कश्‍मीर की चर्चा हजारों किलोमीटर दूर ब्रिटेन के चुनावों में

उत्तरी ब्रिटेन के ब्रैडफ़र्ड शहर में कश्मीर का ज़िक्र ना हो तो बातचीत या बहस अधूरी रह जाती है. यहाँ मंदिर-मस्जिद हों, किसी का घर हो या फिर कोई चुनावी कैंपेन, कश्मीर को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. भारत से 6,500 किलोमीटर दूर ब्रिटेन में कश्मीर एक चुनावी मुद्दा बना हुआ है.
भारत सरकार ने 5 अगस्त को अनुच्छेद-370 हटाकर जम्मू-कश्मीर से इसकी ख़ुदमुख़्तारी ख़त्म कर दी थी और इसे दो केंद्र शासित प्रांतों में विभाजित कर दिया है.
इसके कारण यहाँ रहने वाले भारतीय और पाकिस्तानी समुदायों के बीच ये एक बड़ा मुद्दा बन गया. नफ़रत की एक दीवार सी खड़ी हो गयी.
भारतीय समुदाय भारत के इस फ़ैसले से ख़ुश है तो पाकिस्तानी समुदाय इससे बहुत नाराज़.
ब्रिटेन की पार्टियों ने कश्मीर मुद्दे पर अपना पक्ष सामने रखा है लेकिन वो हर क़दम फूँक-फूँककर रख रही हैं. इसका असर 48 सीटों के नतीजों पर हो सकता है जहाँ दक्षिण एशिया के लोगों के वोट अहम माने जाते हैं.
धर्म के आधार पर विभाजन?
ब्रिटेन में आम चुनाव 12 दिसंबर को हैं. ब्रैडफ़र्ड की आबादी के 43 फ़ीसद लोग दक्षिण एशियाई मूल के हैं.
पाकिस्तान के मीरपुर से आए लोगों की एक बड़ी संख्या यहाँ आबाद है. यहाँ के दो चुनावी उम्मीदवार भी इसी समुदाय से आते हैं.
यहाँ मतदाता कहते हैं कि उनका मत पार्टियों की कश्मीर पर नीति को देखकर पड़ेगा.
आख़िर कश्मीर यहाँ होने वाले आम चुनाव में मुद्दा क्यों बन गया है? इस बारे में हमने कुछ लोगों से बात की.
एक भारतीय कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर रशपाल सिंह इस सवाल के जवाब में कहते हैं, “ब्रैडफ़र्ड में कश्मीर एक चुनावी मुद्दा इसलिए है क्योंकि यहाँ दक्षिण एशियाई लोगों की बड़ी आबादी है और ये मुद्दा इन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है.”
युवकों में बेरोज़गारी, ग़रीबी और महिलाओं के ख़िलाफ़ भेदभाव इस शहर में मतदान के लिए अहम मुद्दे हैं. लेकिन दक्षिण एशिया के लोगों के लिए कश्मीर का मुद्दा भी बहुत अहम है.
हम ब्रैडफ़र्ड स्थित पाकिस्तानी मूल के एक व्यापारी परिवार से मिले. इस परिवार की पहली पीढ़ी पाकिस्तानी कश्मीर के मीरपुर ज़िले से वर्षों पहले यहाँ आ गई थी. लेकिन आज भी कश्मीर इनके लिए एक भावुक मुद्दा है.
घर में मसूद सादिक़, उनकी सोशल वर्कर पत्नी रुक़साना सादिक़ और कॉलेज में पढ़ने वाली उनकी बेटी हाना सादिक़ कश्मीर के मुद्दे पर भारत से नाराज़ हैं.
मसूद सादिक़ कहते हैं, “इस वक़्त यहाँ के दो एमपी कश्मीरी हैं. यहाँ कश्मीरियों की एक भारी संख्या आबाद है. चुनाव में उम्मीदवारों को अपने वोटरों की बातों को समझना पड़ता है. वो चाहते हैं कि वो जिन उम्मीदवारों को वोट दें, वो कश्मीर के मुद्दे को संसद में उठाएं.”
इस मुद्दे ने भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोगों के बीच नफ़रत की एक दीवार खड़ी कर दी है.
