चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विपक्षी दलों में चर्चा

नई दिल्ली। आजाद भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों द्वारा मीडिया के सामने आकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठाने के बाद से इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज होती नजर आ रही है।
सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने मंगलवार को कहा कि इस मामले में अब कार्यपालिका की भूमिका निभाने का समय आ गया है। बता दें कि कुछ दिन पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जज विवाद से राजनीतिक दलों को दूर रहना चाहिए।
येचुरी ने कहा, ‘हम इस बात पर विपक्षी दलों से चर्चा कर रहे हैं कि क्या बजट सत्र में चीफ जस्टिस पर महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है।’ गौरतलब है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद चार जज जस्टिस जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, एम. बी. लोकुर और कुरियन जोसफ ने एक चिट्ठी जारी की थी, जिसमें गंभीर आरोप लगाए गए थे। जजों के मुताबिक यह चिट्ठी उन्होंने चीफ जस्टिस को लिखी थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित 7 पन्नों के पत्र में जजों ने कुछ मामलों के असाइनमेंट को लेकर नाराजगी जताई है। बता दें कि जजों का आरोप था कि चीफ जस्टिस की ओर से कुछ मामलों को चुनिंदा बेंचों और जजों को ही दिया जा रहा है।
जजों के इस बयान के बाद न्यायपालिका समेत पूरे देश में भूचाल आ गया था। हालांकि किसी भी राजनीतिक दल ने इस विवाद पर सीधे तौर पर तो कुछ नहीं बोला, लेकिन अलग-अलग मुद्दों को लेकर उन्होंने सरकार को जरूर घेरा। येचुरी के बयान को भी इसी संदर्भ में माना जा रहा है।
न्यापालिका संकट पर पहली बार बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि सरकार और राजनीतिक दलों को इससे दूर रहना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया था कि न्यायपालिका अपनी समस्याओं का समाधान निकालने के लिए एक साथ बैठेगी। प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘हमारे देश की न्यायपालिका का एक बहुत ही उत्कृष्ट अतीत रहा है, वे बहुत ही सक्षम लोग हैं। वे एक साथ बैठेंगे और अपनी समस्याओं का समाधान निकालेंगे। हमारी न्यायिक प्रणाली में मेरी आस्था है, वे निश्चित तौर पर एक समाधान निकालेंगे।’
बता दें कि किसी जज को हटाए जाने के लिए महाभियोग की शुरुआत लोकसभा के 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों के सहमति वाले प्रस्ताव से हो सकती है। ये सदस्य संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को जज के खिलाफ महाभियोग चलाने की अपनी मांग का नोटिस दे सकते हैं। प्रस्ताव पारित होने के बाद संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा तीन जजों की एक समिति का गठन किया जाता है। इस समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा न्यायाधीश, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश और एक कानूनविद को शामिल किया जाता है। यह तीन सदस्यीय समिति संबंधित जज पर लगे आरोपों की जांच करती है
उल्लेखनीय है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सौमित्र सेन देश के इतिहास में दूसरे ऐसे न्यायाधीश थे जिन्हें अनाचार के आरोप में महाभियोग की कार्यवाही का सामना करना पड़ा था। सेन ने राज्यसभा में उनके खिलाफ प्रस्ताव पारित होने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। महाभियोग का अर्थ अनाचार के लिए आरोपित किया जाना होता है। संविधान के अनुसार हाई कोर्ट के जजों एवं मुख्य न्यायाधीशों को तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों व प्रधान न्यायाधीश को अनाचार और अयोग्यता के आरोप साबित होने पर संसद के दोनों सदनों में एक प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। देश में महाभियोग की कार्यवाही का पहला मामला सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी का था। उनके खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया था, क्योंकि सत्ताधारी कांग्रेस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था।
-एजेंसी