अध्यात्म तथा चिकित्सा शास्त्र में सीधा संबंध: श्री. शॉन क्लार्क

नई द‍िल्ली। मनुष्य के स्वास्थ्य पर परिणाम करने वाले आध्यात्मिक पहलुओं को आधुनिक चिकित्सा शास्त्र नकारता है परंतु आयुर्वेद रोग का निदान और उपचार, इन दोनों स्तरों पर आध्यात्मिक और सूक्ष्म पहलुओं का विचार करता है। अध्यात्म और चिकित्सा शास्त्र में समान कड़ी क्या है, इसका अध्ययन हो जाए तो रोग का निदान, उपचार और रोकथाम अधिक प्रभावी हो सकते हैं क्या?

इस विषय में महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय ने पारंपरिक (वैज्ञानिक) और अपारंपरिक (सूक्ष्म-ज्ञान) पद्धतियों से किए शोध कार्य में अध्यात्म और चिकित्सा शास्त्र में सीधा संबंध है, यह स्पष्ट हो गया, ऐसा प्रतिपादन श्री. शॉन क्लार्क ने 15 मार्च 2021 को ‘‘वर्चुअल एनुअल इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन स्पिरिचुअलिटी एंड साइकोलॉजी’ (ICSP 2021) नामक अंतर्राष्ट्रीय परिषद में शोध निबंध प्रस्तुत करते हुए किया।

इस परिषद का आयोजन सर्बिया स्थित ‘‘टुमारो पीपल ऑर्गेनाइजेशन’ की ओर से किया गया था। महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की ओर से ‘’रोग के कारण, उपचार और रोकथाम में अध्यात्मशास्त्र का स्थान’, इस विषय पर शोध निबंध प्रस्तुत किया गया। इस शोध निबंध के लेखक महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के प्रणेता परात्पर गुरु डॉक्टर जयंत आठवले हैं और सह लेखक  शॉन क्लार्क हैं।

उपरोक्त शोध निबंध महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय द्वारा वैज्ञानिक परिषद में प्रस्तुत किया गया 67 वा शोध निबंध था। इससे पूर्व विश्‍वविद्यालय में 15 राष्ट्रीय और 51 अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक परिषदों में शोध निबंध प्रस्तुत किए हैं। इनमें से 4 अंतरराष्ट्रीय परिषदों में विश्‍वविद्यालय को ‘‘सर्वोत्कृष्ट शोध निबंध’ का पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

रोग का निदान और उपचार होने हेतु उसके मूल तक जाना अनिवार्य होता है। किसी भी रोग के 3 संभावित कारण हो सकते हैं, ऐसा शोध से ज्ञात हुआ है। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक वे तीन कारण हैं। कोई भी रोग इनमें से एक अथवा अनेक कारणों से होता है। रोग सहित जीवन की अधिकांश समस्याओं का मूलभूत कारण ‘प्रारब्ध’ होता है। इसी के साथ अनिष्ट शक्ति, पूर्वजों के सूक्ष्म देह इत्यादि आध्यात्मिक कारणों से भी शारीरिक (उदा. त्वचारोग) अथवा मानसिक (उदा. व्यसनाधीनता) रोग हो सकते हैं। इसलिए रोग का निदान करते समय वास्तव में डॉक्टर को तीनों मूलभूत कारण ध्यान में रखकर उसके अनुसार उपचार करना चाहिए, उदाहरणार्थ किसी रोग का मूल कारण प्रारब्ध अथवा अनिष्ट शक्तियों का कष्ट हो, तो शारीरिक और मानसिक उपचारों के साथ ही आध्यात्मिक उपचार करना आवश्यक होता है। ऐसा करने से रोग का पूर्ण निवारण होता है। इसके विपरीत केवल शारीरिक और मानसिक उपचार करने से रोग के केवल लक्षण दूर होते हैं, ऐसा शोध के अंत में पाया गया।

श्री. क्लार्क ने इस समय कहा क‍ि आध्यात्मिक स्तर के उपचारों के अंतर्गत साधना अर्थात् नित्य उपासना ही सर्वोत्तम उपचार है। साधना करने से प्रारब्ध पर विजय प्राप्त की जा सकती है अथवा वह सहनेयोग्य हो जाता है।

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