रुख़साना सादिक़ कहती हैं, “हम सिर्फ़ एक-दूसरे को बर्दाश्त करते हैं. हमने कभी दीवार तोड़ने की कोशिश नहीं की. एक दूसरे से अलग रहते हैं, दीवार फांदने की कोशिश नहीं करते.”
बेटी हाना सादिक़ 16 साल की हैं. वोट देने की उम्र नहीं है लेकिन उनके इस मुद्दे पर विचार पुख़्ता हैं.
वो कहती हैं, “हिंदू और मुसलमानों के बीच बहस होती रही है. मतभेद का कारण केवल धर्म नहीं है, पर धर्म की भूमिका ज़रूर होती है.”
भारतीय लोगों का रुख़
ब्रैडफ़र्ड में हिंदू समुदाय के लिए भी कश्मीर का मुद्दा अहम है.
ब्रैडफ़र्ड के एक बड़े मंदिर में दिन के 12 बजे आरती शुरू होती है जिसमें अधिकतर बुजुर्ग महिलाएँ और पुरुष शामिल होते हैं.
आरती पहली मंज़िल पर होती है और दफ़्तर-रसोई वगैरह ग्राउंड फ़्लोर पर हैं.
राकेश शर्मा इस मंदिर की समिति के एक मुख्य सदस्य हैं.
साल 1974 में वो दिल्ली से यहाँ आकर बस गए थे. वो मानते हैं कि उनके शहर में कश्मीर बेशक एक चुनावी मुद्दा है.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, “यहाँ के अधिकतर सांसद पाकिस्तानी मूल के हैं और लेबर पार्टी के हैं. उनका कहना है कि भारत ने जो अनुच्छेद-370 हटाया है, वो ग़ैर-क़ानूनी है. भारतीयों का विचार है कि लेबर पार्टी का झुकाव मुसलमानों की तरफ़ ज़्यादा है और वो भारतीयों के पक्ष में नहीं हैं.”
लेबर पार्टी ने कश्मीर में कथित तौर पर मानवाधिकार की बहाली पर एक प्रस्ताव पास किया था.
इसके बाद पार्टी ने अपने चुनावी मैनिफ़ेस्टो में कश्मीर पर ‘अधिक हस्तक्षेप करने वाली’ नीति का वादा किया है.
पार्टी की इस कश्मीर पॉलिसी ने भारतीय हिंदुओं को इससे दूर किया है.
मुकेश चावला पंजाब से 52 वर्ष पहले यहाँ आए थे. लेकिन भारत से उनका लगाव और नाता अब भी मज़बूत है.
वो कहते हैं, ”विपक्ष के नेता और लेबर पार्टी के सांसद जेरेमी कॉर्बिन ने अनुच्छेद-370 हटाए जाने का विरोध किया था जिस वजह से भारतीय समुदाय ने सत्ताधारी कंज़र्वेटिव पार्टी का समर्थन शुरू कर दिया. दूसरी तरफ़ कंज़र्वेटिव पार्टी के नेता बोरिस जॉनसन ने संसद में कहा था कि कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है तो उसमें हमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. इसलिए हम सब उनके समर्थक हो गए हैं.”
कश्मीर मुद्दे पर सवाल
भारतीय मूल के लोगों का तर्क ये भी है कि कश्मीर यहाँ के चुनाव या यहाँ की राजनीति का हिस्सा नहीं होना चाहिए.
पूर्वा खंडेलवाल कुछ साल पहले भारत से ब्रैडफ़र्ड आई थीं. उनके विचार में कश्मीर का मुद्दा यहाँ के चुनावों में नहीं उठना चाहिए.
वो कहती हैं, “मेरे विचार में ये मामला भारत और पाकिस्तान के बीच का है. ब्रिटेन की सरकार या यहाँ के लोगों को कश्मीर के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए”.
दक्षिण एशियाई मूल के लोग पार्टियों की कश्मीर नीति के आधार पर वोट ज़रूर देने वाले हैं लेकिन वो ये भी महसूस करते हैं कि ये मुद्दा चुनाव के बाद शायद लोग भूल जाएं.
जैसे कि मसूद सादिक़ कहते हैं, “पार्टियाँ कुछ ख़ास कर नहीं सकतीं. भारत की अर्थव्यवस्था और वहाँ के बड़े बाज़ार को देखते हुए कश्मीर पर भारत के ख़िलाफ़ दबाव डालना मुश्किल है”.
-BBC

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