञों की हिन्दी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में लेखन के प्रति रुचि भी नहीं है। इसके प्रमुख कारण हैं- भाषागत कठिनाई, हिन्दी में लिखे आलेखों, शोधपत्रों को प्रस्तुत करने के लिए मंचों का अभाव, प्रकाशन की असुविधा आदि।

कुलपति डा. राणा सिंह ने कहा कि किसी भी भाषा की शब्दावली कितनी ही समृद्ध क्यों न हो, उसकी सार्थकता व्यवहार से ही हो सकती है। हिन्दी में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विषयक शोधपत्रों और आलेखों को प्रस्तुत करने के लिए आज अंग्रेजी के समकक्ष विज्ञान मंचों की स्थापना की आवश्यकता है। आज ऐसे राष्ट्रीय मंचों का अभाव है जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सेमिनार, सम्मेलन आयोजित कर बहुपृष्ठी चित्रात्मक शोधपत्रों का संकलन-प्रकाशन कर सकें। सच तो यह है कि आज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को सरल भाषा में समझना और समझाना बहुत जरूरी है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार का काम सिर्फ सूचना देना भर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि पैदा करना है। भूमंडलीकरण के दौर में हम गुणवत्तापूर्ण शोध-पत्रों का प्रकाशन कर सामाजिक बदलाव में प्रमुख भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। कार्यक्रम के अंत में डा. मुखर्जी को कुलपति डा. राणा सिंह ने शाल ओढ़ाकर स्मृति चिह्न प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन निहारिका ने किया तथा आभार डीन इंजीनियरिंग डा. कल्याण कुमार ने माना।

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