Fani तूफान के साथ शांत हो गया कलाकारों का गांव रघुराजपुर

रघुराजपुर (ओडिशा)। Fani तूफान के साथ कलाकारों की कला भी शांत हो गई है। चित्र बदरंग हो गए हैं। अब उनके सामने तमाम मुश्किलें हैं। एक ही काम है कि वे घर तैयार करें, रोटी का इंतजाम करें और आगे की रोजी के लिए फिर से संसाधन जुटाएं।
दरअसल, यह स्थिति है रघुराजपुर की, जिसे मिनी ओडिशा और कलाकारों का गांव भी कहा जाता है।
Fani तूफान गुजर जाने के बाद ओडिशा की कलाओं को सहेजने का सपना बुनने वाली आंखें दो जून की रोटी के जुगाड़ की चिंता में पथराई हुई हैं और हुनर को कलाकृतियों में उकेरने वाले हाथ अब उजड़ी छत पर पन्नी लगाने एवं मलबा हटाने में जुटे हैं।
3 मई को आए चक्रवाती तूफान Fani ने पुरी के पास स्थित इस गांव को तबाह कर दिया, जिसमें रहने वाले 140 परिवारों के 700 सदस्यों में लगभग सभी कलाकार हैं। इनमें पद्मश्री, राष्ट्रीय पुरस्कार और यूनेस्को से पुरस्कृत कलाकारों के परिवार शामिल हैं। दस साल पहले राष्ट्रीय पुरस्कार और कलामणि सम्मान पाने वाले पटचित्र कलाकार गंगाधर महाराणा को भविष्य की चिंता सता रही है। गुरू शिष्य परंपरा पर आधारित उनका संस्थान ठप हो गया, चित्रकारी के लिए अब सामान नहीं बचा।
इतना ही नहीं, सामान देने वाले पेड़ पौधे भी बर्बाद हो गए। उन्होंने कहा, ‘फोनी से पहले तक मेरा आंगन युवा कलाकारों के शोर से गूंजता था लेकिन अब यहां मातम जैसा सन्नाटा पसरा है। चित्रकारी के रंग खराब हो गए और ताड़ के पत्ते भी नहीं बचे। प्राकृतिक रंग, गोंद, पत्थर, समुद्रशंख अब कहां से लाएंगे। इतनी तबाही तो सुपर साइक्लोन में भी नहीं देखी थी।’
महान ओडिसी नर्तक केलुचरण महापात्रा के जन्म स्थान इस गांव में रहने वाले कलाकार पटचित्र, टसर चित्रकारी, ताड़पत्रों पर चित्रकारी, पत्थर और काष्ठकला, गोबर और पेपरमेशी के खिलौने बनाते हैं। इसके साथ ही गोटिपू नृत्य के जनक पद्मश्री मागुनी दास का परिवार रिहायशी गुरुकुल चलाता है। फोनी से हुई तबाही का मंजर गांव में घुसते ही दिख जाता है। न जाने कितने ही नारियल के पेड़ धराशाई हो चुके हैं, शिल्प संग्रहालय उजड़ चुका है और हर घर के बाहर बने भित्तिचित्र बदरंग हो गए हैं।
युवा पटचित्रकार आलोक रंजन साहू ने बताया, ‘दिन रात कला की सेवा में जुटे इन हाथों से हम दो दिन से मलबा हटा रहे हैं। बिजली नहीं है, बाहर से संपर्क नहीं है और समुद्र का पानी तालाब में मिल जाने से पीने का पानी नहीं बचा। एक ट्यूबवेल है, जिस पर 700 लोग निर्भर हैं और इसमें भी बार बार पानी चला जाता है।’ वहीं सुशांत महाराणा ने कहा कि हर घर में कलाकृतियां पानी लगने से खराब हो गईं हैं, जो महीनों की मेहनत से तैयार की गईं थीं। उन्होंने कहा, ‘किसी का 50,000 रुपये का नुकसान हुआ तो किसी का लाखों रुपये का। सारे चित्र खराब हो गए लेकिन कोई उन्हें फेंकने को तैयार नहीं है। आखिर क्यों फेंक दिया जाए, इनके पीछे महीनों की मेहनत थी।’
यूनेस्को से स्वर्ण पदक पा चुके कलाकार अक्षय बारीकी ने कहा कि कलाकारों के इस सपने को अब नए सिरे से बसाने में कई साल लग जाएंगे क्योंकि फिलहाल तो चिंता रोटी, कपड़ा और मकान की है । उन्होंने कहा, ‘पुरी जाने वाले पर्यटकों से यह गांव हमेशा आबाद रहता था और उनकी आखों में प्रशंसा के भाव हमारी सबसे बड़ी पूंजी थे। अब हर तरफ तबाही का मंजर है, जिसे देखने कौन आएगा। राहत भी यहां तक अभी पहुंच नहीं पा रही। हम अपने बच्चों को ओडिशा की कलाओं की सेवा में समर्पित करना चाहते थे लेकिन अभी तो सबसे बड़ी चिंता उनके लिए दो जून की रोटी जुटाने की है ।’ गोटिपू नृत्य के जनक पद्मश्री मागुनी दास के बेटे मीटू दास ने कहा, ‘हमारे रिहायशी गुरुकुल में छह से 17 वर्ष तक के 25 बच्चे नृत्य सीखते हैं लेकिन तीन मई से सब कुछ बंद है। तूफान ने सब-कुछ छीन लिया, इन बच्चों के सपने भी। पता नहीं, अब यह शिल्पगांव बचेगा भी या नहीं।’
-एजेंसियां

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